मधेपुरा में पप्पू पास होगा?

पप्पू यादव

लंबे समय तक जेल में रहने के बाद पप्पू यादव चुनावी जंग में उतर आए हैं. पप्पू यादव संसद में पहुँचने को बेक़रार हैं. उनकी चुनावी रैली हो, जनसभा हो या जनसंपर्क अभियान, हर जगह पप्पू यादव सबका समर्थन, हर जाति और हर धर्म के लोगों से आशीर्वाद मांग रहे हैं.

तमाम कोशिशों के बावजूद पप्पू यादव का अतीत उनका पीछा नहीं छोड़ रहा, जनता को रिझाने की उनकी कोशिश की कई तबक़ों में तारीफ़ होती है और कई वर्ग खुलकर उनके साथ हैं, लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है, जो है तो चुपचाप लेकिन उसे उनकी बातों पर भरोसा नहीं.

एक तबक़ा उन लोगों का भी है, जो वर्षों पहले मधेपुरा में कुख्यात जाति संघर्ष का गवाह रहा है और वो पप्पू यादव की बातों में आने को तैयार नहीं. फिर भी पप्पू यादव संसद में जाने के लिए अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार करने में जी-जान से जुटे हैं.

ज़ाहिर है पप्पू यादव अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करते हैं, उसे साज़िश बताते हैं और राजनीति से प्रेरित भी. लेकिन सच ये भी है कि उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए जो हलफ़नामा दाखिल किया है, उससे पता चलता है कि उन पर अभी 26 मामले चल रहे हैं.

इनमें से 17 ऐसे मामले हैं, जिनमें आरोपपत्र दाख़िल हो चुके हैं. सात ऐसे मामले हैं, जिनमें उनके ख़िलाफ़ संज्ञान लिया गया है, जबकि दो मामलों में जाँच चल रही है. लेकिन अजित सरकार हत्याकांड में बरी होने के बाद पप्पू यादव जनता के बीच फिर पहुँचे हैं. हालाँकि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की है, जो विचाराधीन है.

लेकिन क्या वे अपनी आपराधिक छवि से उबर पाए हैं? क्या जनता उन पर भरोसा कर पाएगी? क्या जाति संघर्ष में यादवों का प्रतिनिधित्व करने वाले पप्पू यादव अन्य जातियों का दिल जीत पाएँगे? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब इतने आसान नहीं.

जाति संघर्ष की 'उपज'

वर्षों पहले मधेपुरा और आसपास के इलाक़ों में सवर्णों और यादवों के संघर्ष के बीच पप्पू यादव का उदय दंतकथा के किसी नायक की तरह है. कहानियाँ कई हैं, लेकिन पप्पू यादव ख़ुद उनकी तस्दीक़ नहीं करते. उनके लिए तो उनका जीवन बस संघर्ष की एक दास्तान है.

बीबीसी के साथ लंबी बातचीत में पप्पू यादव कहते हैं, "संघर्ष की जड़ में शोषण होता है. इतिहास गवाह है कि जब-जब शोषण हुआ है, विचारों का संघर्ष हुआ है. उस समय बिहार में शोषण पराकाष्ठा पर था."

पप्पू यादव उसे जाति संघर्ष नहीं मानते. वो कहते हैं, "संघर्ष तो अमीर और ग़रीब के बीच होता है और उसे जाति संघर्ष बना दिया जाता है. बचने के लिए. हम संघर्षरत हुए. हम आगे आए."

वर्षों से मधेपुरा की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार देवाशीष बोस उन दिनों का ख़ाका कुछ यूँ खींचते हैं, "लोग अपने आप को असुरक्षित महसूस करते थे और जातीय ख़ेमेबाज़ी स्पष्ट रूप से दिखती थी, समाज विभाजित हो गया था. लोग अपने-अपने कुनबे में सिमटे हुए थे. वे आतंकित थे."

कहानी वर्चस्व और जातीय संघर्ष से शुरू हुई और फिर ऐसे मुक़ाम पर पहुँचीं, जब इलाक़े में पप्पू यादव और आनंद मोहन सिंह की समानांतर सरकार चलती थी. मधेपुरा में यादवों और राजपूतों के संघर्ष ने न सिर्फ़ बिहार की राजनीति पर असर डाला बल्कि समाज में गहरी दरार पैदा कर दी.

यादवों में अपना वर्चस्व स्थापित करने के बाद पप्पू यादव अपने कुनबे में संघर्ष के प्रतीक तो बने लेकिन समय के साथ-साथ उनका राजनीतिक इस्तेमाल भी ख़ूब हुआ. एक समय ऐसा भी था, जब बिहार में उनके ख़िलाफ़ रेड अलर्ट जारी था.

मुख्यधारा में आने की कोशिश

उस समय पप्पू यादव को समाज की मुख्यधारा में लाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ पत्रकार देवाशीष बोस कहते हैं, "उस समय पुलिस और प्रशासन पप्पू यादव के पीछे था. पप्पू यादव का कई राजनेताओं ने इस्तेमाल किया. पप्पू यादव भागे-भागे फिर रहे थे. वे टूट चुके थे. पप्पू यादव ने मुझसे संपर्क किया, वे आत्मसमर्पण करके समाज की मुख्यधारा में आना चाहते थे. पप्पू यादव ने मुझे लिख कर दिया था. मैंने डीआईजी से संपर्क किया था और उनसे मिलवाया था. उसके बाद ही पप्पू यादव समाज की मुख्यधारा में आए."

मधेपुरा में रहने वाले और उसे जानने वाले आज भी 1990 के दशक को याद करके सिहर जाते हैं, जब आए दिन इन दोनों नेताओं के बीच संघर्ष की घटनाएँ होती रहती थीं. गोलीबारी होती थी, तोड़-फोड़ होती थी और अपहरण भी. चुनावी संघर्ष भी उन दिनों चरम पर था. यादवों और राजपूतों के बीच की लड़ाई राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी दिखती थी.

पप्पू यादव ने कई चुनाव लड़े और जीते, तो आनंद मोहन सिंह ने भी बिहार के कई इलाक़ों से अपने राजनीतिक करियर को चमकाने की कोशिश की. इस बीच आरक्षण विरोधी और समर्थक आंदोलन ने इस जातीय संघर्ष को और हवा दी.

अपने नाम न बताने की शर्त पर मधेपुरा के एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया, "पप्पू यादव और उनके समर्थकों को देखकर लोगों को 1991 की घटना याद आ जाती है. मधेपुरा में नंगा नाच हुआ. एक ख़ास वर्ग के लोगों पर हमले हुए. वो भुलाया नहीं जा सकता. कई परिवार यहाँ से विस्थापित हो गए, कई बिजनेसमैन यहाँ से विस्थापित हो गए. मधेपुरा के लोग उन दिनों की घटना याद करते हैं तो उनकी रूह काँप जाती है."

चर्चित मुठभेड़

उसी दौरान शरद यादव की सभा से लौटते समय पप्पू यादव और आनंद मोहन के समर्थकों के बीच हुई भंगहा में हुई गोलीबारी में अजय सिंह की मौत हो गई थी. उस समय मधेपुरा में उपचुनाव था और शरद यादव उम्मीदवार थे.

इस मामले में एफ़आईआर दर्ज है और पप्पू यादव को भी नामजद बनाया गया है. अजय सिंह के भतीजे विमल कुमार सिंह कहते हैं कि उस समय एक रैली हुई थी और रैली के बाद तोड़-फोड़ हुई थी. अजय सिंह आनंद मोहन सिंह के समर्थक थे.

लौटते समय गोलीबारी में उनकी मौत हो गई. विमल सिंह बताते हैं, "केस अभी चल रहा है. इस मामले में पप्पू यादव को भी नामजद किया गया है." इन सबमें सबसे अजीब बात ये है कि अजय सिंह का मृत्युप्रमाण पत्र अब भी परिवार को नहीं मिला है. उस समय मधेपुरा की राजनीति का हिस्सा रहे अजय सिंह का परिवार उस सदमे से उबर नहीं पाया है. उन्हें आनंद मोहन सिंह से भी शिकायत है, जो कभी उनकी मदद के लिए नहीं आए.

वे कहते हैं कि इस मामले में इससे बढ़कर सबक़ क्या हो सकता है कि जिसके लिए अजय सिंह खड़े हुए, वे यहाँ देखने तक नहीं आए. रूंधे गले से विमल सिंह कहते हैं, "हम लोगों का तो सब कुछ समाप्त हो गया. उस समय हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी. अब नहीं है. बच्चों को पढ़ाने में समस्या है. लड़की की शादी में दिक़्क़त होती है. कोई देखने वाला नहीं है."

अजय सिंह की बेटी अभी ग्रेजुएशन कर रही है. उस समय वो सिर्फ़ एक महीने की थी, जब उनके पिता की मौत हुई थी लेकिन पिता के न रहने की पीड़ा उनकी बातों से साफ़ उभर कर आ जाती है. कहती हैं, "जब एक बच्चे के सर पर पापा का हाथ नहीं रहता है तो दिक़्क़त होती है. कभी मैंने पापा शब्द का इस्तेमाल ही नहीं किया. पढ़ाई-लिखाई चाचा लोग कराते हैं लेकिन पापा और चाचा में थोड़ा बहुत अंतर तो होता ही है."

इसके बाद एक और बहुचर्चित मुठभेड़ पामा में हुई जब पप्पू यादव के काफ़िले पर हमला हुआ. दोनों ओर से गोलीबारी हुई. इस गोलीबारी में पप्पू यादव के क़रीबी संजय श्रीवास्तव मारे गए.

आतंक और डर के आरोपों को पप्पू यादव सिरे से ख़ारिज करते हैं. वे कहते हैं, "कौन कहता है. कौन आरोप लगाता है. आप उनसे ही पूछिए. मैं तो सिर्फ़ इतना ही जानता हूँ कि वही लोग आरोप लगाते हैं जो कमज़ोर हैं. जो संघर्ष करना नहीं जानते. जो जनता के लिए नहीं जीते, जो उनसे प्रेम नहीं करते. जितना सब लोगों ने लूटा है, उतना तो हमने बाँटा है. आरोप लगा देना और आरोप साबित करना अलग बात है. ये सब तथ्य से परे है."

अजित सरकार हत्याकांड में दोषी ठहराए जाने के बाद पप्पू यादव के चुनाव लड़ने पर रोक लग गई थी लेकिन पटना हाई कोर्ट ने पिछले साल उन्हें बरी कर दिया. पप्पू यादव ने अपने राजनीतिक जीवन में कई पार्टियाँ बदली हैं. राष्ट्रीय जनता दल से उनका रिश्ता उतार-चढ़ाव वाला रहा है. वे समाजवादी पार्टी से भी जुड़े रहे हैं और राम विलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी से भी. उन्होंने अपनी पार्टी भी बनाई थी.

इस बार उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल का दामन थामा है लेकिन ज़ोर अपने काम पर है. बाहुबली, रॉबिनहुड और डर-आतंक के आरोपों से अलग पप्पू यादव अपने चुनाव प्रचार में स्थानीय होने, हमेशा उपलब्ध होने और लोगों की सेवा करने के बदले में वोट मांग रहे हैं.

'परोपकार'

पप्पू यादव कहते हैं, "मैं हर व्यक्ति की इज़्ज़त करता हूँ और हर व्यक्ति की मदद. कोई घटना नहीं, जिस घटना में पप्पू यादव न पहुँचा हो. उसने मदद न की हो." लोगों की तालियों के बीच पप्पू यादव का काफ़िला आगे बढ़ जाता है. पप्पू यादव बड़ों से आशीर्वाद मांगते हैं, हर जाति-धर्म के लोगों के इलाक़े में जाते हैं और स्थानीय मुद्दे उठाते हैं.

वे कहते हैं, "हम तो यहाँ के पुत्र हैं. मेरा तो यहाँ जन्मस्थान है. जनता नहीं है कोई. पिता है, माँ है. सगा भाई है. वो मेरे हैं और मैं उनका हूँ. पप्पू को जो आप देख रहे हैं, उसमें पूरा संस्कार भरा हुआ है. कोसी और मिथिला की महक का. इसी संस्कार की बदौलत विचारों से कभी समझौता नहीं करता. ईमानदारी मेरी पूँजी है. लोगों के लिए सब कुछ देकर जीना. सबसे प्रेम करना. इसके अलावा मैंने कुछ नहीं सीखा."

कई स्थानीय लोग भी पप्पू के 'परोपकारी पक्ष' से काफ़ी प्रभावित हैं. पिछले दिनों आमिर ख़ान के कार्यक्रम सत्यमेव जयते में जब 'माउंटेन मैन' कहे जाने वाले दशरथ माँझी पर चर्चा हुई, तो पप्पू यादव वहाँ भी पहुँच गए और उनके परिजनों की मदद की.

ऐसे ही एक व्यक्ति शिबू साह से हमारी मुलाक़ात हुई, जिनका घर आग में तबाह हो गया था. उन्होंने बीबीसी को बताया, "पप्पू यादव ख़ुद ही आए, उन्होंने तुरंत 20 हज़ार रुपए की मदद की और एक लाख रुपए देने का आश्वासन दिया. पप्पू यादव बिजली, सड़क, बच्चों की पढ़ाई और हर समस्या में मदद करते हैं. आगे भी उनसे यही उम्मीद है."

जाति संघर्ष में यादवों का नेतृत्व करने वाले पप्पू यादव अब हर जाति-धर्म के लोगों के दरवाज़े तक पहुँच रहे हैं. सीधे-सीधे यादवों की बात करने से परहेज़ करते हैं. ब्राह्मणों और राजपूतों के गाँव में भी वे जाते हैं. लोगों की तालियों के बीच ये कहना नहीं भूलते कि जो भी उनका है, उसे बेचकर भी वे जनता की मदद करना नहीं भूलेंगे.

आशंका

कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें लगता है कि पप्पू की वापसी से कहीं पुराने दिन तो नहीं लौट आएंगे. एक व्यक्ति अपनी पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताते हैं, "लोग कहते हैं कि पप्पू यादव में बदलाव आया है लेकिन उनके आसपास के लोग कतई नहीं बदले हैं. वे वैसे ही हैं. इसलिए आतंक तो है ही."

वरिष्ठ पत्रकार देवाशीष बोस भी मानते हैं कि नेचर और सिग्नेचर नहीं बदलता. वे कहते हैं, "मैं ऐसा नहीं मानता कि वे समाज सेवा नहीं करते या वो आपराधिक छवि के हैं. लेकिन मैं दो टूक शब्दों में ये ज़रूर कहूँगा कि उनका नज़रिया और सामाजिक दृष्टिकोण कल था, वो आज भी कहीं न कहीं है."

जब मैं आनंद मोहन सिंह के गाँव पँचगछिया पहुँचा, तो उनके भाई मदन कुमार सिंह ने खुलकर तो कुछ नहीं बोला, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि लोगों का झुकाव इस बार भाजपा की ओर ज़्यादा है. उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि पप्पू यादव के समर्थकों ने संपर्क करने की कोशिश की थी.

तो पप्पू यादव की असली मुश्किल अपनी उस छाया से निकलने की है, जो उन पर हावी रही है और वो उनके जीवन से इतनी आसानी से नहीं जाएगी.

(क्या आपने बीबीसी हिन्दी का नया एंड्रॉएड मोबाइल ऐप देखा? डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार