'आप' के पास कैसे पहुंची गांधी की टोपी?

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चुनाव में एक ओर जहाँ काँग्रेस इस बार राहुल गांधी के नेतृत्व में सरकार में बने रहने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर काँग्रेस की पहचान रहे प्रतिष्ठित गांधी टोपी ने अपना पाला बदल लिया है.

पलटे हुए नाव की स्वरूप वाले इस साधारण टोपी ने भारतीय चुनाव प्रचार अभियान में वापसी की है.

कभी पुरानी और बेकार पड़ चुकी यह टोपी एक बार फिर से प्रचलन में है और भारतीय राजनीति में उभरी नई राजनीतिक ताकत आम आदमी पार्टी की पहचान बन गई है.

सबसे पहले महात्मा गांधी ने इस टोपी को प्रसिद्धि दिलाई थी और बाद में नेहरू-गांधी परिवार ने इसे आगे बढ़ाया.

लेकिन आम आदमी पार्टी अब कम लागत में बनने वाली लाखों टोपियों को पार्टी के चुनाव चिह्न झाड़ू और नारों के साथ लोगों के बीच बांट रही हैं. पार्टी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था को बदलना चाहती है जिसमें पार्टी के नज़र में काँग्रेस और अन्य दल कथित तौर पर शामिल है.

उद्भव की कहानी

इतिहासकार मानते हैं इसके विकास की कहानी प्रथम विश्व युद्ध से पहले दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के अहिंसक विरोध से जुड़ी है. गांधी और दूसरे भारतीय कैदियों को जेल में ड्रेस कोड का पालन करने के लिए मज़बूर किया गया जिसमें उन्हें टोपी भी पहनना था. गांधी ने अपनी टोपी खुद बनाई.

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जब गांधी भारत लौटे तब उन्होंने घर में बने खादी के कपड़ों को अपनाया. टोपी के साथ यह कपड़े स्वावलंबन आंदोलन का प्रतीक बन गए.

1920 के दशक की शुरूआत में गांधी टोपी भारत भर में राजनीतिक बैठकों में बेची जाने लगी थी जो साम्राज्यवादी शक्तियों के गुस्से को बढ़ाने के लिए काफ़ी थी.

इतिहासकार लता सिंह का कहना है, "गांधी टोपी पहनने वालों पर शिकंजा कसने के लिए सरकारी नौकरियों से उन्हें नकारा जाने लगा, उन पर जुर्माना लगाया जाने लगा और कई बार तो उनकी पिटाई भी की जाने लगी."

महात्मा गांधी का पहनावा राष्ट्रीय आंदोलन और काँग्रेस की पहचान बन गई. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आदतन गांधी टोपी के संशोधित संस्करण को पहनते रहे और बाद में उनके उत्तराधिकारियों ने भी इसे अपनाया लेकिन पिछले कई दशकों से यह प्रचलन से बाहर हो गया था.

प्रतीक या फ़ैशन

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यह फिर से 2011 में अन्ना हजार के आंदोलन से प्रचलन में आया. इस आंदोलन से जन्में भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने जब नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी बनायी तो उन्होंने गांधी टोपी को महत्वपूर्ण जगह दी और इसने एक राजनीतिक प्रचलन स्थापित किया.

पार्टी ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 70 में से 28 सीट लेकर सबको चौंका दिया और अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने.

आप पार्टी की नाटकीय जीत के साथ गांधी टोपी की ज़ोरदार वापसी हुई. वामपंथी झुकाव वाली पत्रिका इकॉनॉमीक एंड पॉलिटीकल वीकली के अनुसार यह "सुधारवाद का नया फ़ैशन" बन चुका है.

बॉलिवुड स्टार और फैशन बुटीकों ने भी इसे अपनाया है. गांधी टोपी विनम्र शैली के पहनावे से फ़ैशनेबल पहनावे में और राजनीतिक प्रतीक से स्टाइल में तब्दील हो गया है.

आम आदमी पार्टी के चुनाव प्रचार में गांधी टोपी पार्टी का कॉलिंग कार्ड बन चुका है. आम आदमी पार्टी की गांधी टोपी सिर्फ एक क्षणिक फ़ैशन बन कर रह जाएगा या राजनीतिक शक्ति का प्रतीक बनेगा इसका फ़ैसला तो भारतीय मतदाता करेंगे.

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