मोदी ही सुभाष चंद्र बोस बन सकते हैं: निज़ामुद्दीन

कर्नल निज़ामुद्दीन

"मोदी इज़ अ गुड फ़ेलो", ये कहना था एक ज़माने में आज़ाद हिंद फ़ौज में काम कर चुके 'कर्नल' निज़ामुद्दीन का.

बात हो रही थी आजमगढ़ और बनारस के बीच स्थित एक गांव मुबारकपुर के पास.

आठ मई को बनारस में हुई अपनी चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने मंच पर झुककर निज़ामुद्दीन के पैर छुए थे.

नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था, "मुझे बताया गया कि कर्नल निज़ामुद्दीन अब 103 वर्ष के हो चले हैं. वो यहाँ आए इसके लिए मैं उनका आभार प्रकट करता हूँ".

'कर्नल' निज़ामुद्दीन के मुताबिक उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को काफ़ी करीब से देखा और जाना था.

'नेताजी विमान दुर्घटना में नहीं मरे'

Image caption 'कर्नल' निज़ामुद्दीन का घर, जिसके ऊपर तिरंगा लगा हुआ है.

उन्होंने बताया, "नेताजी से मेरी मुलाक़ात सिंगापुर में हुई जहां वे आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए लोगों की भर्ती कर रहे थे. मेरे समर्पण को देख कर वे बहुत खुश हुए और फिर उन्होंने मुझे अपना अंगरक्षक और ड्राइवर नियुक्त कर लिया. उसके बाद मैं उनके साथ 10 साल तक रहा".

'कर्नल' निज़ामुद्दीन के अनुसार उनकी उम्र 100 से ज़्यादा है और उन्हें कम से कम 10 भाषाओं का ज्ञान है.

अच्छी अंग्रेज़ी में बात करते हुए उन्होंने ये भी बताया कि अपनी पहचान उजागर होने के डर से वे दशकों तक नाम बदल कर रहे, क्योंकि उन्हें अपने ख़िलाफ़ कार्रवाई होने का डर सताता रहा.

उन्होंने कहा, "ये सब बातें ग़लत हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत एक विमान दुर्घटना में हुई थी. वे उसके बाद जीवित थे, लेकिन मुझे ये नहीं पता कि उनकी मौत कब और कहाँ हुई. एक दिन तो सभी को मरना ही है".

भारत की विभिन्न केंद्र सरकारों ने अब तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत पर बने रहस्य को सुलझाने के लिए कई जांच समितियों और आयोगों का गठन किया है.

'नेताजी की मौत'

Image caption 'कर्नल' निज़ामुद्दीन की युवावस्था की तस्वीर

इनमें से एक जस्टिस मुखर्जी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि प्राप्त जानकारी के अनुसार, कह पाना मुश्किल है कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में हुई थी.

मामला अब भी विवादास्पद है और ख़ुद सुभाष चंद्र बोस के वंशजों में उनकी मौत को लेकर दो राय बनी हुई है.

बहरहाल, आज़मगढ़ जिले में रहने वाले और अपने को सुभाष चंद्र बोस का ड्राइवर बताने वाले निज़ामुद्दीन के साथ उनकी पत्नी भी रहती हैं जिनकी याददाश्त अब कमज़ोर हो गई है.

पति-पत्नी के मुँह में दांत भी नहीं रहे, जिससे उन्हें बोलने में भी दिक्कत होती है.

हालांकि निज़ामुद्दीन के पुत्र और स्वयं निज़ामुद्दीन इस बात को बार-बार दोहराते हैं कि नरेंद्र मोदी की रैली में वे ख़ुद गए थे न कि भाजपा के बुलावे पर.

'लंबा सफ़र'

उनके बेटे शेख़ अकरम ने कहा, "वालिद साहब जब भी टेलीविज़न देखते हैं तो कहते हैं अगर कोई भी नेता, नेताजी की तरह है तो वे नरेंद्र मोदी हैं. इसलिए हम मोदी की रैली में पहुंचे थे".

बात के बीच में ही 'कर्नल' निज़ामुद्दीन बोल बैठे, "सिर्फ़ मोदी ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस बन सकता है".

फ़िलहाल जो बातें साफ़ तौर पर दिखाई देती हैं उनमें सबसे अहम ये है कि 'कर्नल' निज़ामुद्दीन और नरेंद्र मोदी का एक मंच पर साथ आना महज़ इत्तेफ़ाक़ से कहीं ज़्यादा है.

शायद निज़ामुद्दीन का सार्वजनिक तौर पर पैर छूने से नरेंद्र मोदी ये भी संदेश देना चाहते हैं कि उनके लिए स्वतंत्रता सेनानी की जाति या मज़हब मायने नहीं रखता और वे सभी को बराबर देखते हैं.

बनारस में अपने नामांकन के समय पंडित छन्नू लाल मिश्र से लेकर स्वतंत्रता सेनानी 'कर्नल' निज़ामुद्दीन तक के पैर छूने तक मोदी ने एक लंबा सफ़र ज़रूर तय कर लिया है.

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