स्कूल ले जाने वाला जानलेवा रास्ता

लेह स्कूल क़तार के आख़िरी

स्कूल जाने का इससे ज़्यादा ख़तरनाक रास्ता दुनिया में शायद ही कहीं हो.

भारत प्रशासित कश्मीर के लद्दाख संसदीय क्षेत्र की जांसकर घाटी और आसपास के गांवों में रहने वाले बच्चों के लिए लेह में अपने स्कूल तक पहुंचना मौत को चुनौती देने जैसा है.

हिमालय की गोद में बसी जांसकर घाटी समुद्र तल से क़रीब 11 हज़ार फ़ीट ऊंचाई पर है. ठंड में सड़कों पर बर्फ़ जमने से इस इलाक़े का बाहरी दुनिया से संपर्क कट जाता है.

यहां के बच्चों को 100 किलोमीटर से ज़्यादा दूर लेह के स्कूल तक पहुंचाने का एकमात्र ज़रिया होता है, बर्फ़ से ढकी घाटियों, ख़तरनाक पहाड़ी रास्तों और जमी हुई नदी के ऊपर से गुज़रकर जाना.

थोड़ी सी चूक हुई तो आप हज़ारों फ़ीट गहरी खाई में गिर सकते हैं.

इस सफ़र को 'चदर ट्रेक' भी कहते हैं. स्थानीय भाषा में चदर का मतलब है कंबल. ठंड में बर्फ़ बनी जांसकर नदी, पहाड़ों को कंबल की तरह ढक देती है.

नदी के ऊपर जमी बर्फ़ की परत से कुछ फ़ीट नीचे नदी का बहाव जारी रहता है. सालों से जांसकर घाटी के इलाक़ों में रहने वाले लोग जमी हुई नदी पर चलकर रास्ता तय करते हैं.

ज़िंदगी का हिस्सा बर्फ़

स्कूल जाने वाले बच्चों के अलावा पर्यटक और एक से दूसरी ओर जाने वाले मज़दूर भी इस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं. इस सफ़र के दौरान रात में किसी गुफा में रुकना होता है. तड़के फिर सफ़र की शुरुआत होती है.

शून्य से 35 डिग्री तक नीचे चले जाने वाले तापमान में बच्चे एक-दो दिन नहीं बल्कि पांच से छह दिन के थका देने वाले सफ़र को ख़त्म करके आख़िरकार अपने स्कूल पहुंचते हैं.

वो इस बोर्डिंग स्कूल में ही रहते हैं और स्कूल बंद होने पर एक बार फिर शुरू होता है मुश्किलों भरा वापसी का सफर.

बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों से घिरे महाबोधि स्कूल की नर्सरी क्लास में हमारी मुलाकात साढ़े तीन साल के स्टैंज़िन टेंग्योंग से हुई. पढ़ने के लिए इससे ख़ूबसूरत जगह शायद ही आपने देखी हो.

उनकी साफ़-सुथरी लिखावट से उनकी टीचर बहुत ख़ुश रहती हैं. सिर पर स्कूल की टोपी, गरम कोट और कुछ बाल आगे की ओर गिरे हुए. गाल जैसे लाल टमाटर.

क्लास की दीवारों पर डिज़्नी के कार्टून बने थे. सामने उनका एक दूसरा साथी ज़मीन पर लेटकर कॉपी में कुछ लिख रहा था. कॉपियां, पेंसिल बॉक्स बिखरे थे.

अपनी क्लास में स्टैंज़िन के अलावा कुछ और बच्चे भी जांसकर से पढ़ने के लिए लेह के महाबोधि स्कूल पहुंचते हैं.

उनकी टीचर बताती हैं कि स्टैंज़िन के पिता उन्हें गोदी में उठाकर ज़्यादातर सफ़र तय करते हैं. घुप्प अंधेरे में बर्फ़ से लिपटी धरती पर बिखरी चट्टानों में गुफा की तलाश की जाती है.

नहीं तो तंबू खड़ा कर वहीं रात काटने की व्यवस्था होती है. तड़के फिर सफ़र शुरू होता है.

अगर रास्ते में बच्चे की तबीयत खराब हो जाए तो? प्रिंसिपल कहती हैं कि "ये पहाड़, बर्फ़ तो बच्चों की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए है." छेवांग डोल्मा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई इसी स्कूल से की है. क़रीब 450 छात्र-छात्राओं वाले इस स्कूल की वो अब प्रिंसिपल हैं.

किसी ने नहीं ली सुध

वो कहती हैं, "बच्चों को सावधानी बरतनी होती है. डर रहता है कि कहीं बर्फ़ की पतली परत टूटी, तो बच्चे बर्फ़ीले पानी में डूब जाएंगे."

वह हाल की एक घटना के बारे में बताती हैं जिसमें बर्फ़ की चादर पर खेल रहे तीन में से दो बच्चे नदी में समा गए.

डोल्मा कहती हैं, "ठंड का वक़्त सबसे मुश्किल होता है क्योंकि भारी बर्फ़बारी के कारण मुख्य सड़कें बंद होती हैं इसलिए जांसकर इलाक़े से जो बच्चे आते हैं वो देरी से आते हैं. लोगों को इंतज़ार करना पड़ता है कि नदी पर जमी बर्फ़ मोटी हो जाए ताकि उस पर चला जा सके."

गर्मी के वक़्त रास्ते खुले रहते हैं, इसलिए उनका इस्तेमाल आसान होता है. हालांकि अंदरूनी इलाक़ों में सड़कों की हालत काफ़ी ख़राब है.

10वीं में पढ़ने वाली और छह भाई-बहनों में सबसे छोटी रिग्ज़िन यंग्टल बड़ी होकर बैंक मैनेजर बनना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें गणित बहुत पसंद है. वो जांसकर नदी से लगे लिंगशेट गांव में रहती हैं, जो लेह से क़रीब 70 किलोमीटर दूर है और बौद्ध मंदिरों के लिए जाना जाता है.

तीन साल पहले लिंगशेट से लेह का सफ़र याद करके वो आज भी सिहर उठती हैं. वो बताती हैं कि उस वक़्त बर्फ़ की परत मज़बूत नहीं थी, जिससे उनका भाई बर्फ़ीले पानी में कमर तक जा गिरा, जिससे रास्ते के लिए रखा खाने का सारा सामान खराब हो गया. शरीर ठंड से ऐंठ गया.

लेकिन वे चुनाव के महत्व को समझती हैं, "हमारा मतदान बहुत ही आवश्यक है. इससे भारतीय लोकतंत्र मज़बूत होगा."

पिघलती बर्फ़ और चुनाव के चढ़ते पारे के बावजूद इन लोगों की कभी प्रशासन या हुक्मरानों से सुध नहीं ली.

बेरोज़गारी

इस इलाक़े में बेरोज़गारी आम है. ऐसे में मां-बाप किस उम्मीद से अपने बच्चों को इतनी मुश्किलें उठाकर पढ़ाते हैं?

लेह के स्थानीय पत्रकार अब्दुल ग़नी शेख कहते हैं कि ढेर सारे नौजवान "भारतीय सेना या अर्धसैनिक बलों में नौकरियों की ख़्वाहिश रखते हैं."

अब्दुल ग़नी के अनुसार समस्या उन नौजवानों के लिए है, जो जीवन में कुछ और करना चाहते हैं.

वे कहते हैं, "लद्दाख के बाहर जम्मू, चंडीगढ़ और दिल्ली में लद्दाखी छात्र हज़ारों की संख्या में हैं. जांसकर में भी स्कूल हैं, लेकिन वो मैट्रिक तक ही हैं जिसके कारण अच्छी शिक्षा की तलाश में बच्चों को बाहर निकलना पड़ता है."

लेह में भी कई नौजवानों की शिकायत थी कि पढ़े-लिखे लोगों को नौकरियां नहीं मिलतीं और लेह में कथित सरकारी भाई-भतीजावाद के कारण होनहार युवकों को घर बैठना पड़ता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार