चंट जुआरी वोटरों पर 'रिलायंस'

नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट Reuters

जो जनता 62 सालों में 15 चुनाव भुगता दे वह कम से कम 16वें तक इस क़ाबिल ज़रूर हो जाती है कि सियासी जुआ खेल सके.

मुझे एक भारतीय चैनल पर एक आम सा, ग़रीब सा कानपुरवासी बहुत अच्छा लगा.

किसे वोट दे रहे हो?

बीजेपी को जी.

आप बीजेपी के वोटर हैं?

नहीं, पहली बार दे रहे हैं. अब तक कांग्रेस को दिया है.

तो इस बार मोदी को क्यों?

क्योंकि वह विकास और अच्छे दिनों की बात कर रहे हैं.

और अगर ऐसा न हुआ तो?

तो अगले चुनाव में फिर कांग्रेस को देंगे.

हिटलरी का वक्त ख़त्म

क्या बांग्लादेश बनने के बाद वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा नहीं कहा था? और दुर्गा को 518 में से 342 सीटें नहीं मिली थीं? और जब दुर्गा के दांतों से एमरजेंसी का ख़ून टपकने लगा तो अगले चुनावों में जनता ने देवी जी को मिट्टी नहीं चटवा दी थी?

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

और फिर इसी जनता ने 1980 में इसी देवीजी को माफ़ करके, गले लगाकर 529 में 353 सीटें दान नहीं की थीं? और फिर इसी जनता ने बीजेपी के साथ 1998 के चुनावों में क्या किया? फिर इंडिया शाइनिंग वाले 2004 के चुनाव और 2009 के चुनाव में क्या किया?

कहने का मतलब यह है कि ऐसी 'चलित्तर' जनता के बीच नरेंद्र मोदी सबका विकास के नारे से मुंह मोड़कर कितना आगे जा सकेंगे!

ज़ाहिरा तौर पर तो यही लगता है कि संघ परिवार भले मुंह से न कहे लेकिन उसे 2009 के बाद यह बात समझ में आ गई कि राम मंदिर के रथ पर बैठकर बहुत दूर तक नहीं जाया जा सकता.

और गड़े मुर्दों को ज़िंदा करके मीडिया एज में रहने वाली मिडिल और लोअर मिडिल क्लास को पुराना लॉलीपॉप नहीं देने का.

कहने को तो यह भी कहा जा सकता है कि हिटलर भी लोगों के वोटों से सत्ता में आया था. लेकिन यह भी तो देखो कि 85 साल पहले दुनिया ग्लोबल विलेज नहीं थी वरना कसंट्रेशन कैंपों की तस्वीरें 1940 में ही फ़ेसबुक में आ चुकी होतीं.

आज आप तबियत में तो हिटलर हो सकते हैं लेकिन आज की दुनिया ख़ुद पर आपकी हिटलरी ज़्यादा चलने नहीं देती.

15 चुनावों की सीखी-सिखाई जनता के होते हुए भारत में धर्मनिरपेक्षिज़्म इतने ही ख़तरे में है जितना पाकिस्तान में इस्लाम.

इमेज कॉपीरइट AFP

और भारत क्या उत्तरी काउ बेल्ट का ही नाम है? दक्षिण और उत्तर-पूर्व की रंगारंग संस्कृति को आप किस खाते में डालेंगे?

जनता पर भरोसा करिए

यह ठीक है कि अल्पसंख्यकों, ख़ासतौर पर मुसलमानों के संदर्भ में मोदी की राजनीतिक फ़ाइल का एक पूरा पन्ना लाल है और गोधरा के बाद होने वाले गुजरात के चुनावों में मोदी ने सब पार्टियों का सफ़ाया कर दिया था और उन चुनावों के नतीजों से धर्मनिरपेक्ष सोच और परंपराओं को धक्का भी लगा था.

लेकिन यह तो तब भी हुआ था जब दिल्ली में 31 अक्टूबर 1984 को एक बड़ा दरख़्त गिरा था और उसकी धमक के नीचे 3000 सिख दबकर मर गए थे. और फिर उसी कांग्रेस को 50 फ़ीसदी वोट और 403 सीटें मिल गईं.

तो क्या भारत इस तरह के धक्कों को बार-बार सहकर, कपड़े झाड़कर बार-बार खड़ा नहीं हो जाता.

हां अगर भारत में सबका विकास का नारा दरअसल सांप्रदायिकता पर निर्भर राजनीति का कोई ट्रोज़न हॉर्स है तो इसका पाकिस्तान पर सीधा असर यह पड़ेगा कि वहां अभी-अभी नया-नया सिर उठाने वाला लोकतंत्र राष्ट्रीय फ़ासीवाद की गर्म चपेट में आ सकता है और अंधराष्ट्रवाद का एक नया दौर इस भारतीय उपमहाद्वीप को नष्ट कर सकता है.

2014 के बाद अगर 'मोदीफ़ाइड' भारत की 'अब्दुल्लाफ़ाइड' अफ़गानिस्तान में दिलचस्पी पाकिस्तान की कीमत पर ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ती है तो पिछले दस बरसों में दोनों के संबंधों पर जमने वाली हल्की सी खुरंड भी खुरच सकती है.

पाकिस्तान में तो अभी से बातें शुरू हो गई हैं कि 'देखा हम न कहते थे कि टू-नेशन सिद्धांत इतना ग़लत भी नहीं था.'

फिर भी मुझ जैसे खुद को बुद्धिजीवी समझने वाले फ़ुटपाथिए ग़ुमान रखते हैं कि गुजरात और लाहौर के कारोबारी पुरानी फ़ाइलें खोलने से परहेज़ करेंगे.

आखिर दोनों ने ही विकास के नाम पर अपनी-अपनी जनता से ढेरों वोट बटोरा है. इसीलिए दोनों को यह भी याद रखना चाहिए कि दोनों के पैरों के नीचे जो नर्म-नर्म कालीन ताज़ा-ताज़ा बिछाया गया है, वह किराए का है.

माना कि जनता बहुत चंट जुआरी है लेकिन इसी जनता पर भरोसा किए बग़ैर भी तो गुज़ारा नहीं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार