गांव जिसकी सड़क बदहाल है और दरवाज़ा मज़बूत

आख़िरी गांव, कश्मीर, क़तार का आख़िरी

साल 2001 में इरशाद अहमद की उम्र 17 साल थी, जब पाकिस्तानी सैनिकों की ओर से दागी गई गोली उनके पांव को लगी. इसके बाद उनके पांव को काटना पड़ा.

इरशाद की ज़िंदगी अपने नक़ली पांव के सहारे घिसटकर चलती है. पर उससे बड़ी तक़लीफ यह है कि बहनों की शादी नहीं हो पा रही है. ग़रीबी है.

पर कहानी यहां ख़त्म नहीं होती.

इरशाद का गांव सिलिकोट भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को बांटने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा से सटा हुआ है. उरी क़स्बे से क़रीब 15 किलोमीटर दूर.

इरशाद कहते हैं, ''इस इलाक़े में कभी भी कुछ भी हो सकता है. पता नहीं कब क्या हो जाए.'' दो साल बाद उनकी मां सुबह घर से बाहर चारा इकट्ठा करने गईं, तो उन्हें गोली लगी, जिससे उनकी मौत हो गई.

सिलिकोट गांव एलओसी यानी भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर भारत की ओर पड़ने वाला आख़िरी गांव है.

आंखें थोड़ा ऊपर करें तो दूर ऊंची पहाड़ी पर भारतीय झंडा लहराता हुआ दिख जाता है.

एलओसी पर भारत की ओर यह आख़िरी भारतीय पोस्ट है. दूर हाजी पीर टॉप नज़र आता है, जो पाकिस्तान के हिस्से में है.

आख़िरी पोस्ट

भारतीय पोस्ट के दाहिनी तरफ़ एक दूसरी पहाड़ी पर पेड़ से चारों ओर से घिरा लहराता हुआ एक दूसरा झंडा नज़र आता है. ये पाकिस्तानी झंडा है और वहां पर है एलओसी की आख़िरी पाकिस्तानी पोस्ट.

गांव के दाहिनी ओर पहाड़ के ऊपर कंटीले तारों की एक दीवार नज़र आती है, ताकि चरमपंथियों को भारत प्रशासित कश्मीर में घुसने से रोका जा सके.

यहां पहुंचने के लिए पहाड़ के पथरीले, घुमावदार, संकरे रास्तों पर गाड़ी को धीमे-धीमे ले जाना होता है. जब हम वहां पहुंचे, तो एक तरफ़ जहां उरी शहर में कांग्रेस समर्थक पार्टी की होने वाली रैली के बारे में लाउडस्पीकर पर प्रचार कर रहे थे तो मुख्य शहर पार्टी के बैनरों और झंडों से पटा पड़ा था.

सिलिकोट गांव के गेट से क़रीब दो सौ मीटर की दूरी पर 75 साल के ग़ुलाम नबी एक दुकान की छांव में बैठकर अपने घर को जाने वाले कच्चे रास्ते पर पड़े पत्थर को देख रहे थे. पत्थर को बारूद से उड़ाया जाना था.

कई फ़ौजी पत्थर में बारूद लगाने के काम में लगे थे. उस पहाड़ी कच्चे रास्ते पर यह पत्थर पिछले तीन महीनों से पड़ा था. गांव तक आने-जाने में बड़ी परेशानी होती थी.

ग़ुलाम नबी कहते हैं, ''आज़ादी के बाद से इस सड़क की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है. वह जैसी थी, वैसी है.''

फिर एक ज़ोरदार धमाका हुआ और पत्थर चूर-चूर होकर दूर तक बिखर गए. यकायक लगा कि चारों ओर पत्थरों की बारिश शुरू हो गई हो. टुकड़ों के गिरने की आवाज़़ें थोड़ी देर तक आईं, फिर शांत हो गईं. फिर नदी की आवाज़ पृष्ठभूमि में बजने लगी.

तकलीफ़ की निशानी कच्ची सड़क

गांव जाने के लिए कच्ची पहाड़ी सड़क का ख़राब होना काफ़ी नहीं है. गांव में घुसने के लिए सेना की एक पोस्ट को पार करना होता है. आने-जाने के लिए एक दरवाज़ा है.

लोगों को सुरक्षा कारणों से आने-जाने के लिए अपने पहचानपत्र दिखाने होते हैं.

19 वर्षीय इरफ़ान अहमद नौंवी कक्षा के छात्र हैं. इरफ़ान के मुताबिक़ अगर कोई रात में बीमार हो जाता है तो पहले गेट को खुलवाना पड़ता है और फिर लाने-ले जाने का ज़रिया ढूंढना पड़ता है. बहुत वक़्त बरबाद हो जाता है.

ग़ुलाम नबी स्थानीय म्युनिसिपैलिटी दफ़्तर में मुलाज़िम हैं. उनकी शिकायत है, ''पिछले दस साल से गांव वाले किसी बंद क़ैदी की तरह महसूस करते हैं. लोहे के गेट पर रात भर ताला लगा रहता है. हमारा पूरा गांव तार की वजह से बंद हो जाता है.''

सिलीकोट की यह सड़क दरअसल एक प्रतीक है गांव की तकलीफ़ और संघर्ष का.

वह कहते हैं, ''कोई इस सड़क को बनाता नहीं है. जितनी भी पार्टियां हैं, वो कहती हैं कि हमें वोट दे दो, हम काम करेंगे, लेकिन 1947 से इस सड़क की हालत ऐसी ही है.''

गांव के भीतर कंटीले तारों का जाल बिछा था. एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि ज़मीन में कुछ जगह बारूदी सुरंगें बिछी हुई हैं और तारों के माध्यम से इन जगहों को घेरकर सुरक्षित किया गया है.

''जहां भारत और उसके प्रशासित कश्मीर की तरफ़ पंहुचना आसान नहीं है, वहीं कंटीली बाड़ों की ओर से जब देखो तब गोलियां और बमबारी चलती रहती है.''

गांव के 20-25 मकानों में क़रीब 200 लोग रहते हैं और गांव में 110 मतदाता हैं. भारत और पाकिस्तान की ओर से होने वाली फ़ायरिंग में दोनों ओर के कई लोग या तो मारे जा चुके हैं कि या फिर उन्हें अपने हाथ-पैर गंवाने पड़े हैं.

19 साल के इरफ़ान अहमद के दो भाई भी पाकिस्तानी गोलीबारी में घायल हो चुके हैं.

सेना का काम

इस ख़तरनाक इलाक़े में रहने वाले लोगों को बिजली की भारी किल्लत का सामना करना पड़ता है. इरफ़ान बताते हैं कि साल भर हर रोज़ मात्र दो-ढाई घंटे ही बिजली मिलती है. यहां लोग बढ़ती महंगाई से भी परेशान हैं.

नबी कहते हैं कि उनकी पगार मात्र 4,000 रुपए है, जिसमें से 1000 रुपए दफ़्तर आने-जाने में खर्च हो जाते हैं.

बढ़ती महंगाई, बेहद घटिया सड़क, आने-जाने में परेशानी, इन सभी परेशानियों ने उन्हें जैसे चिड़चिड़ा बना दिया है. जब गांव के गेट पर तैनात संतरी ने उनसे पहचान पत्र मांगा, तो वो चिड़चिड़ा उठे और अपनी परेशानी बयान करने लगे.

यहां लोगों के पास काम नहीं है. कई लोग सेना के लिए मेहनत मज़दूरी करके अपना गुज़ारा करते हैं. कुछ लोग भारतीय सेना का सामान पहाड़ों पर ले जाने का भी काम करते हैं.

सेना ने स्थानीय महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए गांव में एक सेंटर खोला है, जहां उन्हें सिलाई का काम सिखाया जाता है.

महिलाओं को सिलाई का काम सिखाने वाले ख़लील जू कहते हैं, 'हमारी भलाई की बातें सभी करते हैं लेकिन किसी के पास हमारे सवालों का जवाब नहीं है.'

स्थानीय अधिकारियों की मानें तो लोग संसदीय चुनाव को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं लेकिन जब विधानसभा चुनाव होंगे तो उनकी भागीदारी बढ़ेगी.

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