जंग को 15 साल हो गए, करगिल वहीं है

58 साल के फ़ार्मासिस्ट ग़ुलाम रहीम सोकर ही उठे थे कि दो धमाकों से उनका भीमभट्ट गांव दहल उठा. साल 1999, मई का महीना, समय सुबह के सात बजे. मिट्टी के उस कांपते मकान में उनकी बीवी शहर बानो को एकबारग़ी लगा कि दम घुट जाएगा.

दीवारों पर टंगे जवानी के दिनों के ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटोग्राफ़, शिया धर्मगुरुओं के चेहरे, पैट्रोमैक्स, हरे रंग की अलमारी, ज़मीन पर रखा फ़र्नीचर, वे सारी चीज़ें जो एक मकान को घर बनाती हैं, अपनी जगह से थोड़ा हिल गई थीं.

उनके बेटे, बहुएं, घोड़े, खच्चर, बकरियां और भेड़...धमाके सब कुछ हिला जाते हैं.

तब रहीम और उनके भरे-पूरे परिवार को क्या पता था कि धमाकों और तबाही का यह सिलसिला कितना लंबा चलेगा. रहीम बताते हैं, "हमें पता था कि जिस पहाड़ के पीछे से गोला-बारूद आ रहा है, उधर पाकिस्तान है."

उनका घर तोलोलिंग पहाड़ के ठीक सामने है. बगल में है तोलोलिंग टॉप. तोलोलिंग टॉप के ठीक बाएं, दूर दो ऊंची, नुकीली चोटियां दिखाई देती हैं. दाहिने है टाइगर हिल.

बमबारी से तबाह

बाएं है राइनो हॉर्न, जिसके बाएं है प्वाइंट 4875. करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की ओर से आए चरमपंथियों ने इन्हीं चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया था. क़रीब दो महीने चली लड़ाई के बाद चरमपंथियों को हटाया जा सका. द्रास स्थित करगिल मेमोरियल पर उस दौरान मारे गए 562 भारतीय जवानों और अफ़सरों के नाम दर्ज हैं.

मगर इस पर करगिल के लोगों का नाम कहीं नहीं लिखा. करगिल से क़रीब 50 किलोमीटर दूर भीमभट्ट वह गांव है, जो सबसे ज़्यादा बमबारी का शिकार हुआ. हालांकि बटालिक, काकसर जैसे इलाक़ों में भारी नुक़सान हुआ था. भीमबट्ट गांव के लोग बताते हैं कि बमबारी से क़रीब आधा गांव तबाह हो गया था और सात लोग मारे गए थे.

पंद्रह साल हो गए. मिट्टी के उस घर की खिड़कियों के टूटे शीशे 1999 की बमबारी की याद आज भी ताज़ा करते हैं. ग़ुलाम रहीम ने उसके ठीक सामने एक नया और बड़ा घर बना लिया है.

ग़ुलाम रहीम कहते हैं कि उनके गांव ने तबाही की क़ीमत तो चुकाई, लेकिन सरकार की ओर से नाममात्र की ही भरपाई हुई है.

गोलीबारी फिर दोनों तरफ़ से शुरू हो गई. अगले दिन और भी तेज़. दूसरे दिन गोले के गिरने में तेज़ी आ गई.

ग़ुलाम रहीम बताते हैं, "सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि अगर एक भी गोला हमारे घर पर गिर गया तो क्या होगा. हम कैसे रहेंगे कड़कड़ाती ठंड के दिनों में. लगता था, अब मरे, तब मरे. आखिरकार ख़ुदा ने हमारे घर को बचा लिया."

गोलीबारी में डटे रहे

गोलीबारी के बावजूद ग़ुलाम रहीम वहीं डटे रहे. दो दिन तक किसी तरह कभी यहां, कभी वहां, कभी घर के तहखाने में छिपे रहे. सेना की ओर से कहा गया कि सभी लोग वहां से चले जाएं और ख़ुद को बचाएं. ग़ुलाम रहीम ने अपने घोड़ों, खच्चरों, बकरियों और भेड़ों को खुला छोड़ दिया.

उन्होंने घर पर ताला लगाया और वहां से भाग गए. उनके 35 साल के बेटे शाहनवाज़ अली उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "उस वक़्त रात को दिन जैसा माहौल था. रात में इतने गोले आते थे कि रात में दिन की तरह हर चीज़ नज़र आती थी. भयानक माहौल था. लोग अपने घरों के लिए तरस रहे थे."

एक बम उसी ट्रक पर गिरा, जिसमें शाहनवाज़ के ससुर ग़ुलाम जाफ़र सवार थे. वे मारे गए. ग़ुलाम रहीम बताते हैं कि एक बार वे अपनी पत्नी शहरबानो और बेटे हसनैन के साथ मिलकर सूखा गोबर छिपा रहे थे, तभी टाइगर हिल की ओर से आया एक गोला पीछे पहाड़ी पर गिरा.

उनका मानना है कि दूरबीन की मदद से उन पर निशाना लगाया जा रहा था. बाक़ी गांव कब का खाली हो चुका था. धमाके के कारण उन्होंने जब भागना शुरू किया, तो पास ही एक और गोला गिरा. बाल-बाल बचे.

वह बताते हैं, "उस वक़्त किसी इंसान को कोई होश नहीं था. मुझे तो सिर्फ़ नींद आती थी. ऐसा शायद गोला-बारूद की बदबू के कारण हुआ होगा. खाने-पीने का सवाल ही नहीं था. गाय, मवेशी सब छोड़ गए थे. दूध की भारी कमी थी."

आख़िरकार उनका परिवार भी वहां से गांव सरसकोट पलायन कर गया.

नहीं मिली मदद

बीते दिनों का आबाद गांव, लहलहाते खेतों का रंग, नक्शा बदल चुका था. घर वाले क़रीब एक महीने के बाद वापस आए, तो उनका घर तो बचा था लेकिन दूसरे कई घर तबाह हो चुके थे. ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने में उन्हें कई साल लग गए.

ग़ुलाम रहीम और गांव वाले शिकायत करते हैं कि बमबारी के कारण जितनी तबाही हुई, उसके हिसाब से उन्हें नाम का ही मुआवज़ा मिला. ग़ुलाम रहीम बताते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को यह कहते सुना था कि हिंदुस्तान से आपको इतनी मदद मिलेगी कि आप मालामाल हो जाएंगे.

वह कहते हैं, "उन्होंने मदद भिजवाई भी होगी पर हमें उस रुपए में से सिर्फ़ 10 पैसा मिला होगा. बाक़ी का पैसा कहां गया, किसकी जेब में गया, पता नहीं. मेरे चार गधे मर गए, 15-20 भेड़ मरी, सारी फ़सल बर्बाद हो गई थी, लेकिन नुक़सान के बदले हमें सिर्फ़ 10,000 रुपए मिले. हमने सोचा भागते भूत की लंगोटी ही सही, इसलिए हमने उसे ही मंज़ूर कर लिया."

गांव के उनके 83 वर्षीय साथी हाजी ग़ुलाम रसूल शिकायत करते हैं, "हमारे लिए कुछ नहीं बदला, क्योंकि किसी को हमारी फ़िक्र नहीं. नेता सिर्फ़ वोट लेने आते हैं."

एक और स्थानीय निवासी ग़ुलाम क़ादिर कहते हैं, "उन दिनों बारिश की तरह गोले गिर रहे थे. किसी तरह हमने छिपते-छिपाते अपनी ज़िंदगियां बचाईं. गाय, बैल, बकरी सभी का नुकसान हुआ. कोई भी नेता आए, हम चाहते हैं कि वो हमारा ख़्याल तो रखे."

किल्लत से भरपूर ज़िंदगी

बेरोज़गारी और सर्दियों में सब्ज़ियों, ईंधन की कमी से जूझ़ने वाले गांव भीमभट्ट की तक़लीफ उस जोज़िला दर्रे से भी बढ़ती है, जो साल में सात महीने बंद रहता है.

रहीम बताते हैं, "गैस सिलेंडर महंगा है, यहां आटे की किल्लत है, मीटर लगा हुआ है लेकिन बिजली नहीं है. जलाने के लिए लकड़ी की कमी है. ठंड की रातें लालटेन के साए में कटती हैं. सरकारी राशन की बदौलत गुज़ारा होता है."

द्रास के रहने वाले अध्यापक मोहम्मद सैफ़ी ने बताया कि 2002 में हुई गोलाबारी से भी इलाक़े में तबाही हुई थी.

वो कहते हैं, "लोगों की शिकायत है कि जितना नुक़सान इलाक़े को हुआ, उस लिहाज़ से लोगों तक मदद नहीं पहुंची. साल 1999 के बाद विकास हुआ है. सड़कें बनीं हैं. यह जगह पहले गुमनाम थी लेकिन जितनी तरक्की होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई. बाज़ार में कुछ नहीं मिलता इसलिए लोग चावल-दाल खाने को मजबूर हैं."

कारगिल युद्ध 20 मई 1999 को शुरू हुआ था और 26 जुलाई को ख़त्म हुआ था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार