'आप' ने दिल्ली की सत्ता क्यों छोड़ी?

  • 30 अप्रैल 2014
आम आदमी पार्टी नेता योगेंद्र यादव

क्या अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता छोड़ने के फैसले को सही मानते हैं? क्या वजह है कि 'आप' का चुनाव प्रचार नरेंद्र मोदी पर केंद्रित है? बीबीसी हिंदी फ़ेसबुक चैट में शामिल हुए आम आदमी पार्टी के नेता योगेंद्र यादव से बीबीसी पाठकों ने चुनाव, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी जैसे कई मुद्दों पर कई तीखे सवाल पूछे. जानिए क्या थे उनके जवाब.

आम आदमी पार्टी के नेता योगेंद्र यादव मानते हैं कि दिल्ली में उनकी पार्टी की सरकार ने बिना जनता से बात किए इस्तीफ़ा देने में जल्दबाज़ी की.

उन्होंने कहा कि इस लोक सभा चुनाव में उनकी पार्टी के लिए मुख्य प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी है और इसलिए पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल अमेठी या रायबरेली से नहीं वाराणसी से चुनाव लड़ रहे हैं.

सरकार चला पाएगी आप?

फेसबुक पाठक आरडी सुथार का सवाल था कि अगर आम आदमी पार्टी की सरकार बनती है और आप अपने तथाकथित जनलोकपाल बिल को पास कराने में विफल रहेंगे, तो क्या सत्ता छोड़कर पुन: देश को चुनाव में धकेल देंगे या इस बिल को ठंडे बस्ते में डालकर देश चलाएंगे?

योगेंद्र यादव का कहना था, अगर हमें बहुमत मिलता है और हमारी सरकार बनती हैं तब तो बिल पास न करवाने का सवाल ही नहीं होता. हमने जो वायदा किया है उसको निभाएंगे या जनता के सामने वापस जाएंगे.”

बीबीसी हिंदी और बीबीसी व्हाट्सएप पर सुनील कुमार और गोवा से युवराज का सवाल था कि जब दिल्ली में सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी ने जनता से पूछा, तो फ़िर इस्तीफ़ा देने के लिए क्यों नहीं?

इस बारे में योगेंद्र यादव का कहना था कि इस्तीफ़ा देने में उनकी पार्टी की तकनीकी रूप से ग़लत नहीं थी क्योंकि उन्होंने जनता से शुरू में जो मैन्डेट मांगा था, उसमें स्पष्ट लिखा था कि अगर ये नहीं कर पाए, तो इस्तीफ़ा देंगे.

वे कहते हैं, “लेकिन ये बात आम जनता तक नहीं पहुंची. जनता के पास हमारे इस्तीफ़े की बात पहले पहुंची और उसके कारण बाद में पहुंचे. यहां हमसे चूक हुई. मुझे लगता है कि हमें जनता के साथ समय बिताना चाहिए था और जनता यदि कहती कि दो महीने, दो हफ़्ते और टिको, तो सिर झुका कर मान लेनी चाहिए थी वो बात.”

योगेंद्र यादव ये भी कहते हैं कि उनकी सरकार के पास बहुमत नहीं था और जो मेज़़ॉरिटी जुटाने की तिकड़म करने के लिए तैयार नहीं थी, उस सरकार के पास और कोई विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि वो अपने वायदा पूरा न करने पर सरकार को छोड़ दे. वे कहते हैं कि अगर कुर्सी और वायदे में चुनना पड़े, तो आम आदमी पार्टी तो वायदे से ही चिपकेगी, कुर्सी से नहीं.

निर्माण को बढ़ावा

राजनीति में आने से पहले योगेंद्र यादव की पहचान एक चुनाव विश्लेषक या सेफ़ोलॉजिस्ट की थी.

बीबीसी हिंदी फ़ेसबुक पाठक दीपक के मित्रा ने पूछा कि चुनाव विश्लेषक के तौर पर योगेंद्र यादव के आंकड़े क्या कहते हैं, ‘आप’ को कितनी सीटें मिलेंगी 2014 के चुनाव में?

लेकिन योगेंद्र यादव कहते हैं कि इस चुनाव में वे सीट नहीं केवल वोट और वॉल्नटियर गिन रहे हैं. सीट वो गिनते हैं जिन्हें सरकार बनाने की जल्दी होती है.

देश के युवाओं में बेरोज़गारी को लेकर जो चिंता है, फ़ेसबुक पाठक सैफ़ी समीर का सवाल उससे जुड़ा था कि आम आदमी पार्टी बेरोज़गारी कैसे ख़त्म करेगी.

इस बारे में योगेंद्र यादव का कहना था, “बेरोज़गारी के सवाल पर दो तरह से काम करना होगा, एक अर्थव्यवस्था स्तर पर और दूसरी शिक्षा व्यवस्था में. पूरे देश में हज़ारों की संख्या में वोकेशनल शिक्षा की संस्थाओं का जाल बनाने की ज़रूरत है. साथ ही गांवों में छोटे-छोटे कुटीर, लघु उद्योग बनाना, निर्माण को प्रोत्साहित करना, छोटे शहरो में कृषि से जुड़े उद्योग स्थापित करना बहुत ज़रूरी है. पूरे देश में सिर्फ़ सर्विस सेक्टर की जगह, निर्माण को बढ़ावा देने की ज़रूरत है.”

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Image caption पिछले दिनों शाज़िया इल्मी का एक विवादास्पद वीडियो यूट्यूब पर सामने आया था.

शाज़िया इल्मी पर कार्यवाई क्यों नहीं?

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी की ग़ाज़ियाबाद से उम्मीदवार शाज़िया इल्मी का एक विवादास्पद वीडियो यूट्यूब पर सामने आया था जिसमें वो ये कहती हुई दिखाई दे रही हैं कि मुसलमानों को सेक्युलर न होकर सांप्रदायिक होना होगा.

विशाखापटनम से सिदार्थ दसानी ने बीबीसी व्हाट्सएप पर इसी से जुड़ा सवाल भेजा कि दूसरी पार्टियों से अलग होने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने शाज़िया इल्मी के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं की.

योगेंद्र यादव के मुताबिक शाज़िया इल्मी की बात का बतंगड़ बन गया. वे कहते हैं, “हर बातचीत के टुकड़े को उसके संदर्भ से काटकर, उसके मंतव्य से अलग करना, सार्वजनिक बयान में बदल देना, अर्थ का अनर्थ कर देना, मुझे लगता है कि राजनीति का खेल खेलते-खेलते हम भाषा से व्यंग, विडंबना और तमाम व्यंजनाओं को ख़त्म कर देना चाहते हैं. यही शाज़िया के बयान में हुआ है. वो अनौपचारिक चर्चा में यह कह रही थीं कि कांग्रेस मार्का सेक्युलरिज़म से तौबा कर लेनी चाहिए. और उससे बेहतर तो संप्रदाय की अपनी चिंता ही होगी. इसी बात का बतंगड़ बन गया. शाज़िया और कुछ भी हो सकती हैं, सांप्रदायिक नहीं.”

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Image caption इन लोक सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी, भाजपा को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानती है.

भाजपा मुख्य प्रतिद्वंद्वी

चेन्नई से मोहीद जानना चाहते थे कि अरविंद केजरीवाल ने वाराणसी को ही क्यों चुना, अमेठी या रायबरेली को क्यों नहीं? क्या पब्लिसिटी के लिए?

योगेंद्र यादव ने कहा, “राजनीति का बुनियादी उसूल है कि आप अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ़ पूरी ऊर्जा लगाएं. दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस थी इसलिए अरविंद ने शीला दीक्षित के खिलाफ़ चुनाव लड़ा. इस लोकसभा चुनाव में प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भाजपा है, इसलिए अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं. राहुल गांधी के खिलाफ़ दमदार उम्मीदवार हम पहले ही घोषित कर चुके थे.”

बीबीसी व्हाट्सएप पर कपिल गर्ग ने पूछा कि आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बनी थी लेकिन अब आप सिर्फ़ एक ही बात कह रहे हैं कि भाजपा को सत्ता में नहीं आने देना है. क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा पीछे छूट गया है?

योगेंद्र यादव का कहना था कि आम आदमी पार्टी पहले दिन से आज तक भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बिना कोई समझौता किए लड़ रही है, लड़ती रहेगी.

उन्होंने कहा, “न हमने कांग्रेस को बख्शा है, न बीजेपी या और किसी भ्रष्ट पार्टी को. नरेंद्र मोदी और बीजेपी के ख़िलाफ़ खड़े होने का मुख्य कारण ही यही है कि ये भी उसी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जैसा कि कांग्रेस. हमने नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार के प्रमाण दिए हैं, उनके द्वारा येदीयुरप्पा सरीखे भ्रष्ट नेताओं को आगे बढ़ाने पर सवाल उठाया है, इसलिए भ्रष्टाचार के सवाल को छोड़कर कुछ और करने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता.”

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