लोगों को फुसलाने वाले चुनावी पैंतरों की हक़ीकत

पिछले दिनों जब जयपुर में नरेंद्र मोदी की रैली हुई तो बीजेपी की तरफ़ से ये बढ़ चढ़ कर दिखाया गया कि किस तरह पहली पंक्ति में टोपी और बुरक़ा पहने कई मुसलमान मोदी का भाषण सुनने आए हैं.

इस तरह के प्रयास तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों द्वारा भी किए जाते हैं जहाँ मुसलमानों के वास्तविक मुद्दों पर ज़ोर न दे कर उनसे जुड़े सतही मुद्दों को सिर्फ़ छू कर उन्हें ख़ुश करने की कोशिश होती है.

दो साल पहले ही अपने चुनावी घोषणापत्र में समाजवादी पार्टी ने 31 वादों में से 12 वादे मुसलमानों के कल्याण के बारे में किए थे और उनसे सरकारी नौकरियों से ले कर बिना ज़मानत के ऋण और झूठे मामले हटा लेने जैसे कई लुभावने वादे शामिल थे.

(नारा ऐसा जो छा जाए और जीत दिलाए)

सत्ता में आने के बाद पार्टी ने इन वादों पर अमल करने के बजाए उन मद्दों को भुनाना ज़्यादा उचित समझा है जिनका समुदाय के कल्याण से दूर दूर का भी वास्ता नहीं रहा है, मसलन एक आईएएस अधिकारी को निलंबित करना जिसने ग़ैरकानूनी तौर पर बनाई गई मस्जिद की दीवार को ढहाने की जुर्रत की थी.

'झूठे होते हैं वादे'

जमाएतुल उलेमाए हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी कहते हैं, "मैं पूरे विश्वास के साथ कहना चाहता हूँ कि समाजवादी पार्टी हो या कोई दूसरी पार्टी, उनके चुनावी वादे.. 99 फ़ीसदी झूठ पर आधारित होते हैं.

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ये वादा बेवकूफ़ बनाने की नियत से किया जाता है. जैसे 18-20 फ़ीसदी आरक्षण के वादे को ही ले लीजिए. इसके लिए कोई ग्राउंड वर्क ही नहीं किया गया. इसको वो करना चाहें जब भी पूरा नहीं कर सकते. जो करना ही नहीं है तो इस तरह के वादे भी कर लेते हैं."

यूपीए सरकार ने मुलमानों की समस्याओं पर ग़ौर करने के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया लेकिन जब उसके सुझावों को लागू करने की बात आई तो उर्दू के विकास और मदरसे की पढ़ाई जैसे मुद्दे तो उठा लिए गए लेकिन बड़े मुद्दों जैसे रोज़गार, नौकरी में भेदभाव और आवास जैसे मुद्दों को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया.

अभी भी स्कूलों में मुसलमानों के बच्चों का पंजीकरण नगण्य है,सरकारी ऋण योजनाओं और सरकार के शो केस मनरेगा का लाभ मुस्लिम समाज को नहीं या बहुत कम मिल पा रहा है.

(चुनाव के वक्त मदरसों की ओर दौड़ते नेता)

मौलाना महमूद मदनी कहते हैं, "सब हिंदुस्तानियों को बराबर का मौक़ा मुसलमानों के लिए ही नहीं सबके लिए ज़रूरी है. दूसरी ज़रूरत तालीम की है, जो सब भारतवासियों के लिए ज़रूरी हैं. लेकिन मुसलमानों के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है और ये कहना बिल्कुल ग़लत होगा कि अगर इसमें मुसलमान को प्राथमिकता मिलेगी तो दूसरे लोगों के साथ भेदभाव होगा क्योंकि अगर उसे इससे फ़ायदा होगा तो इससे देश को भी फ़ायदा होगा."

मुसलमानों की जरूरत

मौलाना महमूद मदनी के मुताबिक मुसलमानों के लिए तीसरी बड़ी चीज़ है रोज़गार के अवसर और इंसाफ़. वो कहते हैं, "इन सब में सबसे बड़ी चीज़ है इंसाफ़. अगर इंसाफ़ नहीं होगा जो उस भारतीय समाज का ख़्वाब जो बड़ों ने आज़ादी के बाद देखा था वो कभी पूरा नहीं होगा."

पिछले साल जब मोदी ने एक मौलाना द्वारा दी गई टोपी के लेने से इंकार कर दिया था तब भी उनकी बहुत आलोचना हुई थी कि उन्होंने मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया था.

जानेमाने समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता के मुताबिक ये नरेंद्र मोदी का एक तरह से सांकेतिक इम्तिहान था जिसमें वो फ़ेल हो गए.

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गुप्ता कहते हैं, "असल में ये लोग मोदी की टोपी परीक्षा ले रहे थे कि वो ये टोपी पहनेंगे या नहीं लेकिन मोदी ने उसे पहनने से इंकार कर दिया. ये उनकी मर्ज़ी थी. इसपर ज़्यादा चर्चा नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि अगर वो टोपी पहन भी लेते तो मुसलमानों का कोई बहुत भला नहीं होने वाला था. लेकिन मोदी को भी ये सोचना चाहिए था कि जब वो नागालैंड जाते हैं तो वहाँ दी गई टोपी पहनते हैं. उसी तरह पंजाब में जब उन्हें पगड़ी दी जाती है तो उसे पहनने में उन्हें कोई समस्या नहीं होती हैं."

दीपांकर गुप्ता इस पूरे मुद्दे को एक समाजशास्त्रीय ट्विस्ट देते हुए कहते हैं, "सिख हो, या बौद्ध हों, या राजपूत हों... ये सब हिंदू फ़्रेंमवर्क के अंतर्गत आते हैं. शायद मोदी के लिए मुस्लिम धर्म अलग है. वो सोचते हैं कि उसके प्रतीक या पोशाक को वो नहीं पहनेंगे क्योंकि वो उनके धर्म से मेल नहीं खाता."

मोदी का टोपी से रिश्ता

लेकिन एक दूसरा द़ष्टिकोण ये भी है कि जो लोग मोदी के टोपी न लेने पर ऐतराज़ करते हैं, वो वही लोग हैं जो ईद पर टोपी पहनने और इफ़्तार पार्टी में शिरकत करने के जेस्चर भर से ही मोहित हो जाते हैं.

(किसका देश, किसका लोकतंत्र?)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, "इफ़्तार पार्टियों में जिनका दीन ईमान से वास्ता हो या न हो, वो भी टोपी पहन लेते हैं और वो भी गले में अरब छापे के गमछे लपेट लेते हैं और दिखाने की कोशिश करते हैं कि वो भी रोज़ कबाब, बिरयानी और पुलाव खाते हैं. खाना और वोट बटोरने की मंशा उन्हें वहाँ ले जाती है. इसको मैं टोकेनिज़्म कहूँगा."

भारतीय लोग हमेशा से ही ठोस मुद्दों पर टोकेनिज़्म को तरजीह देते आए हैं. उत्तर प्रदेश में मायावती का दलित नेताओं की याद में मूर्ति और पार्क बनवाना इसी तरह का एक उदाहरण है. कुछ लोगों का मानना है कि इसी पैसे का इस्तेमाल दलितों और गरीबों के लिए स्कूल और अस्पताल बनवाने में किया जा सकता है.

इसके ठीक विपरीत दूसरा तर्क है कि मायावती ने दलितों को स्कूल और अस्पताल भले ही नहीं दिए हो लेकिन उन्होंने उन्हें गरिमा और सम्मान ज़रूर दिया है.

समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते है, "ये टोकेनिज़्म ज़रूर है लेकिन इसका फ़ायदा भी देखिए. मायावती हारे या जीते ये मूर्तियाँ तो हमेशा रहेंगी और ये मूर्तियाँ एक प्रतीकात्मक शक्ति बन जाएंगी. जब भी उनके वोटर मूर्ति के आसपास आएंगे, वो यही कहेंगे कि इसे मायावती ने बनाया था. अगर वो मूर्ति नहीं होती तो मायावती का नाम शायद इतना नहीं लिया जाता. पटेल की जो मूर्ति नरेंद्र मोदी बनवा रहे हैं उसके बारे में भी यही बात कही जा सकती है."

महिला सशक्तिकरण का सच

भारत में एक महिला राष्ट्रपति चुनवा कर अपनी पीठ ठोंकी गई और इसे महिला सशक्तीकरण का बहुत बड़ा उदाहरण बताया गया.

लेकिन बहुत से लोग भूल गए कि ये वही देश है जहाँ अभी भी भ्रूण परीक्षण करा कर बहुत सी बालिकाओं को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है और अगर उन्हें जीवित भी रहने दिया जाता है तो लड़कों की तुलना में न तो उन्हें बेहतर शिक्षा मिलती है और न ही बेहतर खाना.

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संसद में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण की बात हर दल करता है लेकिन वास्तविकता यही है कि वर्तमान लोकसभा के 545 सदस्यों में महिलाओं की संख्या मात्र 59 है.

प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, "संसद में महिलाओं की संख्या ही टोकेनिज़्म का उदाहरण नहीं है. संसद में महिला आरक्षण बिल पर बहस के दौरान समाजवादी मिज़ाज के शरद यादव ने 'परकटी' कहकर महिलाओं के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया था या जिस तरह के शब्द मुलायम सिंह महिलाओं के इस्तेमाल करते आए हैं, वो भी काबिलेऐतराज़ हैं. महिलाओं को ले कर हमारे राजनेता हमेशा से दोहरे मापदंड अपनाते रहे हैं."

(हिंदुत्व और गैर हिंदुत्व के बीच फंसी भाजपा)

बहुत पहले सत्तर के दशक में जब अरब इसराइल युद्ध के बाद पेट्रोल के दाम बढ़े थे तो इंदिरा गाँधी ने बग्घी में संसद जा कर ये संदेश देने की कोशिश की थी कि वो ऐसा कर पेट्रोल के ख़र्चे में कमी करना चाह रही हैं.

सत्ता का लालच

उसी तरह जब बाढ़ आती है तो राजनेता हवाई जहाज़ या हेलिकॉप्टर से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करते हैं लेकिन इससे बाढ़ पीड़ितों का कोई भला नहीं होता, सिवाए इसके कि उनके हवाले एक हेलिकॉप्टर कर दिया जाता है जिसका इस्तेमाल बाढ़ पीड़ितों के लिए खाना गिराने में किया जा सकता था.

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दीपांकर गुप्ता कहते हैं, "पता नहीं नेताओं को इसकी आदत कहाँ से पड़ गई. पहले शायद सड़कें वगैरह नहीं होती थी जिसकी वजह से इसका चलन शुरू हुआ होगा. लेकिन आजकल तो इसका कोई औचित्य नहीं है क्योंकि सारे चित्र सेटेलाइट पर उपलब्ध होते हैं. ये भी एक तरह से रिवाज बन गया कि इसे तो करना ही पड़ेगा."

वहीं पुष्पेश पंत कहते हैं, "जब राहुल गांधी किसी दलित के यहाँ पूरी भाजी खाते हैं और देखने वाला देखता है कि चमचमाती हुई नई स्टील की थाली में उनके लिए खाना परोसा गया है. लेकिन क्या ये हिंदुस्तान के निर्धन, दलित परिवार की हक़ीक़त है? क्या वो रोज़ इस तरह की पूरी भाजी खाते हैं? ये बातें कहने की कुछ और होती हैं और करने की कुछ और."

टोकेनिज़्म का सबसे बड़ा उदाहरण शायद भारतीय प्रजातंत्र है जहाँ ज़ोर वादों को पूरा करने पर न हो कर इस बात पर है कि अगला चुनाव आने तक किस तरह सत्ता से चिपके रहा जाए. सवाल उठता है चुनावी वादे पूरे कैसे किए जाएंगे ? लेकिन भारत में वादे पूरे करने के लिए कब किए जाते हैं!

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