मोदी को लेकर क्या कसक है आडवाणी के मन में?

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इस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के बजाय लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ती, तो क्या उसे ऐसी कामयाबी मिलती?

इस भारी विजय की उम्मीद शायद भाजपा को भी नहीं थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आंतरिक सर्वे में भी इसकी उम्मीद ज़ाहिर नहीं की गई थी.

चुनाव परिणाम आने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में लालकृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार, महंगाई और कुशासन के तीन परिणामों को गिनाया है.

उन्होंने कहा कि यह वोट भ्रष्टाचार और परिवारवाद के ख़िलाफ़ है. उन्होंने नरेंद्र मोदी का भी सरसरी तरीके से उल्लेख किया, पर खुलकर श्रेय नहीं दिया.

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‘शुद्ध भाजपा की जीत'

इसी प्रकार की प्रतिक्रिया सुषमा स्वराज की भी है. उनका कहना है कि यह ‘शुद्ध रूप से’ भाजपा की जीत है.

आडवाणी ने सार्वजनिक रूप से न तो मोदी को बधाई दी और न श्रेय दिया, बल्कि मोदी का नाम लेते वक़्त कहा कि इस बात का विश्लेषण किया जाना चाहिए कि इस जीत में नरेंद्र मोदी की भूमिका कितनी है.

इसके पहले सन 2012 में गुजरात विधानसभा के चुनाव में विजय पाने पर भी मोदी को बधाई उन्होंने नहीं दी थी.

उन्होंने पिछले साल मध्य प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीतने पर शिवराज सिंह चौहान को बधाई दी.

पिछले साल जब पार्टी का संसदीय बोर्ड नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने जा रहा था, तब आडवाणी घर से नहीं निकले, उनका इंतज़ार होता रहा.

इतना ही नहीं जब लोकसभा चुनाव के टिकट दिए जा रहे थे, तब उन्होंने गुजरात के बजाय मध्य प्रदेश से चुनाव लड़ने की इच्छा ज़ाहिर की थी.

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अंततः मोदी ने उन्हें मनाया और चुनाव जीतने में मदद भी की. पर क्या यह मान-मनौवल अब भी चलेगा?

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मोदी फ़ैक्टर

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में भी सामान्य वोटर से बात करें, तो वह भाजपा के बजाय मोदी का नाम लेता है. खासतौर से युवा वोटर ने मोदी का साथ दिया.

उत्तर प्रदेश और बिहार में मोदी की ओबीसी पहचान ने भी उन्हें फायदा पहुँचाया.

पार्टी कार्यकर्ता भी मोदी फ़ैक्टर को खुलकर स्वीकार करता है. पिछले साल खड़े हुए उस विवाद से मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज ने ख़ुद को बाहर कर लिया था, पर क्या यह विवाद भीतर नहीं है?

आडवाणी के मन की कसक

सवाल है मोदी को लेकर आडवाणी के मन में क्या कसक है? क्या कारण है कि वे खुलकर मोदी की तारीफ़ नहीं कर पाते हैं?

पिछले साल 8 जून को जब भाजपा ने चुनाव प्रचार की कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में देने का फैसला किया, उसके बाद उनके विरोध की लहर भी उठी थी.

यह लहर पार्टी के बाहर तो थी ही, पर उससे ज्यादा बड़ी लहर पार्टी के भीतर थी और उसके शिखर पर आडवाणी थे.

उन्होंने पार्टी के सारे पदों से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी और सार्वजनिक रूप से एक पत्र भी जारी किया.

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पहले ख़बर थी कि उन्हें राजग का चेयरमैन बनाया जा सकता है. फिर ख़बर आई कि मोदी इसके लिए तैयार नहीं हैं. वे चाहते हैं कि यह पद प्रधानमंत्री के पास ही रहना चाहिए.

इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी ने इस विजय की बुनियाद डाली है.

खासतौर से उत्तर प्रदेश में अमित शाह के रूप में उनका प्रयोग सफल रहा.

इस जीत का दरवाजा उत्तर प्रदेश ही खोल सकता था और यह जीत अब तक की सबसे बड़ी साबित हुई.

भारतीय झगड़ा पार्टी

भारतीय जनता पार्टी को एक ज़माने तक ‘पार्टी विद अ डिफ़रेंस’ कहा जाता था. कम से कम पार्टी को यह इल्हाम था. पिछले साल उसे ‘पार्टी विद डिफ़रेंसेज़’ या ‘भारतीय झगड़ा पार्टी’ कहा जाने लगा.

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स्वाभाविक था कि आडवाणी की अनुपस्थिति में और सहमति के बगैर नरेंद्र मोदी को साल 2014 के चुनाव की बागडोर थमाई गई, तो उसके पीछे वह सामूहिक बल नहीं था, जिसकी भाजपा को ज़रूरत थी और कांग्रेस ने मोदी पर निशाने लगाते वक़्त इसका बार-बार ज़िक्र किया.

मोदी को बेशक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन मिला, पर आडवाणी और कुछ अन्य नेताओं के विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी खड़े हो पाए तो इसका श्रेय मोदी को और उनके संगठन को भी दिया जाना चाहिए.

इसका मतलब यह है कि पार्टी संगठन के भीतर अपने विवादों को निपटाने का तंत्र फ़िलहाल काम कर रहा है.

क्या संघ का दबाव बढ़ेगा?

चुनाव में जीत हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी का क़द बढ़ा है. देखना यह है कि वे अपनी सरकार बनाने और चलाने का काम कितनी स्वतंत्रता के साथ करते हैं.

हिन्दुत्व या राष्ट्रवाद इसका केंद्रीय विचार है, पर अपने जन्म से ही यह तरह-तरह के भ्रमों से उलझी रही है और देखना यह होगा कि क्या नरेंद्र मोदी किसी नई राजनीतिक ज़मीन को तोड़ पाते हैं या नहीं.

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इसके पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी यह कोशिश कर चुके हैं.

बेशक यह संघ का संगठन है, पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का पहला अध्यक्षीय भाषण गुरु गोलवलकर की स्थापनाओं के मुक़ाबले उदार और असांप्रदायिक था.

शुरू से ही जनसंघ के मूल तत्व में दो बातें घुली-मिली हैं. एक, राष्ट्रवाद या हिंदुत्व और दूसरा, कांग्रेस से विरोध.

नरेंद्र मोदी कांग्रेसविहीन भारत की बात कर रहे हैं. वे विकास की बात करते हैं, हिंदुत्व की नहीं. उन्होंने भारतीय मुसलमानों से कहा है, ''मैं सत्ता में आया तो आप मुझे पसंद करेंगे''.

हालांकि आडवाणी ने जून 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान अपनी छवि बदलने की कोशिश की थी, पर जिन्ना की तारीफ़ का प्रसंग उनके ख़िलाफ़ गया.

वे संघ के आक्रमण का सामना नहीं कर पाए. उस वक़्त नरेंद्र मोदी उनकी मदद के लिए आगे आए थे.

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वोट दिलाऊ अवधारणा नहीं है हिंदुत्व

बीजेपी का हिंदुत्व अब वोट दिलाऊ अवधारणा नहीं है. नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि कारोबार-मित्र और कुशल प्रशासक की बनाई है.

उनका हिंदुत्व कारोबारी के रूप में सामने आया है. उन्हें देश के कॉरपोरेट सेक्टर का समर्थन प्राप्त है पर पार्टी के अनेक नेता ख़ुद को मोदी से ज़्यादा वरिष्ठ मानते हैं.

यह शुद्ध रूप से अहम की लड़ाई है. मोदी विनम्र नहीं हैं और अपनी तारीफ़ ख़ुद करते हैं. इसीलिए उनका नाम किसी ने फेंकू रखा है. यह गुण इंदिरा गांधी का भी था.

इंदिरा गांधी 1969-70 में अपनी पार्टी के खुर्राट नेताओं के मुक़ाबले जिस तरह खड़ी हुईं थीं, कुछ वैसा ही हमें आज भाजपा में देखने को मिल रहा है.

राजनीति में नेता और संगठन दोनों का महत्व होता है.

क्या नरेंद्र मोदी भाजपा के भीतर किसी बड़े बदलाव का श्रीगणेश करने वाले हैं?

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