कारगिलः दाल-चावल और सत्तू पर ज़िंदा 'मतदाता'

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कारगिल में सात मई को मतदान होना है लेकिन लोगों का ध्यान मतदान के अलावा खाने के ज़रूरी सामान की ज़बरदस्त किल्लत पर भी है.

लोगों की मानें तो कमी का आलम यह है कि हर साल की तरह वो इस साल भी गेहूं या जौ के सत्तू के सहारे जीवन बिताने को मजबूर हैं.

होटल में काम करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि अगर कारगिल में मांसाहारी भोजन न मिले तो लोग भूखों मर जाएं. कश्मीर घाटी के रहने वाले और कारगिल में काम रहे जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक जवान ने बताया कि वह पिछले दो-तीन महीने से चावल-दाल खाने को मजबूर हैं.

लेह से कारगिल आए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि वो अपनी सब्ज़ी लेह से मंगवाते हैं.

कारगिल से श्रीनगर के रास्ते में पड़ने वाले द्रास में भी लोगों ने अपनी यही व्यथा बताई. लोगों ने बताया कि वह भी दाल चावल या जौ का सत्तू खाकर समय बिता रहे हैं.

दरअसल हर साल ठंड के कारण श्रीनगर और लद्दाख का संपर्क सड़क से कट जाता है.

न फल, न सब्ज़ी

11,500 फ़ीट से भी ज़्यादा की ऊंचाई पर स्थित ज़ोजिला दर्रे के नाम से जाने जाना वाला संपर्क मार्ग श्रीनगर को लद्दाख से जोड़ने वाली सड़क का हिस्सा है लेकिन हर साल बर्फ़बारी के कारण इसे बंद करना पड़ता है.

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यह सड़क साल के लगभग छह महीने से भी ज़्यादा समय तक बंद रहती है, इसीलिए लोग सामान स्टॉक कर लेते हैं. लेकिन वह भी कब तक चलेगा. इस बार ज़्यादा बर्फ़बारी के कारण रास्ते को खोलने में देरी हुई है.

सड़क को साफ़ करने का ज़िम्मा सीमा सड़क संगठन का है.

कारगिल के उपायुक्त एमएस शेख के अनुसार ज़्यादा बर्फ़बारी के कारण इस रास्ते के खुलने में देरी हो रही है. वह कहते हैं, एक या दो मई को रास्ते का ट्रायल किया जाएगा. 15 मई से पहले इस रास्ते का खुलना संभव नहीं है.

अगर आप कारगिल के बाज़ार में जाएं तो आपको सब्ज़ी और फल नहीं मिलेंगे. लद्दाख से बाहर के लोगों के लिए ये आश्यर्चजनक बात होगी लेकिन स्थानीय लोग जैसे इस कमी के साथ ही बड़े हुए हैं.

लेकिन एमएस शेख दूध या सब्ज़ी की कमी से इनकार करते हैं. वह कहते हैं, "यहां दूध भी अच्छी मात्रा में उपलब्ध है. यहां चावल, आटा, चीनी सब है. कैरोसीन की कमी हुई थी."

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एमएस शेख कहते हैं कि उन्होंने अपने स्टाफ़ को भेजकर बाज़ार से प्याज़, टमाटर मंगवाए थे, हालांकि कभी-कभी थोड़ी कमी होती है. वह लोगों की इस शिकायत से इनकार करते हैं कि लोग सत्तू खाकर गुज़ारा करने पर मजबूर हैं.

खाने का संकट

लेकिन कारगिल के लोग कुछ और ही कहते हैं. कारगिल के केंद्र में स्थित खुमैनी चौक के पास दुकान चलाने वाले एक व्यक्ति ने बताया, "आपको प्याज़ कहीं नज़र नहीं आएगा. टोमाटो प्यूरी, मक्खन, यहां नहीं है. यहां आटे की किल्लत है. यहां रोज़मर्रा की हर चीज़ की कमी है. ज़ोजिला पास छह महीने बंद रहता था, इस बार तो यह और लंबा खिंच चुका है."

एक दूसरे व्यक्ति मोहम्मद हुसैन ने बेहद रोष में अपनी कहानी बयान की, "कारगिल में खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा है. अब आदमी क्या खाएगा? राशन डिपो में जब हम चीनी के लिए जाते हैं तो वह कहते हैं कि हमारे पास चीनी नहीं है. अभी हम स्थानीय सत्तू पर निर्भर हैं. वह भी खत्म हो जाएगा तो बहुत मुश्किल हो जाएगी."

यह समस्या इतनी विकट है कि जब हम लेह से कारगिल की ओर रवाना हुए तो हमारे ड्राइवर छिरिंग आंकचुक की पत्नी ने कहा कि कारगिल से बच्चे के लिए पैकेट वाला दूध ले आना. काफ़ी खोजबीन के बावजूद उन्हें कारगिल में दूध नहीं मिला.

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बाज़ार में एक अन्य व्यक्ति ने बताया, "बहुत पुराने लोग भी सत्तू खाकर अपना गुज़ारा करते थे. हम सत्तू में घी डालकर चाय के साथ खाते हैं."

मैं शाकाहारी हूं इसलिए जब शाम को खाने की तलाश में निकला तो भोजन मिलना मुश्किल था. आखिरकार शाम को एक दुकान से पैकेट बंद मक्खन मिल पाया. फिर हमारे ड्राइवर की जान-पहचान के एक व्यक्ति के घर में चावल और राजमा की सादी सब्जी मिली. सब्ज़ी के बारे में कहा जा सकता है कि उसे मात्र पानी में उबाला गया था.

अगले दिन किस्मत अच्छी थी तो एक छोटे से ढाबे में रोटी, और आलू-मटर की सब्ज़ी नसीब हुई लेकिन शाम को हारकर चाउमिन से संतोष करना पड़ा.

जोज़िला पास के हर साल करीब छह महीने तक बंद हो जाने की समस्या से निपटने के लिए सरकार दो सुरंगों के माध्यम से लद्दाख और कश्मीर घाटी को जोड़ने का प्रयास कर रही है. पूरा हो जाने पर दोनों इलाके पूरे साल चलने वाले मार्ग से जुड़ जाएंगे, लेकिन सवाल ये कि सुरंगों का काम पूरा होगा.

अक्टूबर 2012 में राहुल गांधी ने श्रीनगर से करीब 100 किलोमीटर दूर सोनमर्ग में ज़ेड मोड़ सुरंग की आधारशिला बड़े दावों के बीच रखी थी. रिपोर्टों में कहा गया था कि ये सुरंग दो लेन वाली होगी जिसकी सड़क 10 मीटर चौड़ी होगी.

दूसरी सुरंग का नाम ज़ोजिला सुरंग है जिसके बारे में कहा गया कि ये करीब 14 किलोमीटर लंबी होगी.

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उम्मीद की जा रही थी कि इन सुरंगों के कारण पूरे लद्दाख क्षेत्र के विकास को तेज़ी मिलेगी और बेरोज़गारी जैसे मसले हल होंगे लेकिन इस परियोजना को बहुत चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.

लेह फिर भी बेहतर

'लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद' के मोहम्मद शफ़ी लस्सू बताते हैं कि लद्दाख को श्रीनगर से जोड़ने वाली सुरंगों पर टेंडर हो चुका है.

लेकिन जब टेंडर की प्रक्रिया पूरी होने में इतना वक़्त लगा है तो सुरंगों को बनने में कितना वक़्त लगेगा. इस पर वह कोई सीधा जवाब नहीं देते.

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक इस सुरंग का काम 2018 तक पूरा हो जाएगा तो कुछ स्थानीय लोग इसके पूरा होने में सात से दस साल का वक़्त लगने की बात बता रहे हैं.

एमएस शेख के अनुसार सुरंगों का मामला राज्य और केंद्र सरकार के बीच का विषय है.

आम ज़रूरतों के सामान के मामले में लेह की स्थिति कारगिल से बेहतर है क्योंकि लेह हवाई मार्ग से दिल्ली और श्रीनगर से जुड़ा है. एक पुलिस अधिकारी के शब्दों में कारगिल की स्थिति लेह से सौ गुना ख़राब है.

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सड़कों के बंद होने का दूसरा असर होता है लोगों के आने जाने पर. इस मामले में भी लेह की स्थिति बेहतर है क्योंकि वहां पर एयरपोर्ट है.

अगर कारगिल के किसी व्यक्ति को श्रीनगर जाना हो तो उसके लिए यह आसान नहीं है. सेना ने आसान क़ीमतों में कारगिल के लोगों को हवाई सेवा के द्वारा श्रीनगर जाने की सेवा प्रदान की है लेकिन लस्सू मानते हैं कि यह सेवा काफ़ी अनियमित है.

लोग भी इस सेवा से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि यह बहुत कम दिनों के लिए मिलती है.

उधर एमएस शेख कहते हैं कि पिछले डेढ़ महीने में विमान ने 40 बार आना जाना किया है. वायदों और भरोसों के बीच कारगिल के लोग सात मई को मतदान करेंगे.

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