चुनाव नतीजे तय करेंगे एग्ज़िट पोल की किस्मत

  • प्रवीण राय
  • फेलो, सीएसडीएस
मोदी, केजरीवाल, मायावती, राहुल गांधी, जयललिता

सोमवार को आम चुनाव के आख़िरी चरण का मतदान पूरे होते ही टीवी चैनलों पर एग्ज़िट पोल की झड़ी लग गई और टीवी एंकरों ने चीख-चीख कर कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन आसानी से बहुमत का आँकड़ा पार कर जाएगा.

चुनावी सर्वे करने वाले अपने नतीजों को इतने आत्मविश्वास से पेश कर रहे हैं कि मानो 16 मई का दिन तो महज़ औपचारिकता दिखने लगा है, जिसमें पहले से ही घोषित विजेताओं को पदक बाँटे जाने हैं.

भारत में होने वाले चुनाव का अगर अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि बड़े पैमाने पर चुनावी भविष्यवाणी करने का मीडिया का जुनून दो दशक पहले शुरू हुआ.

पिछले चार लोकसभा चुनाव के लिए मीडिया ने सीटों का जो अनुमान पेश किया, उससे पता चलता है कि 1996 और 1998 में उनकी बातें लगभग सही साबित हुईं जबकि 2004 के चुनाव परिणाम उनके अनुमानों से बिल्कुल उलट आए और पिछले लोकसभा चुनाव में भी वे चूक गए.

सर्वे उद्योग को धक्का

वर्ष 1996 और 1998 के चुनाव के दौरान उनकी भविष्यवाणियाँ लगभग सही साबित होने की वजह से ही देश में चुनावी सर्वे उद्योग को इतना बढ़ावा मिला है और सीटों के अनुमान को भारत में सियासी पार्टियों के चुनावी भाग्य के बारे में भविष्यवाणी करने का वैज्ञानिक तरीका मान लिया गया.

लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों की सफलता ज़्यादा दिन तक नहीं टिक पाई क्योंकि 2004 में उन्होंने अनुमान जताया था कि 'इंडिया शाइनिंग' के नारे के साथ चुनाव में उतरा भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन केंद्र में आसानी से अपनी सत्ता बनाए रखने में कामयाब रहेगा.

बस अंतर इतना था कि कुछ सर्वेक्षण कह रहे थे कि एनडीए पहले से ज़्यादा सीटों के साथ सत्ता में लौटेगा जबकि अन्य के मुताबिक उसे कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है लेकिन उसकी सत्ता में वापसी तय है.

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इस बार आम चुनावों में रिकॉर्ड मतदान हुआ

लेकिन हक़ीक़त इसके उलट सामने आई. इसके बाद चुनावी सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर कई गंभीर सवाल उठे और इन सर्वेक्षणों को कराने वाले उद्योग को भी धक्का लगा.

चुनावी सर्वेक्षण करने वालों के लिए स्थिति उस वक्त और बदतर हो गई जब 2009 के आम चुनाव में बहुत से मीडिया संस्थानों और चुनावी पंडितों के अनुमान इस बात को समझने में नाकाम साबित हुए कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबंधन अपनी सत्ता बनाए रखने में कामयाब होगा.

बहुत कुछ दाँव पर

चुनावी सर्वेक्षणों का उद्देश्य मतदाताओं के चुनावी व्यवहार और उनके नज़रिए को समझना और उसके आधार पर देश का चुनावी रुझान पेश करना है.

चुनावी अध्ययनों में चूक हुई है और इसी का नतीजा है कि चुनावी सर्वेक्षण और सीटों के अनुमान वास्तविक नतीजों में ग़लत साबित हुए.

इस बार के चुनावी सर्वेक्षणों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि एनडीए अन्यों के मुकाबले बहुत आगे है और संभावना जताई जा रही है कि वह बहुमत के आंकड़े को पार कर जाएगा.

सिर्फ़ टाइम्स नाउ के सर्वेक्षण में उन्हें बहुमत से दूर यानी 249 सीटों के आस-पास बताया गया है और इस तरह त्रिशंकु लोकसभा आने की संभावना जताई गई है.

चुनावी सर्वेक्षणों में एनडीए को बहुमत मिलने के अनुमान को ख़ासा संदेह की नजर से देखा जा रहा है और ज़ाहिर तौर पर इसकी वजह पिछले दो आम चुनाव हैं जिनमें चुनावी सर्वेक्षण ग़लत साबित हुए हैं.

इस बार के एग्ज़िट पोल के अनुमानों पर चुनावी सर्वे कराने वाले उद्योग का बहुत कुछ दांव पर लगा है. चुनावी नतीजे ये तय करने में बहुत अहम साबित होंगे कि उनके अनुमान कितने सटीक निकले.

यूपी टेढ़ी खीर

इस बारे में कई बातों पर ध्यान देने की जरूरत है.

पहला, भारतीय जनता पार्टी इस बार जिस तरह जबरदस्त संचार रणनीति के साथ उतरी, उससे मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी और इस वजह से चुनाव के एकतरफा होने का जोखिम भी बढ़ा.

भारतीय जनता पार्टी ने कई देशों में राष्ट्रपति चुनाव वाले अंदाज में प्रचार मुहिम चलाई, जिसने बड़ी संख्या में मतदाताओं को प्रभावित किया लेकिन ये देखना होगा कि ये पार्टी के लिए वोट और सीटों में तब्दील हो पाएगा या नहीं.

दूसरी बात, उत्तर प्रदेश जैसे जिन राज्यों में मुक़ाबला बहुकोणीय है और कई पार्टियों का दबदबा है, वहां वोट हिस्सेदारी को सीटों में तब्दील करना एक बड़ी चुनौती है.

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अब देश को ईवीएम मशीनें खुलने का है इंतज़ार

उत्तर प्रदेश को समझना चुनावी पंडितों के लिए सबसे टेढ़ी खीर रहा है क्योंकि पिछले चुनाव में वहां कांग्रेस के उभार की वजह से जो सियासी समीकरण बने, उसने सारे अनुमानों को उलट-पुलट कर दिया.

इसी तरह जिन राज्यों में सियासी पार्टियों के बीच नए गठबंधन होते हैं, उनकी थाह लेना भी मुश्किल होता है क्योंकि तय करना मुश्किल हो जाता है कि ज़मीनी स्तर पर गठबंधन कितना कारगर हो पाएगा.

पार्टियों के लिए एक दूसरे को अपना वोट स्थानांतरित कर पाना इस बात पर निर्भर करता है कि ज़मीनी स्तर पर उस गठबंधन को कितना पसंद किया जाता है.

ग़लती की संभावना

तीसरी बात, बड़े राज्यों में ये समझना भी आसान नहीं होता कि राजनीतिक पार्टियों का वोट प्रतिशत कितना फैला हुआ है और कितना सघन है.

इस तरह किसी पार्टी के वोट देने वाले मतदाताओं की संख्या तो अच्छी ख़ासी है लेकिन वे पूरे राज्य में छितरे हुए हैं, तो ऐसे में उनके वोटों को सीटों में तब्दील नहीं किया जा सकता है.

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चुनाव आयोग का कहना है कि ये अब तक की सबसे लंबी चुनावी प्रक्रिया रही

वहीं, अगर अन्य पार्टी के पास मतदाताओं का समर्थन कम है लेकिन वे सभी किन्हीं ख़ास इलाकों में रहते हैं तो उस पार्टी के लिए ज्यादा सीटें जीत पाना आसाना होता है.

इस तरह एग्ज़िट पोल और चुनावी सर्वेक्षण विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की वोटों में हिस्सेदारी का सही अनुमान लगा सकते हैं लेकिन उनके अनुमान में गलतियों की संभावना बनी रहेगी.

इसी तरह अनुमान लगाने के तरीके सही हो सकते हैं, लेकिन एग्ज़िट पोल गलत हो सकते हैं या उनमें विभिन्न तरह की सर्वेक्षण से जुड़ी गलतियां हो सकती हैं.

शोध की ज़रूरत

समय आ गया है जब चुनावी सर्वेक्षण उद्योग में 'शोध और विकास' पर ध्यान दिया जाना चाहिए और इस रहस्य से पर्दा उठाया जाना चाहिए कि सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां सीटों के अनुमान के लिए कौन सी विधियां इस्तेमाल करती हैं और इस जानकारी को सार्वजनिक किया जाना चाहिए.

अभी हो ये रहा है कि चुनावी सर्वे और सीटों के अनुमान को किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इस पर तुरंत रोक लगाए जाने की ज़रूरत है.

अगर 16 मई को आने वाले चुनाव परिणाम में एग्ज़िट पोल के नतीजे सटीक साबित हुए तो इससे मीडिया संस्थानों के चुनावी सर्वेक्षणों की गिरी हुई साख और सत्यता बहाल हो पाएगी.

लेकिन इसके लिए शुक्रवार तक ईवीएम मशीनों के खुलने तक तो इंतज़ार करना ही होगा.

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