ऐसी-वैसी चाय नहीं पीते अमित शाह!

  • 1 मई 2014
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"साहब कब आते हैं, कब जाते हैं पता ही नहीं चलता. लेकिन जब दिखते हैं तो हममें से किसी में उनसे बात करने की हिम्मत नहीं होती".

इतनी सी बात बताने में राम नरेश को 20 मिनट लग गए.

हमारी बात हो रही थी लखनऊ के राणा प्रताप मार्ग पर हसन मंज़िल स्थित गार्डन व्यू अपार्टमेंट्स के भीतर, और राम नरेश इस बिल्डिंग के प्रमुख गार्ड हैं.

इस इमारत की सातवीं मंज़िल पर एक फ़्लैट है जो लखनऊ के नामी-गिरामी व्यवसायी सुधीर हलवासिया के परिवार का है जिसमें अमित शाह गत वर्ष से रह रहे हैं.

गुजरात के पूर्व मंत्री और उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रभारी अमित शाह जुलाई 2013 से प्रदेश में डेरा डाले हुए हैं और जब भी लखनऊ में रहते हैं, इस इमारत में चहल पहल बढ़ जाती है.

सुरक्षा गार्डों के अनुसार उनसे घर में मिलने बहुत कम लोग आते हैं और जो आते हैं वे बिना कुछ कहे सुने सीधे लिफ्ट से ऊपर चले जाते हैं. समय होता है सुबह के आठ या रात के नौ बजे का.

शाही अंदाज़

लेकिन कौन-कौन आता और कौन जाता है इसका पता इमारत में कुछ दूसरे फ़्लैट में रहने वालों को भी नहीं है.

Image caption अमित शाह से बात करने में झिझकते हैं राम नरेश.

अमित शाह के लखनऊ आगमन के एक दिन पहले ही गुजरात पुलिस से भी 12 सुरक्षाकर्मी पहुँच जाते हैं और इमारत के चारों ओर फैल जाते हैं.

उनका खाना बाहर से नहीं आता, बल्कि उसको बनाने के लिए खुद सुधीर हलवासिया के घर का रसोइया पहुँच चुका होता है.

मोहम्मद रज़ी भी इसी इमारत के गार्ड हैं और उन्होंने बताया कि अमित शाह को टोयोटा की इनोवा गाड़ी में ही चलना पसंद है.

लेकिन जितना 'रहस्यमयी' जीवन अमित शाह अपनी बिल्डिंग में बिताते हैं उससे कहीं ज्यादा ख़ामोश और गम्भीर वे तब रहते हैं जब भाजपा के लोगों से मिल रहे होते हैं.

करीब से जानने वाले बताते हैं कि अमित शाह बड़े शाही अंदाज़ के व्यक्ति हैं इसीलिए अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वे कड़ी धूप में बाहर निकलकर कार्यकर्ताओं के साथ पेड़ के तने के नीचे बैठे मिलेंगे.

हिंदुस्तान अखबार के कार्यकारी सम्पादक नवीन जोशी उन गिने चुने पत्रकारों से हैं जिनकी मुलाक़ात अमित शाह से कई बार हुई है.

उन्होंने बताया, "मुझे तो अमित शाह बड़े विनम्र और सज्जन लगे. लेकिन पार्टी के भीतर के लोग ऑफ़ द रिकॉर्ड उनसे नाराज़ रहते हैं. क्योंकि अमित शाह आदेश देने में ज्यादा यकीन रखते हैं और सुझाव सुनते तो हैं लेकिन करते अपने मन की ही हैं. यूपी के नेता इस तरह के तौर-तरीक़े के बिलकुल भी आदी नहीं हैं. लेकिन अमित इस बात की परवाह बिलकुल नहीं करते कि लोग उनसे नाराज़ हो जाएंगे".

हनक

मेरा अपना अनुभव रहा है कि अमित शाह के हर अंदाज़ में तल्खी भरी हुई होती है.

चाहे वो कोई संवाददाता सम्मलेन हो या फिर सांप्रदायिक हिंसा से हाल-फिलहाल में जूझ चुके पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कोई चुनावी रैली ही क्यों न हो.

इसका होना लाज़मी भी है क्योंकि खुद नरेंद्र मोदी शायद आज की भाजपा में उन्हें सबसे ज्यादा भाव भी देते हैं.

Image caption राजीव बाजपेयी को अमित शाह में हनक दिखी.

मैंने लखनऊ में कई कैमरामैनों से मिलकर प्रदेश में हुई उन रैलियों का फुटेज देखा है जिन्हे नरेंद्र मोदी ने सम्बोधित किया था.

चाहे वो मेरठ हो या कानपुर या फिर गोरखपुर में आयोजित 'विजय शंखनाद रैली' हो, हर रैली के दौरान प्रबंधन अमित शाह का ही रहा है.

ख़ास बात यही होती है कि मोदी का भाषण शुरू होने से ठीक पहले अमित शाह उन्हें एक पर्चा थमाते हैं जिन्हे मोदी बेहद गम्भीरता से देखते हैं और उसके बाद अपने सम्बोधन करते हैं.

शायद इसी वजह से लोग अमित शाह को नरेंद्र मोदी की परछाईं कहते हैं .

वैसे इसमें सच्चाई भी है कि अमित शाह के हाव-भाव और चाल-ढाल भी बिलकुल मोदी साहब जैसी होती जा रही है.

लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार राजीव बाजपेयी ने बताया, "जब अमित शाह पार्टी की अंदरूनी बैठकों में बोलने खड़े होते हैं तो लोगों को लगता हैं मोदी आदेश दे रहे हैं. उनमें एक हनक है और स्वभाव में उनका संगठन से ज्यादा एक मंत्री होने का रुतबा हावी हो जाता है. बहुत लोग उनसे नमस्ते भी नहीं करते हैं क्योंकि डरते है कि कहीं वे किसी बात पर नाराज़ न हो जाएं".

पेचीदा शख़्सियत

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राजीव बाजपेयी कहते हैं, "अमित शाह के पास टाइम ही नहीं रहता और पत्रकार उनसे बात करने के लिए तड़पते रहते हैं. मैंने भाजपा का वो दौर भी देखा है जब गोविंदाचार्य या फिर कुशाभाऊ ठाकरे प्रदेश प्रभारी होते थे और सुबह फोन कर देते थे कि, राजीव जी, आज आपके साथ चाय पीनी है."

कुछ सूत्रों ने इस ओर भी प्रकाश डाला कि अमित शाह के किसी शहर में पहुँचने से पहले ही उनकी एक कोर टीम वहाँ डेरा दाल देती है जिससे प्रबंधन में आसानी रहे.

अयोध्या में भाजपा कार्यकर्ताओं की एक सभा में उन्होंने कहा भी था कि, "मैं मुद्दों में नहीं जाना चाहता, लेकिन जो वाजिब मुद्दे हैं वो हमेशा रहेंगे".

Image caption अवनीश त्यागी को लगा कि टिकट बंटवारे में राजनाथ और अमित शाह में कुछ मतभेद रहे.

दैनिक जागरण अख़बार की तरफ़ से अवनीश त्यागी ने अमित शाह का इंटरव्यू भी किया है और उनके साथ समय भी गुज़ारा है.

उन्होंने कहा, "एक तो अमित शाह बड़े ही रिज़र्व स्वभाव के हैं. शुरुआत में वादा किया था कि प्रदेश में वे महीने के 20 दिन रहेंगे, लेकिन पूरा करने में नाकाम रहे. वो इतने बारीक आदमी हैं जिनसे कुछ भी निकाल पाना सम्भव नहीं. मेरे सवालों का भी उन्होंने ऐसे ही जवाब दिया".

अमित शाह की शख्सियत को समझना अपने आप में ख़ासा पेचीदा काम है. लेकिन एक आखिरी मिसाल के ज़रिए शायद उनकी शख्सियत को समझना आपके लिए आसान हो सके.

एक दफ़ा जब वे लखनऊ के एक बड़े अखबार के कार्यालय में सम्पादकों से मिलने पहुंचे तो उन्होंने तीन बार परोसी गई चाय ठुकरा दी.

तीसरी चाय, जो कि डिप वाली दार्जीलिंग चाय थी, ठुकराते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे देर तक उबाली गई, कड़क चाय चाहिए!

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