हिंदुत्व की राजनीति को सेक्युलर करने की कोशिश

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आम लोग और कई चिंतक-विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय लोकतंत्र बड़ा सशक्त है, बेहद मज़बूत है. पर मैं ऐसा नहीं मानता.

दरअसल आज तक हमने भारतीय लोकतंत्र की प्रक्रिया को ही परखा है. चुनाव और मतदान की प्रक्रिया पर बहुत ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया गया है, जबकि इसके उलट जो लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं वे बेहद कमज़ोर हो चुकी हैं. कुछ तो लड़खड़ा रही हैं.

ऐसे में ख़तरा किस तरह का होता है, उसे समझने के लिए हमें देखना होगा कि हिटलर भी वोटिंग के माध्यम से सत्ता में आए थे और चूंकि लोकतांत्रिक संस्थाएं नहीं थीं तो वो वह सब कर पाए, जो उन्होंने किया.

भारतीय राजनीति में लोकतंत्र को लेकर जो मिथक है वो कोई इकलौता नहीं हैं. मेरी नज़र में भारतीय राजनीति में तीन मिथक हैं और मैं इन्हें 'थ्री कौरोसिव मिथ्स ऑफ़ इंडियन पॉलिटिक्स' की संज्ञा देता हूं.

(मोदी की सरकार और हिंदू राष्ट्र का सपना)

भारतीय राजनीति के तीन क्षयकारी मिथकों में से पहला तो यह है कि भारतीय जनतंत्र इतना मज़बूत है कि कोई भी आ जाए, हम देख लेंगे.

सवालों में लोकतंत्र

वेंडी डॉनिगर की किताब 'द हिंदूज़: ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री' वापस ली गई तो समाज के तीन अहम वर्गों की क्या प्रतिक्रिया होती है. सरकार की तरफ़ से टिप्पणी नहीं आई, सिविल सोसायटी सोती रही, उदारवादी बौद्धिक लोग सिर्फ़ अख़बारों में एक-एक लेख लिखकर चुप हो गए.

यह एक छोटा उदाहरण है किस तरह से सिविल सोसायटी और राज्य की लोकतांत्रिक संस्थाएं लड़खड़ा रही हैं. यह हक़ीक़त हमें स्वीकार करनी होगी.

हम ख़ुश हो जाते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं. सबसे बड़ा लोकतंत्र किस आधार पर? अंकों के आधार पर, क्योंकि संस्थाएं तो हैं ही नहीं हमारे यहाँ.

दूसरा मिथक भारतीय समाज की बहुलता का भी है. बहुलता अपने आप में सहिष्णुता का कारण नहीं होती है.

वास्तव में बहुलता तो असहिष्णुता को जन्म दे सकती है. बहुलता क्या होती है, इसको लेकर हर किसी का अलग-अलग मत हो सकता है.

(आम चुनाव पर संघ का साया)

मान लीजिए आपका एक मत है, मेरा एक मत है, आपके साथ जो सज्जन बैठे हैं उनका एक मत है. इतना ही नहीं हम तीनों ही सोचते हैं कि हमारा मत सही है.

क्या यह स्थिति सहिष्णुता की ओर ले जाती है या संघर्ष की स्थिति की ओर ले जाती है?

बहुलता और विविधता

आधुनिक लोकतंत्र में बहुलता और विविधता जो होती है उसके लिए एक रेफ़री (मध्यस्थ या निर्णायक) चाहिए होता है और वह रेफ़री राज्य होता है.

जब तक राज्य की संस्थाएं लोकतांत्रिक नहीं होंगी, सशक्त नहीं होंगी तब तक बहुलता और विविधता अपने आप को बेवक़ूफ़ बनाने वाली बात है.

भारतीय लोकतंत्र का तीसरा सबसे बड़ा मिथक है कि हमें लोगों के फ़ैसले का सम्मान करना होगा, क्योंकि हम लोकतंत्र हैं.

चाहे लोग नरेंद्र मोदी को लाएं, माया बेन कोडनानी को लाएं, अमित शाह को लाएं, ए. राजा को लाएं, सुरेश कलमाड़ी को लाएं, जनता का फ़ैसला सर-माथे.

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लोकतंत्र की यह एक ग़लत परिकल्पना है. लोकतंत्र में लोग ग़लती करते हैं और बड़े पैमाने पर ग़लती करते हैं और यह लोकतांत्रिक संस्थाएं उस ग़लती को सुधारती हैं, उस ग़लती पर हल्का सा मरहम लगाती है.

उन ग़लतियों में बदलाव लाने की कोशिश करती हैं, उन ग़लतियों के प्रभाव अगर दुष्प्रभाव हैं तो उसको कम करने की कोशिश करती हैं.

ऐसे में कई लोग यह मानते हैं कि भारत अभी भी अतिवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ दिखता है. कुछ लोग यह भी मानते हैं कि शायद यही वजह है कि हिंदूत्ववादी ताक़तों को राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में आने में दिक़्क़त होती रही है.

लेकिन यह महज़ एक पहलू है. इसका दूसरा पहलू यह है कि शुरुआत में कांग्रेस पार्टी ही हिंदू ताक़तों की अगुआई करती थी. कांग्रेस की हिंदुत्व राजनीति के कमज़ोर पड़ने पर ही बीजेपी सशक्त हो पाई.

हिंदुत्व की राजनीति

सीधी बात है. 1955 का जो हिंदू कोड बिल है उसे पंडित नेहरू जैसे आदमी एक प्रारूप में पास नहीं करा पाए. तब अंबेडकर ने इस्तीफ़ा दे दिया. यह बिल नौ टुकड़ों में बंटा. इसके बाद यह बिल एक-एक करके 1955 से लेकर 1959 तक पास हुआ क्योंकि राजेंद्र प्रसाद ख़िलाफ़ थे, पुरुषोत्तम दास टंडन ख़िलाफ़ थे.

इस दौरान जाति का टकराव, धार्मिक समुदायों का टकराव साफ़ नज़र आया.

(मोदी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक में कितना मतभेद?)

गाँधी 1920 में कह रहे हैं कि हमारी लड़ाई तीन चौथाई और एक चौथाई की है. एक चौथाई मुस्लिम और तीन चौथाई हिंदू.

यहाँ तक कि गाँधी भी धार्मिक गठबंधन या मेल के बारे में सोच रहे थे, उनका कहना था कि एक चौथाई को हमें हमारे साथ लाना है. कांग्रेस ही इसकी अगुवाई कर रही थी.

हर राजनीतिक पार्टी का जो भी अंदरूनी झुकाव रहा हो, कुछ एक उनकी व्यावहारिक मजबूरियां भी हैं. घरेलू निर्वाचक मंडल के लिए उनको ख़ास तरीक़े से अपनी बात रखनी होती है, कुछ चीज़ों को समर्थन करना होता है और कुछ चीज़ों के साथ समझौता करना पड़ता है.

यह कमोबेश भारत की ताज़ा राजनीतिक तस्वीर में भी नज़र आ रहा है. भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की राजनीति धीरे-धीरे इस क़दर समाहित हो चुकी है कि उसे अब राजनीति से इतर नहीं देखा जा सकता.

हिंदुत्व का धर्मनिरपेक्षीकरण

भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना को सेक्यूलराइज़ कर दिया. मज़बूत भारत, दिलेर भारत, दृढ़ भारत, फ़ैसला करने में सक्षम (डिसाइसिव) भारत, भारत महाशक्ति है, भारत परमाणु शक्ति है, भारत ही है जो पाकिस्तान को चुनौती दे सकता है.

ये सब क्या है? यह आरएसएस और बीजेपी की जो हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना है उसका धर्मनिरपेक्ष संस्करण है. इसे मिडिल क्लास दोनों हाथों से स्वीकार कर रहा है.

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इसमें सबसे दुःखद बात है कि हम यह मानने लग गए हैं कि सहिष्णुता, सभ्यता, संवेदना, सहानुभूति, सौम्यता दरअसल कमज़ोरी हैं.

भारत के अग्रणी उद्यमी और इंफ़ोसिस कंपनी के जनक एन नारायण मूर्ति ने हाल ही में एक टेलीविज़न इंटरव्यू में कहा है कि हमको 2002 के दंगे भुला कर और आगे बढ़ना चाहिए. लेकिन कहां आगे बढ़ें, ये सवाल कोई नहीं पूछता.

फ़ैसला लेने वाला और मज़बूत नेता के अलावा जो इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा रहा है वह है 'हमें दंगा भुलाकर आगे बढ़ना चाहिए'.

इन सबके बीच सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश की नींव और बुनियाद ही सेंसेक्स हो गई है. स्टॉक मार्केट सब को संचालित कर रहा है. और यह हिंदुत्व का धर्मनिरपेक्ष संस्करण है.

(आलेख बीबीसी संवाददाता रूपा झा से बातचीत पर आधारित. राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ज्योतिर्मय शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं.)

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