....क्योंकि बच्चों की मौत कोई चुनावी मुद्दा नहीं

  • 2 मई 2014

बिहार का सारण ज़िला इन दिनों हाई प्रोफ़ाइल लोकसभा क्षेत्र बना हुआ है. यहाँ से राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद की पत्नी और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी चुनाव लड़ रही हैं. राबड़ी देवी को टक्कर दे रहे हैं भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राजीव प्रताप रूड़ी.

इसी से सटा महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र भी है, जहाँ से राष्ट्रीय जनता दल प्रत्याशी प्रभुनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं और वो इस चुनाव को जीवन-मरण का प्रश्न मान रहे हैं.

ज़िला मुख्यालय छपरा से 35 किलोमीटर दूर मशरख के निकट धर्मासती गंडामन गाँव आजकल शांत है. वैसे तो ये गाँव महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र में पड़ता है, लेकिन यहाँ राजनीतिक हलचल नहीं दिखती.

ये वही गाँव हैं जिसने पिछले साल जुलाई में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियाँ बटोरी थी. वजह थी मिड डे मील हादसा, जिनमें 23 मासूम बच्चों ने अपनी जान गँवा दी थी.

16 जुलाई 2013 को धर्मासती गंडामन गाँव में ये हादसा हुआ था. इस मामले में प्राध्यापिका मीना देवी के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दाख़िल कर दिया गया है और वो इस समय जेल में हैं.

उस प्राइमरी स्कूल (सामुदायिक भवन) के सामने खुले प्रांगण में बच्चे खेल रहे हैं. आसपास निर्माणाधीन इमारत है. एक आंगनबाड़ी केंद्र भी बन गया है. नज़दीक ही एक अस्पताल की इमारत भी बन कर खड़ी हो गई है. एक स्मारक भी आधा-अधूरा खड़ा है. जिस पर मारे गए बच्चों और उनके अभिभावकों के नाम खुदे हुए हैं.

सवाल

धर्मासती गंडामन गाँव में हुए हादसे के बाद सरकारी वादों को दर्शाता बड़ा सा शिलालेख भी है. जिस पर सरकारी कार्यों की पूरी सूची लगी है. आपको सब कुछ पारदर्शी लगता है.

जिस सामुदायिक भवन में वो प्राइमरी स्कूल चलता था, उसके ठीक सामने ही एक बच्चे की क़ब्र सहसा आपको ठिठका देती है. आगे बढ़ते ही एक और क़ब्र दिखती है और फिर उस गाँव के नरेंद्र मिश्रा अपनी उंगलियों से दूर इशारा करते हैं, वहाँ सड़क के उस पार बाक़ी बच्चों को दफ़नाया गया है. सोच कर ही रूह काँप जाती है.

जिस प्राइमरी स्कूल के बच्चों के साथ हादसा हुआ था, अब उस स्कूल वहाँ से हटाकर पास ही में स्थित मध्य विद्यालय में शिफ़्ट कर दिया गया है. जहाँ एक कमरे में उस स्कूल के बच्चे पढ़ते हैं.

जैसे ही आप उस मध्य विद्यालय में पहुँचते हैं, होश उड़ जाते हैं. स्कूल में कोई बच्चा नहीं दिखता. वहाँ मौजूद एक शिक्षक मुझसे कहते हैं- अभी तो बच्चे यहीं थे. खाना खाने गए हैं. मेरे दिमाग़ में एक बात कौंधती है, अगर बच्चे खाना खाने घर गए हैं, तो उस मिड डे मील का क्या, जिसके लिए सरकार कह रही है कि अब उसमें काफ़ी बदलाव आ गया है और काफ़ी एहतियात बरती जा रही है.

लेकिन मुझे अपने सवाल का जवाब नहीं मिलता. जिस एक कमरे में प्राइमरी स्कूल के उन बच्चों की पढ़ाई होती है, वहाँ मुझे सिर्फ़ एक कुर्सी मिली. पूरा हॉल ख़ाली पड़ा था. सवाल उठना स्वाभाविक था. उस स्कूल के टीचर का जवाब था- दरअसल प्राइमरी स्कूल में बेंच नहीं होता. बच्चे अपने घर से बोरा लेकर आते हैं और पढ़ते हैं.

गिनती

सारण के ज़िलाधिकारी कुंदन कुमार से जब मैंने संपर्क किया, तो उन्हें इस मुद्दे पर मेरा सवाल पूछना नागवार गुज़रा. उल्टे उन्होंने ये गिनाना शुरू कर दिया कि वहाँ क्या-क्या काम हुए हैं. जब मैंने स्कूल की हालत पर सवाल पूछे, तो उन्होंने कहा, "ऐसे विद्यालय बहुत सारे हैं, जहाँ आवश्यक संख्या में या पर्याप्त बेंच-कुर्सियाँ नहीं हैं. उम्मीद है कि इस बजट में हमें इसके लिए पैसा मिलेगा, जिससे बेंच-डेस्क ख़रीदा जा सके."

लेकिन जो बच्चे उतनी मानसिक पीड़ा से गुज़रे, जिन्होंने अपने दोस्तों को तड़प-तड़प कर मरते देखा, क्या उन्हें विशेष सुविधा की आवश्यकता नहीं? ऐसा गंडामन में बिल्कुल नहीं दिखता.

जब मैंने ये सवाल बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही के समक्ष रखा, तो उनका कहना था, "सर्व शिक्षा अभियान के तहत जो चीज़ें आती हैं, उसमें फर्नीचर नहीं है. ऐसे स्कूलों को मेन्टेनेंस के लिए पाँच हज़ार रुपए सालाना दिए जाते हैं. लेकिन इसमें फर्नीचर का प्रावधान नहीं है."

हालाँकि शिक्षा मंत्री ने बीबीसी को ये भी जानकारी दी कि वे राज्य की योजना से 120 करोड़ रुपए स्कूलों में फर्नीचर के लिए देने का फ़ैसला किया है. इसमें ख़रीदने की प्रक्रिया तय की जा रही है और उम्मीद है कि अगले दो महीनों के अंदर सभी प्राइमरी स्कूलों को फर्नीचर मुहैया करा दिया जाएगा.

स्कूल नहीं आते कई बच्चे

लेकिन बात सिर्फ़ इतनी नहीं है. प्राइमरी स्कूल में बच्चों की संख्या चौंकाने वाली है. मध्य विद्यालय के शिक्षक अब्दुल शकूर अंसारी ने बताया कि अब इस स्कूल में सिर्फ़ 12-14 बच्चे ही आते हैं. बाक़ी बच्चे नहीं आते. प्राइमरी स्कूल की एक शिक्षिका के ज़िम्मे अब ये सभी बच्चे हैं. लेकिन उस दिन वो शिक्षिका भी स्कूल से नदारद थीं.

पीड़ित परिवार के लोगों ने अब अपने बच्चों को उस स्कूल में भेजना बंद कर दिया है. मारे गए बच्चों के परिजन अब भी उस हादसे से उबर नहीं पाए हैं. लेकिन उन्हें पीड़ा इस बात की भी है कि सरकार ने दो लाख रुपए की मुआवज़ा राशि देकर जैसे इन परिवारों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्ति पा ली है.

गंडामन धर्मासती के हरेंद्र मिश्रा के दो बच्चों की मौत ज़हरीला भोजन खाने से हो गई थी. उन बच्चों में एक की उम्र सात साल और दूसरे की उम्र नौ साल थी. हरेंद्र मिश्रा सरकार से काफ़ी नाराज़ हैं. वे अब भी वो दिन भूले नहीं हैं जब वे अपने दोनों बच्चों को लेकर इलाज के लिए छपरा भागे थे. लेकिन जाते-जाते उनके दोनों बच्चों की मौत हो गई.

जैसे ही हरेंद्र मिश्रा ने अपने दोनों बच्चों के बारे में बताना शुरू किया, पास ही बैठी उनकी पत्नी फूट-फूट कर रो पड़ी. उन्हें चुप कराने की सारी कोशिशें नाकाम हो रही थी. हरेंद्र मिश्रा को आज भी डॉक्टर की वो बात याद है जिन्होंने उनसे कहा था कि अगर देर नहीं होती, तो बच्चे बच सकते थे.

बच्चों की क्या क़ीमत?

हरेंद्र मिश्रा ने कहा, "सरकार ने क्या किया. सिर्फ़ दो-दो लाख रुपए मुआवज़ा दे दिया. सरकार ने कई वादे किए थे. हर तरह का सहयोग देने की बात कही थी और नौकरी भी देने का वादा किया गया था. लेकिन कुछ नहीं हुआ. सिर्फ़ पैसे मिले हैं."

उनकी पत्नी रोते हुए कहती हैं, "हम लोग सब कुछ ख़रीद कर खाते हैं. कोई सहारा नहीं है. खेती-बाड़ी नहीं है. सरकार को कोई सहारा देना चाहिए. सरकार ने दो-दो लाख रुपए दिए. लेकिन क्या मेरे बच्चे दो-दो लाख रुपए के थे."

पीड़ित लोग इस बात से भी दुखी हैं कि उनके गाँव को आदर्श गाँव बनाने की तो बात की जा रही है, लेकिन जिन्होंने अपने बच्चे गँवाए, उन्हें सिर्फ़ मुआवज़ा देकर छोड़ दिया गया.

इसी गाँव की पन्ना देवी ने उस दिन खाना बनाया था और अन्य बच्चों के साथ उनके बच्चों ने भी खाना खाया था. उनकी एक बच्ची तो पटना में हुए इलाज के बाद बच गई, लेकिन उनके दो बच्चों की मौत हो गई.

आज भी उन्हें वो दिन याद है कि कैसे जब खाना बनाते समय उन्होंने तेल डाला था, तो कड़ाही से कुछ ज़्यादा ही धुँआ निकला था. जब उन्होंने ये बात स्कूल की प्रिंसिपल मीना देवी को बताई, तो उन्होंने ये कहकर उन्हें खाना बनाने को कह दिया कि कड़ाही ज़्यादा गर्म हो गई है और उसकी चादर पतली है, इस कारण धुँआ ज़्यादा निकला है.

'मैडम का निर्देश'

पन्ना देवी ने बीबीसी को बताया, "मैडम से हमने कहा था कि धुँआ ज़्यादा निकला है. लेकिन मैडम ने कहा कि तसली की चादर पतली है और गर्म ज़्यादा हो गया है, इसलिए धुँआ निकला है. आप खाना बनाओ."

इसके बाद जैसे ही बच्चों ने खाना खाया, सब बीमार पड़ने लगे. इस हादसे में पन्ना देवी की एक बेटी और एक बेटे की मौत हो गई और एक बच्ची इलाज के बाद बच गई. लेकिन उसने स्कूल जाना छोड़ दिया है.

पन्ना देवी इस बात से काफ़ी दुखी हैं कि ग़रीबी रेखा से नीचे रहने के बावजूद उन्हें इंदिरा आवास के तहत मकान नहीं दिया गया. साथ ही स्कूल में खाना बनाने का काम भी उनके हाथ से चला गया है.

वो कहती हैं, "नौकरी कहाँ मिली है. गाँव के कई लोगों को इंदिरा आवास के तहत मकान मिला है. लेकिन मैं तो ग़रीबी रेखा से नीचे वाली हूँ और पीड़ित भी हूँ. सरकार ने वादा किया था कि वो पीड़ित परिवार के लोगों को नौकरी देगी. लेकिन कुछ नहीं हुआ. इतने लोग यहाँ आए और गए. लेकिन मुझे इंदिरा आवास के तहत मकान नहीं मिला. क्यों नहीं मिला."

पन्ना देवी के पास कोई खेत नहीं है. वो दूसरों के खेतों में काम करके या फिर बटाई का काम लेकर अपना गुज़ारा करती हैं.

'दलालों का बोलबाला'

गाँव के सुरेंद्र प्रसाद की 10 साल की बेटी ममता कुमारी की भी ज़हरीला खाना खाने के बाद मौत हो गई थी. उनकी नाराज़गी सरकार से कम निचले स्तर के कर्मचारियों से ज़्यादा है.

वो कहते हैं, "यहाँ वादे कई हुए थे. लेकिन सरकार में कोई ग़लती नहीं है. लेकिन यहाँ लूटखोरी मची हुई है. ब्लॉक स्टाफ़ लूट लेते हैं और दलालों का काम होता है. पीड़ित परिवारों का नहीं. पीड़ित परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं."

सुरेंद्र प्रसाद को इसकी भी परेशानी है कि उनकी पत्नी अब भी उस हादसे से उबर नहीं पाई हैं और उसका असर उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ा है. उन्होंने बताया कि सरकार ने उन लोगों से कहा था कि पटना से डॉक्टर आकर उनकी जाँच करेंगे और चिकित्सा सहायता दी जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ऐसी हालत सिर्फ़ उनकी पत्नी की ही नहीं, बल्कि कई माँ-बाप की है, जिनके बच्चों की इस हादसे में मौत हो गई है.

लेकिन सारण के ज़िलाधिकारी ये बात मानने को तैयार नहीं. वो कहते हैं कि सरकार ने कई काम किए, चिकित्सा सुविधा दी, स्कूल बनवाए, सड़कें बनवाईं, बिजली दी. जब उन्होंने पीड़ित परिवार को इंदिरा आवास देने का ज़िक्र किया, तो मैंने पन्ना देवी का मामला उठाया.

क्या करेगी सरकार?

इस पर ज़िलाधिकारी कुंदन कुमार का कहना था, "वादा करना प्रशासन का काम नहीं. इंदिरा आवास के लिए जो प्रक्रिया तय की गई थी, उसके तहत ही लोगों को मकान दिए गए हैं. उस गाँव के 65 लोगों को इंदिरा आवास मिला है."

जब मैंने ये कहा कि लेकिन कई पीड़ित परिवारों को ये नहीं मिला है और लाभ दूसरे उठा रहे हैं, तो डीएम साहब भड़क उठे. उन्होंने मुझसे नाम पूछा, जब मैंने पन्ना देवी का नाम बताया, तो कहने लगे आप मुझसे पूछताछ कर रहे हैं और मैं इसका जवाब नहीं दे सकता.

डीएम साहब जवाब नहीं देना चाहते. पीड़ित परिवार दलालों और कर्मचारियों की लूट के आरोप लगा रहा है. चुनाव का समय है. नेता जनता से संपर्क कर रहे हैं. बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं.

लेकिन पीड़ित परिवार की शिकायतें कोई मुद्दा नहीं. अपने दो बच्चे गँवाने वाले हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "क्या हो रहा है, क्या कर रहे हैं, क्या करेंगे. क्या सरकार करेगी, क्या नहीं करेगी. हम लोग तो अपने बच्चों की याद में मर रहे हैं. अब क्या करेगी सरकार, क्या करेंगे सांसद और क्या करेंगे विधायक."

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