250 सीटें जीतने वाले तय करेंगे इस बार का सिकंदर?

  • 30 अप्रैल 2014
मतदान

चुनाव जब लंबे चलते हैं तो उनके बीच ही काफ़ी सारी बातें बदल जाती हैं, जैसे चुनाव अभियान, चुनावी मुद्दे और इसके बरअक्स मतदाताओं का रुझान. बुधवार को सातवें चरण का मतदान हो रहा है और उसके बाद भी दो चरण बाक़ी रहेंगे.

अगर सातवें चरण को छोड़ दें तो जिन 349 सीटों के लिए पहले वोट डाले जा चुके हैं, वहां धूल इतनी उड़ी है और शोर इतना हुआ है कि यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि लोग किस लहर और हवा से प्रभावित होकर वोट दे रहे हैं.

नौ में से छह चरणों के मतदान के बाद इस आकलन की ओर बढ़ा जा सकता है कि केंद्र में अगली सरकार का स्वरूप क्या होगा. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जिस आक्रामक ढंग से अपना चुनाव अभियान शुरू किया, उसने सत्ताधारी कांग्रेस शुरू में बैकफ़ुट पर रही.

भाजपा ने ’अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा देकर राष्ट्रपति प्रणाली वाली चुनाव की शैली अपनाई. नरेन्द्र मोदी अपनी तीखे व्यंग्यात्मक शैली में विकास के साथ गांधी परिवार व केन्द्र सरकार पर निशाना साधते रहे.

लो प्रोफ़ाइल

उधर दस साल राज करने के बाद कांग्रेस लो प्रोफ़ाइल रही. उनके पास अपनी सरकार की उपलब्धियों पर फ़ोकस करने के अलावा कोई ख़ास विकल्प था भी नहीं.

अब जब चुनाव अपने निर्णायक दौर मे आ रहा है, तो चुनावी अभियान, प्रचार, शोर और चुहल.. सब अपना विन्यास बदल रहे हैं. मसलन बात विकास से शुरू हुई थी, वह सांप्रदायिकता बनाम सेक्युलरिज्म के रास्ते होते हुए अब नरेन्द्र मोदी और गांधी परिवार पर व्यक्तिगत आक्षेपों तक आ पंहुची है.

हर दिन चुनाव का विमर्श कई सीढ़ियां नीचे उतरता दिख रहा है. इसका असर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में देखने को मिलेगा जहां जातीय समीकरण चुनावों में हावी रहता है. यदि हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति परंपरागत जातीय समीकरणों को तोड़ पाती है तो भाजपा को इसका अच्छा लाभ होगा.

हालांकि बिहार में ऐसा होता नहीं दिख रहा है जहां लालू यादव अपने जातीय जनाधार के चलते बढ़त बनाने की स्थिति में नज़र आते हैं.

संख्या पर पकड़ किसकी

1996 से 2004 तक लोकसभा चुनावों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि कुल 543 में से कांग्रेस और भाजपा दोनों को मिलाकर लगभग 300 सीटें मिलती रही हैं तथा बाक़ी सीटें अन्य दलों के खाते में जाती रही हैं.

अन्य दलों की सफलता 2004 में अधिक रही और भाजपा (138) व कांग्रेस (145) की सीटें 283 तक ही रह गई.

1999 में कांग्रेस को उसके इतिहास में सबसे कम 114 सीटें मिली थीं लेकिन उसका लाभ भाजपा को नहीं मिला. भाजपा को 1999 में भी 182 सीटें ही मिली जो उसे 1998 में मिली थी.

साल 2004 में भाजपा को लगभग 50 सीटों का नुक़सान हुआ और कांग्रेस को 30 सीटों का लाभ हुआ. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को लगभग 60 सीटों का फ़ायदा हुआ जबकि भाजपा को 2004 की तुलना में लगभग 20 और सीटों का नुक़सान हुआ और वह 116 सीटों पर सिमट गई.

इन सारे चुनावों में कांग्रेस-भाजपा से इतर दलों को लगभग 250 सीटें मिलती रही हैं.

इसकी वजह यह है कि कई राज्यों में भाजपा और कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं है. इन राज्यों में बसपा, सपा, तृणमूल, द्रमुक, बीजद आदि दलों की प्रभाव है।

क्या ये चुनाव अलग होंगे

सर्वेक्षणों की बात छोड़ दें, तो 2014 के आम चुनाव का जो रुख़ और विभिन्न आकलन सामने आ रहे हैं वे इसी पूर्व अनुभव के अनुरूप चुनाव परिणाम की तस्वीर पेश करते हैं.

नरेन्द्र मोदी की हवा को लेकर मतभेद हो सकता है लेकिन भाजपा के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के पूरे संकेत हैं. भाजपा को होने वाले इस लाभ का ख़मियाज़ा कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा, यह भी स्पष्ट दिख रहा है. कथित मोदी लहर के बावजूद विभिन्न राज्यों की पार्टियों की सेहत पर कोई बड़ा विपरीत प्रभाव पड़ते नहीं दिख रहा है.

आपातकाल के मुद्दे पर उठी कांग्रेस विरोधी लहर में 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी की लहर 295 सीटों के साथ हिन्दी भाषी राज्यों तक सीमित रही थी और दक्षिणी राज्यों ने कांग्रेस का साथ दिया था.

वर्ष 2014 के चुनाव में दक्षिणी राज्यों में कांग्रेस का जनाधार खिसकता दिख रहा है लेकिन इसका सीधा फ़ायदा भाजपा के पक्ष में शायद न जाये क्योंकि भाजपा को वहां अभी अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है.

किधर रुख़ होगा छोटे दलों का

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कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाने का दावा करने वाले कई दल सपा, बसपा, तृणमूल, जदयू आदि अप्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिकता विरोध के चलते कांग्रेस के क़रीब नज़र आते हैं.

यदि नरेन्द्र मोदी की भाजपा को 200 से अधिक सीटें मिलती हैं तब तो 272 का जादुई आंकड़ा छू पाना चुनाव के बाद बनने वाले गठबंधन के लिए मुश्किल नहीं होगा अन्यथा तीसरे विकल्प की गुंजाइश को ख़ारिज नहीं किया जा सकता जिसमें सरकार को बाहर से समर्थन कांग्रेस का हो.

पिछले दो दशकों में देश ने एनडीए और यूपीए सरकारें देखी हैं और दोनों ही गठबंधनों में तृणमूल, डीएमके, लोजपा जैसे दल शामिल रहे हैं.

चूंकि छोटे दलों के बीच अंतर्विरोध गहरा है जैसे ममता बनाम वामदल, सपा बनाम बसपा. ऐसे में किसी गठबंधन में जाना इसी अंर्तविरोध पर आधारित होगा. वैसे सपा, बसपा व वामदलों का झुकाव यूपीए की ओर होगा तो अपने राज्यों में प्रभावी होने के ख़ातिर डीएमके, तृणमूल किसी के साथ भी जा सकते हैं.

इन दलों में कई नेता ऐसे हैं, जिन्हें नीतीश कुमार की तरह भाजपा से उतना गुरेज़ नहीं है, पर नरेन्द्र मोदी से है. अभी तक के बयान देखे जाएं तो इनमें ममता बनर्जी, मायावती और जयललिता तीनों शामिल हैं. नवीन पटनायक की राय मोदी के बारे बहुत उभर कर नहीं आई है, पर पूर्व में वे भाजपा के साथ साझीदार रहे हैं.

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