अबकी बार किसकी सरकार?

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शुक्रवार को डबल ताले जड़े स्ट्रांग रूमों में बंद ईवीएम मशीनें खुल जाएंगी और इन मशीनों की 24 घंटे निगरानी में खड़े सुरक्षाकर्मी सुक़ून की साँस लेंगे.

इसी के साथ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे लंबी चुनावी प्रक्रिया अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचेगी.

अटकलों, क़यासों, आँकड़ेबाज़ी और उम्मीदों से बनी तस्वीर साफ़ होगी और इस चुनावी साल में सबसे ज़्यादा पूछे गए सवाल 'अबकी बार किसकी सरकार?' का भी जवाब मिल जाएगा.

7 अप्रैल से शुरू होकर 12 मई को नौ चरणों में पूरी हुई यह सबसे लंबी मतदान प्रक्रिया में 51 करोड़ से अधिक भारतीय नागरिकों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया.

भारत के चुनाव आयोग के मुताबिक़ इस बार सबसे ज़्यादा 66.4 प्रतिशत मतदान हुआ और 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए 64 प्रतिशत मतदान का रिकॉर्ड भी टूट गया.

चुनाव आयोग के मुताबिक़ इस बार कुल 55.1 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाला जो 2009 में मताधिकार का इस्तेमाल करने वाले 41.7 करोड़ के मुक़ाबले 32 प्रतिशत ज़्यादा है.

इस बार कुल मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ से ज़्यादा (कुल 81,45,91,184) थी जो यूरोपीय संघ की समूची आबादी से अधिक है.

नए मतदाता

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कुल मतदाताओं में से 28,314 ने अपनी पहचान ट्रांस्जेंडर बताई है, जबकि 11844 मतदाता एनआरआई हैं.

इस बार 2,31,61,296 मतदाता 18-19 साल के हैं, जिनमें से 58.6 प्रतिशत पुरुष मतदाता हैं जबकि 41.4 प्रतिशत महिला मतदाता हैं. चुनावी नतीजों की चाबी इन नए मतदाताओं के हाथ में ही मानी जा रही है.

चुनावों के दौरान सभी पार्टियों ने युवा मतदाताओं को रिझाने की हर संभव कोशिशें की हैं. चुनाव नतीजे ये भी बताएंगे कि भारत की इस युवा आबादी के मन में क्या चल रहा है.

बड़े राज्यों में इस बार सबसे ज़्यादा मतदान पश्चिम बंगाल (81.8 प्रतिशत), ओडिशा (74.4 प्रतिशत) और आँध्र प्रदेश (74.2) प्रतिशत में हुआ.

चुनावी पंडितों की नज़रें सबसे अहम चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार पर टिकी रहीं, लेकिन इन दोनों ही राज्यों में औसतन कम मतदान हुआ. यूपी में 58.6 प्रतिशत जबकि बिहार में 56.5 प्रतिशत मतदान हुआ.

इस बार भारत सरकार ने चुनावों पर कुल 3426 करोड़ रुपए ख़र्च किए जो 2009 के 1483 करोड़ रुपए खर्च के मुक़ाबले 131 प्रतिशत ज़्यादा है.

पाठकों को शायद यह जानकर हैरानी हो कि 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनावों में सिर्फ़ 10.45 करोड़ रुपए ख़र्च हुए थे. ये सरकारी ख़र्च है.

इस बार प्रत्याशियों और पार्टियों ने चुनावों के दौरान कितना ख़र्च किया है इस बारे में क़यास ही लगाए जा रहे हैं और कोई भी क़यास यक़ीनी नहीं हैं.

मैदान में दिग्गज

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इस बार के चुनावों में एक और ख़ास बात यह रही है कि मतदाताओं को पहली बार सभी उम्मीदवारों को नकारने का विकल्प भी दिया गया. यानी उन लोगों को भी आवाज़ बुलंद करने का मौक़ा मिला, जिनका विश्वास कोई भी राजनेता नहीं जीत पाया है.

देश में किसकी सरकार बनेगी इसके साथ ही उत्सुकता इस बात लेकर भी है कि वाराणासी में कौन जीतेगा. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को वाराणासी में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चुनौती दी है.

आम आदमी पार्टी के ही नेता कुमार विश्वास ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को अमेठी में कड़ी चुनौती दी है. इस सीट के नतीजों पर भी सबकी नज़रें रहेंगी.

जनता यह भी जानना चाहेगी कि 'बदलाव की हवा' में यूपीए सरकार के कितने मंत्री अपनी राजनीतिक ज़मीन बचा पाते हैं.

बिहार के मधेपुरा में जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव, यूपी के आज़मगढ़ में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और बाग़पत में राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर है.

महंगाई, भ्रष्टाचार, बदलाव और विकास के मुद्दों पर लड़े गए दुनिया के इस सबसे बड़े और रंग-बिरंगे चुनाव के नतीजे कुछ लोगों को चौंका भी सकते हैं, लेकिन शायद उतना नहीं जितना पिछले तीन दिनों से चल रहे टीवी चैनलों के एग्ज़िट पोल ने चौंकाया है.

चुनावों के बाद के इन सर्वेक्षणों में आगे दिख रही भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन एनडीए को 257 से 340 तक सीटें मिलती बताई गई हैं.

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