भाजपा गठबंधन को आखिर क्या हुआ पंजाब में?

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पंजाब वैसे तो पांच आब यानी पांच नदियों का इलाक़ा है पर 13 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य से किसी भी दल को चार सीटों से ज़्यादा नहीं मिलीं.

यहां पार्टियों के बीच वोट प्रतिशत इतना बंटा हुआ था कि मोदी की लहर भी नज़र आ रही थी और आम आदमी पार्टी का ज़ोर भी.

अगर पंजाब की राजनीति पर ग़ौर करें, तो यहां मुक़ाबला शुरुआत से ही द्विपक्षीय माना जा रहा था. जिसमें एक तरफ़ शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन था तो दूसरी तरफ़ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस.

लड़ाई सीधी लग रही थी पर पंजाब के इस चुनावी दंगल के बीच में एक तीसरा पहलवान भी कूद पड़ा- आम आदमी पार्टी. इसके बाद सीधा-सीधा दो धड़ों के बीच होने वाला मुक़ाबला त्रिकोणीय और रोचक हो गया.

पंजाब के मुद्दे

पंजाब की सियासत समझने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि पंजाब में ग़रीबी या भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा, लेकिन हां, जनता इनसे त्रस्त ज़रूर रही है.

हर बार 1984 के दंगों, सिख धर्म और कनाडा के पासपोर्ट की राजनीति करने वाले राजनेताओं के लिए इस बार पंजाब की जनता का वोटिंग रुझान एक नया राजनीतिक अनुभव रहा.

पंजाब की 13 लोकसभा सीटों के वितरण पर ग़ौर करें पर ध्यान रखें कि चंडीगढ़ की सीट पंजाब में नहीं आती, सो पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से छह शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को, चार सीटें आम आदमी पार्टी को और तीन कांग्रेस को मिली हैं.

चक़ दे फ़ट्टे किसके

आम आदमी पार्टी ने यहां सभी 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और आख़िरी नतीजे आने तक उन्हें चार सीटें मिलीं. मगर ख़ुशी के साथ-साथ पार्टी के लिए यह राहत की ख़बर भी थी क्योंकि पंजाब के अलावा पूरे भारत में वे एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुए.

आम आदमी पार्टी के लिए मशहूर हास्य कलाकार भगवंत मान ने शिरोमणि अकाली दल के सुखदेव सिंह को हराकर संगरूर सीट पर क़ब्ज़ा जमाया. संगरूर के अलावा फ़रीदकोट से प्रोफ़ेसर संधु सिंह, फतेहगढ़ साहिब से हरिंदर सिंह खालसा और पटियाला से धर्मवीर गांधी ने आम आदमी पार्टी की झाड़ू ऊंची रखी.

आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन पर पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का कहना था, “यह हमारे लिए पहला चुनाव था और देश के नतीजों से हम निराश हैं लेकिन पंजाब के नतीजों ने हमें हैरान भी किया और हिम्मत भी दी है.”

शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के गठबंधन के लिए यहां राह काफ़ी आसान लग रही थी और उन्होंने सबसे ज्यादा छह सीटें भी जीतीं (अकाली दल को चार, भाजपा को दो). मगर इस जीत का स्वाद तब खट्टा हो गया, जब हाई प्रोफ़ाइल रही अमृतसर सीट पर कांग्रेस के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भाजपा नेता अरुण जेटली को 40 हज़ार से ज़्यादा वोटों से हरा दिया.

Image caption अमृतसर में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भाजपा के अरुण जेटली को शिकस्त दी.

कैप्टन और अरुण जेटली के बीच चुनाव से पहले कई वाकयुद्ध हुए, लेकिन अमरिंदर अपनी जीत को लेकर शुरू से ही आश्वस्त थे और अपनी जीत की प्रतिक्रिया में भी उन्होंने यही कहा, “भाजपा और अकाली दल के ख़िलाफ़ तो लोग शुरू से ही थे, लेकिन ‘आप’ का जीतना अप्रत्याशित था. सोशल मीडिया का इनको बहुत फ़ायदा हुआ है, लेकिन जैसे दिल्ली में ये आए और चले गए, यहां भी ऐसा ही होगा.”

ग़ैर सिख और बाहरी होने का ख़मियाज़ा अरुण जेटली को चुकाना पड़ा लेकिन भाजपा ने भी गुरदासपुर सीट पर कांग्रेस को पटखनी दी, जहां भाजपा के स्टार प्रचारक विनोद खन्ना ने कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रताप सिंह बाजवा को हराया.

कांग्रेस के हिस्से भले ही 13 में से तीन सीटें आई हों, अमृतसर में जेटली की हार से कांग्रेस के घावों पर थोड़ा मलहम ज़रूर लगा. कांग्रेस के हिस्से में अमृतसर के अलावा जालंधर (संतोख सिंह) और लुधियाना (रवनीत सिंह बिट्टू) की सीट आई.

चंडीगढ़ में 'मोदी' गढ़

पंजाब की कहानी अधूरी रहेगी, अगर चंडीगढ़ की बात न की जाए. चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों की राजधानी है और यहां की जीत राजनीतिक महत्ता के साथ साथ प्रतिष्ठा का मुक़ाबला भी थी.

इस सीट पर मुक़ाबला फ़िल्मी था. एक तरफ़ भाजपा ने चंडीगढ़ से अभिनेत्री किरण खेर को उतारा था, वहीं आम आदमी पार्टी ने भी अभिनेत्री गुल पनाग पर अपना दांव खेला.

कांग्रेस ने यहां से यूपीए सरकार में रेल मंत्री रहे और चंडीगढ़ निवासी पवन बंसल को प्रत्याशी बनाया था. कांग्रेस का मन तो लोकल कार्ड खेलने का था, लेकिन पवन बंसल के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उस वजह से उनका इस्तीफ़ा लोग भूले नहीं थे.

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Image caption किरण ने बॉलिवुड की ही ग़ुल पनाग को पीछे छोड़ा

मोदी लहर ने यहां अपना जादू दिखाया और इस सीट को किरण खेर ले गईं. अपनी जीत का श्रेय उन्होंने मोदी के सिर ही बांधा.

उन्होंने कहा, “हम एक ऐसे जनरल के पीछे लड़े, जिसने हमें जीत के मुहाने तक ला दिया. यह तो जनता की भाजपा और मोदी को स्वीकारोक्ति है.”

हार के बाद गुलपनाग ने कोई प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया, लेकिन नई सरकार के लिए पंजाब में जिस तरह से मतदाताओं ने अपने नेताओं को चुना है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि पंजाब में अब सियासी मुद्दे बदलने लगे हैं.

पंजाबी में कहावत भी है- "पंजाबियां दी शान वखरी, ते पंजाबियां दे मत भी वखरे वखरे ने"

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