पंजाबः 'घुट रहा है' भारत के मेनचेस्टर लुधियाना का उद्योग

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लुधियाना को पंजाब का सबसे संपन्न जिला माना जाता रहा है, क्योंकि इसकी पहचान भारत के मेनचेस्टर के रूप में रही है. मगर कुछ सालों से यहाँ का उद्योग जगत मुश्किल में है और शायद यही वजह है कि अब यहाँ से एक-एक कर वो दूसरे राज्यों का रुख़ कर रहे हैं.

कई उद्योग यहाँ से जा चुके हैं जबकि कई जाने की तैयारी में हैं. औद्योगिक शहर सिकुड़ने लगा है और इस बार आम चुनाव के दौरान उद्योग जगत से जुड़े लोगों ने साफ़ कर दिया है कि उनका उम्मीदवार वही होगा जो उद्योगों को बचाने की दिशा में काम करेगा.

लुधियाना पंजाब की एकमात्र ऐसी सीट है जहाँ संघर्ष चतुष्कोणीय होता नज़र आ रहा है. यहाँ अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार के बीच बराबर-बराबर की टक्कर दिख रही है.

इस परिस्थिति का मुख्य कारण भी उद्योग ही हैं. यहाँ कांग्रेस के रवनीत सिंह बिट्टू, शिरोमणि अकाली दल के मनप्रीत सिंह अवाली, आम आदमी पार्टी के हरविंदर सिंह फूलका और निर्दलीय उम्मीदवार सिमरनजीत सिंह बैंस के बीच मुकाबला रोचक होता नज़र आ रहा है.

'पलायन पर मजबूर'

चूँकि लुधियाना औद्योगिक क्षेत्र है इसलिए मतदाताओं में एक बड़ा तबक़ा मज़दूरों का है, जो कंपनयिों की गिरती स्थिति की वजह से काफी निराश हैं.

कोलार साइकल उद्योग के चेयरमैन गुरमीत सिंह कोलार का कहना है कि लुधियाना में कपड़ा उद्योग के साथ साथ दूसरे प्रमुख उद्योगों की 'चेन उतरने लगी' है. वह कहते हैं कि भारत पूरे विश्व में साइकिल और उसके कल पुर्जों का सबसे बड़ा निर्माता है.

लुधियाना को कपड़े के साथ-साथ साइकिल उद्योग के लिए भी जाना जाता है. मगर गुरमीत कहते हैं की सरकार की नीतियों की वजह से इस क्षेत्र को बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है.

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उन्होंने बताया कि एक अन्य बड़े साइकिल निर्माता ए-वन साइकिल कंपनी ने अब लुधियाना की बजाय बिहार में कारख़ाना लगाने की ठान ली है और उनकी नई इकाई के लिए बिहार में काम भी शुरू हो गया है.

सिर्फ़ साइकिल ही नहीं दूसरे उद्योग भी निकटवर्ती राज्य हिमाचल प्रदेश जा रहे हैं या फिर हरियाणा.

सुपर फाइन इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक अजित लाकरा का कहना है कि पिछले एक दशक से लुधियाना के उद्योगों का बुरा हाल है. न पर्याप्त बिजली है, न आधारभूत संरचना और न ही सही कर प्रणाली. दस साल पहले तक जो औद्योगिक क्षेत्र फल-फूल रहा था आज उसके सामने अस्तित्व के संकट का सवाल है.

एक अन्य उद्योगपति विजय महतानी कहते हैं कि उनका उद्योग नया है और पहले तीन चार सालों तक सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. मगर अब वह कई चुनौतियों का सामना कर रहे है. विजय महतानी की 'डाइंग' इकाई है और वह कहते हैं कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बिजली की अनियमित आपूर्ति और उसकी कीमतों में बढ़ोतरी है.

वह कहते हैं, "25 प्रतिशत तक उद्योगों में गिरावट आई है. इसके मुख्य कारण हैं बिजली का महंगा होना, अनियमित आपूर्ति होना, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोत्तरी और इंस्पेक्टर राज. पंजाब में पिछले सात सालों में 20 हज़ार उद्योग और छोटी इकाइयां बंद हो चुकी हैं."

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एम एस अरोड़ा का कहना है कि पंजाब की सरकार ने उद्योगों पर जो नए तरह की कर प्रणाली थोपी है, जैसे कि अग्रिम कर, वह उद्योगों को यहाँ से जाने के लिए मजबूर कर रही है.

"अग्रिम कर पहले जमा हो जाता है. फिर उसका बकाया वसूल करने के लिए हमें चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. अफसरों के आगे-पीछे घूमना पड़ रहा है. इसलिए यहाँ से कारोबार समेट कर हम हरियाणा जा रहे हैं क्योंकि वहां इस तरह के कर नहीं हैं और उद्योगों के लिए दूसरी सुविधाएं उपलब्ध हैं."

हलांकि चुनाव लोकसभा के हैं इसलिए उद्योग जगत बहुत ज्यादा आशान्वित नहीं है. मगर उनको इतना तो लगता है कि इस चुनाव के बहाने ही सही, उनके क्षेत्र के उम्मीदवार उनकी बातों को आगे तक ले जाएंगे ताकि लुधियाना की पहचान को संरक्षित किया जा सके.

उद्योग चलाने वालों का कहना है कि अगर इंस्पेक्टर राज जल्द ही ख़त्म नहीं हुआ और बिजली सही दर पर और सही मात्रा में उपलब्ध नहीं हुई, तो उनके पास यहाँ से सब-कुछ समेटने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचेगा.

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