साल में छह महीने रहूँगा लखनऊ में: जावेद जाफ़री

  • 30 अप्रैल 2014
जावेद जाफ़री लखनऊ में बच्चों के साथ इमेज कॉपीरइट MANISH MISHRA

जो थोड़े बड़े लोग हैं, वे जावेद जाफ़री को सुभाष घई की फ़िल्म 'मेरी जंग' के ब्रेक डांस के वक़्त से जानते हैं. जो अभी बहुत बड़े नहीं है, वे बूगीवूगी के प्रजेंटर होने के नाते.

वह कॉमेडियन जगदीप के बेटे हैं और ख़ुद गहरी कॉमेडी कर सकते हैं. हाल तक गंभीरता को उनके बहुमुखी चरित्र के पहलुओं में नहीं गिना जाता था. पर इधर लखनऊ उन्हें नई निगाहों से देख रहा है.

वहां वह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह और प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी की तरफ़ से ताल ठोंक कर उतरे हैं.

जींस पर कुर्ता औऱ गले में गमछा पहने जावेद जाफ़री इन दो सियासी महारथियों के बरक्स एक आम आदमी की तरह ख़ुद को पेश कर रहे हैं.

जावेद जाफ़री तड़के पाँच बजे से ही चुनाव प्रचार पर निकल जाते है. उनके साथ लम्बी चौड़ी भीड़ नहीं होती. पर लोग उत्सुक होते हैं. बच्चे, नौजवान और उनके माता-पिता. ‘वो देखो बूगीवूगी वाला...’, बच्चों को मांएं बताती हैं उनकी उंगली पकड़े हुए.

अलबेला अंदाज

जावेद को कई नुक्कड़ सभाओं को संबोधित करना होता है इसलिए वह लोगों को सलाम करते हुए आगे बढ़ जाते हैं. जावेद वह सब कर रहे हैं, जो शायद राजनाथ सिंह और रीता बहुगुणा कभी न करें, अनौपचारिक बातचीत, लोगों से सीधे सम्पर्क और उन्हें हंसा पाने का नैसर्गिक दम. और उनका टारगेट ऑडियेंस वो है जो आम तौर पर सियासी बात करने वाले लोग नहीं होते.

जावेद बड़े शायराना अंदाज में कहते हैं, "ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रजा क्या है". कुछ लोग दाद भी देते हैं.

बॉलीवुड के ग्लैमर से लखनऊ की सियासत में कैसे आ पंहुचे? जावेद बीबीसी को बताते हैं, "जब कोई बाप अपनी बेटी की शादी करने जाता है तो क्या लड़के के घर वाले उस लड़की से शादी और बच्चा पैदा करने का अनुभव पूछते हैं, नहीं न तो फिर मुझसे ये सवाल क्यों पूछा जाता है. मुझे तो आम लोगों के साथ जुड़ने और उनकी तकलीफ़ों को दूर करने का ख़ासा अनुभव है."

उनकी सभाओं में बहुत भीड़ नहीं होती. पर लोग उनको ग़ौर से सुनते है. बीच-बीच में तालियां बजती हैं. ये तालियां किसके लिए हैं, जावेद की बात में दम के लिए? मैं अपने बगल में खड़े नीतीश से पूछता हूँ कि जावेद को लोग सुनने आते हैं या वो अपना समर्थन भी देंगे इस पर नीतीश कहते है, ‘लोगों की भीड़ ज़रूर कम है काफ़ी लोग जावेद का दिल से समर्थन करते हैं.’

कई जगहों पर भीड़ उनको केवल देखने भर के लिए ही होती है. कुछ लोगों का कहना है कि अंदाज़ फ़िल्मी है तो पता नहीं असल में उनका रूप क्या है? फ़िल्मी पर्दे से असलियत का वास्ता होगा या नहीं इसका संशय कुछ लोगों के मन में ज़रूर दिखा.

नीयत पर शक नहीं

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Image caption लखनऊ से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह चुनाव मैदान में हैं.

टेढ़ी बाज़ार के संकरी गली में दर्जी की दुकान चलाने वाले नईम जावेद से ख़ुश हैं. नईम कहते हैं की जावेद की बातों में काफ़ी सच्चाई है उनकी नीयत पर शक़ नहीं किया जा सकता. जब वे हमारी तंग गलियों में ख़ुद चल कर आए हैं तो लगता है कि वे हमारी तकलीफ़ों को ज़रूर समझेंगे. कितना कर पाएंगे ये अलग मसला है.

मौलवीगंज के रहने वाले रईस फरहान और रमेश को भी जावेद के बातों में काफ़ी दम लगता है और वे दोनों जावेद को आम लोगों से जुड़ा नेता मानते है.

जावेद मुद्दों का ज़िक्र करते हुए भीड़ से कहते हैं, "हम लोग आज भी आज़ाद नहीं, किससे? भ्रष्टाचार, सम्प्रदायवाद से वंशवाद और जातिवाद से. इससें हमें आज़ाद होना होगा क्योंकि इससे हमारे समाज की जड़ें खोखली हो गई हैं." जावेद के कई वाक्य अरविंद केजरीवाल के भाषणों से उठाए गए लगते हैं.

जावेद बड़े दलों के नेताओं की आलोचना करते हुए कहते हैं, "ये चुनावी मौसम के मेंढक है, जो चुनाव बीतने के बाद नज़र नहीं आते हैं."

उन्होंने जनता से कहा, "मैं मुम्बई से अपना कारोबार और अपना करियर छोड़कर आया हूँ. एक आम आदमी की तरह हमें लोगों की खिदमत करनी है." वह अपने भाषण में इस बात का उल्लेख प्रमुखता से करते है कि अगर वह लखनऊ से जीत कर सांसद बनते है तो वह 365 दिन में से छह महीने यहां के लोगों के बीच रहकर काम करेंगे.

आम सहूलियत की चीज़ें

वह लखनऊ के बारे में कहते हैं कि ये नवाबों का शहर था, ये प्रदेश की राजधानी है, और हाल देखिए शहर का कितना बुरा है. आम सहूलियत की चीजें तक मयस्सर नहीं है.

जावेद के साथ चलने वाले उनके समर्थकों का समूह चुनाव प्रचार के दौरान सभी लोगों को शपथ पत्र पर लिखी कुछ वादों वाली पर्ची बाँटते हैं जिससे लोगों को जावेद की बातों पर यक़ीन हो सके.

लखनऊ के कैसरबाग और अमीनाबाद के लोग जावेद जाफ़री के भाषण पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि उनकी बातों में दम लगता है. वह एक आम आदमी की तरह मिलते-जुलते हैं.

सदर नख्खास में रहने वाले मैकेनिक नूरू मोहम्मद कहते है कि जावेद जाफ़री के अलावा हमारे मोहल्ले में किसी भी बडे़ दल का नेता हमसे मिलने नहीं आया.

जावेद हरिवंश राय बच्चन की कविता सुनाते हुए जनसभाओं में अपनी बात समाप्त करते हैं,

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती/ लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती/ असफलता एक चुनौती है इसे स्वीकार करो/ क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो/ जब तक न सफल हो / तब तक नींद चैन का त्यागो तुम/ संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम / कुछ किए बिना ही जयजयकार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

और भीड़ तालियां बजाती है.

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