उत्तराखंडः मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए 'ज़ोर'

  • 19 मई 2014
हरीश रावत, विजय बहुगुणा

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी कुर्सी और सरकार बचाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. इस कड़ी में उन्होंने अपनी एक वरिष्ठ मंत्री अमृता रावत को कैबिनेट से हटा दिया है.

अमृता रावत की जगह टिहरी विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक दिनेश धनै को कैबिनेट में शामिल किया गया है. अमृता रावत गढ़वाल से कांग्रेस के पूर्व सांसद और अब भाजपा नेता सतपाल महाराज की पत्नी हैं.

उन्होंने मुख्यमंत्री के फ़ैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.

पूरे देश में भाजपा को मिले भारी जनादेश के बीच कांग्रेस शासित राज्यों में सरकार बचाने की कवायद ज़ोर-शोर से जारी हैं. अपनी कुर्सी बचाने के लिए हरीश रावत के लिए ये पसीना बहाने के दिन हैं.

हरीश रावत: 'राजनीति दिमाग से, दिल की बात दिल में'

उत्तराखंड की पांचों सीटें भाजपा के खाते में गई हैं. वहां भाजपा के उम्मीदवारों ने बहुत बड़े अंतर से जीत हासिल की है. इन परिस्थितियों में कांग्रेस और हरीश रावत के लिए बेचैन होना स्वाभाविक था.

विधायकों का समर्थन

सूत्रों के मुताबिक भाजपा यहां मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार गिराने का खेल शुरू कर सकती थी. पर्दे के पीछे से ये काम शुरू भी हो चुका था लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी हरीश रावत ने एक्जिट पोल आते ही अपने दांव चलाने शुरू कर दिए थे.

मुख्यमंत्री ने अपनी ही पार्टी में विजय बहुगुणा के समर्थकों को अपनी ओर खींचा. इसके लिए उन्होंने बहुगुणा समर्थक सात विधायकों को मंत्री स्तर का दर्जा दे दिया.

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ऐसे में अब कांग्रेस के 33 विधायकों में से बहुगुणा और सुबोध उनियाल को छोड़ दें तो सबके पास कुछ न कुछ ओहदा है.

कांग्रेस को समर्थन दे रहे जनलोकतांत्रिक मोर्चा यानी पीडीएफ़ के एक और सदस्य दिनेश धनै को भी कैबिनेट मंत्री बना दिया गया है.

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बीएसपी के तीन, तीन निर्दलीय और यूकेडी के एक विधायक ने मिलकर पीडीएफ बनाया था. बीएसपी के दो विधायक पार्टी से निष्काषित हैं. बताया जाता है कि वो अलग दल बनाकर कांग्रेस में विलय कर सकते हैं.

इस तरह हरीश रावत के पास विधानसभा के भीतर 40 विधायकों का समर्थन है. यह संख्या बहुमत से चार ज़्यादा है. लेकिन कोई नहीं जानता कब कौन किस मोड़ पर पलट जाए.

महिला विरोधी राजनीति

कांग्रेस विधायक सुबोध उनियाल का कहना है, “ ये मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है. वैसे भी कांग्रेस पांचों सीट पर हारी है, ऐसे में मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया जाना जरूरी है ताकि क्षमतावान लोगों को जगह मिल सके और सरकार पर जनता का विश्वास फिर से स्थापित किया जा सके.”

सतपाल महाराज जिस गढ़वाल सीट से सांसद थे वहां बीजेपी के बीसी खंडूरी ने भारी अंतर से जीत हासिल कर कांग्रेस के हरक सिंह रावत को हराया.

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हरक सिंह ने देहरादून पहुंचकर नतीजे आने के बाद सबसे पहला काम ये किया कि कैबिनेट में अपनी सहयोगी अमृता रावत को मंत्री पद से हटाने की मांग उठा दी. उनका आरोप है कि अमृता रावत ने पार्टी हित से इतर काम किया.

बहरहाल, अमृता रावत ने मुख्यमंत्री के ताज़ा क़दम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि “उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए. ये महिला विरोधी राजनीति है.”

लेकिन इस पूरे मामले का एक नाटकीय पहलू ये भी है कि क्या अमृता रावत पार्टी की विधायक बनी रहेगी. अगर वो पार्टी छोड़ती है तो विधायक नहीं रहेंगी.

माना जा रहा है कि उन्हें बीजेपी सांत्वना के रूप में उन सीटों में से किसी एक पर उपचुनाव लड़ा सकती है जो बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के सांसद बनने से खाली हो रही है.

उत्तराखंड की कमान

पीडीएफ के नेता और अब उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री दिनेश धनै कल तक सरकार की स्थिरता को लेकर हां ना हां ना करते रहे थे लेकिन अब उनके सुर बदल गए हैं. दिनेश धनै का कहना है कि “जहां तक पीडीएफ़ का सवाल है तो पीडीएफ़ पूरी तरह कांग्रेस के साथ है.”

चुनाव से कुछ महीने पहले बहुगुणा को हटाकर हरीश रावत को उत्तराखंड की कमान सौंपी गई थी. बहुगुणा करीब दो साल राज कर पाए.

उत्तराखंड कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में बहुगुणा और सुबोध उनियाल ही हैं जिन्हें फिलहाल कुछ नहीं मिला है.

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सुबोध उनियाल ने संकेतों में अपना मलाल ज़ाहिर करते हुए कहा, “मुख्यमंत्री के अपने मानदंड होते हैं ये तय करने के कि कौन क़ाबिल है कौन नहीं. तो ये मैन टू मैन कैरी करता है. मुख्यमंत्रीजी अपनी सोच के हिसाब से तय करेंगे. जो उन्हें काबिल लगेगा उसे रखेंगे जो नाक़ाबिल लगेगा उसे नहीं रखेंगे.”

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो सुबोध प्रदेश अध्यक्ष पद पर दावा ठोक रहे हैं लेकिन कई कारणों से हरीश रावत ऐसा नहीं होने देना चाहते.

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