घर घर बिजली पहुंचाना आज भी सपना

  • 20 मई 2014
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पर्याप्त संसाधनों की कमी की वजह से भारत में क़तार के आख़िर लोगों तक बिजली पहुंचाना सिर्फ एक सपना बन कर ही रह गया है और इसकी भी संभावनाएं भी कम हैं कि अगले 15 सालों में भी यह संभव हो पाएगा.

योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार लगभग चालीस करोड़ लोग यानी आबादी के एक तिहाई लोग भारत में आज भी ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं पहुंच पाई है. इनमे ज़्यादातर वो लोग हैं जो सुदूर ग्रामीण अंचलों में रहते हैं.

जिन 80 करोड़ लोगों तक बिजली पहुंच भी पा रही है, उन्हें ये पर्याप्त तौर पर नहीं मिल पाती है. ख़ास तौर पर उन लोगों को, जो शहरों में नहीं रहते हैं.

मनमोहन सिंह ने वर्ष 2004 में कहा था कि 2009 तक सरकार हर नागरिक तक बिजली पहुंचा पाएगी. वर्ष 2009 में उन्होंने कहा की 2011 तक ये संभव हो पाएगा.

2011 में उन्होंने कहा कि 2012 तक भारत का पूरी तरह विद्युतीकरण हो जाएगा. वर्ष 2012 में उन्होंने कहा कि शायद 2017 तक ऐसा संभव हो पाए. मगर अब जब 2014 के कई महीने भी बीत चुके हैं तो ऐसा लगता है कि अगले पंद्रह सालों भी इसके आसार दूर दूर तक नहीं हैं.

बिजली का हिसाब किताब

पिछले 25 सालों पर अगर नज़र डाली जाए तो पूर्ण विद्युतीकरण की दिशा में हुए प्रयास लक्ष्य के 50 प्रतिशत टार्गेट तक भी नहीं पहुंच पाए हैं.

भारत में ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता (इन्सटाल्ड कैपेसिटी) 2034602 मेगावाट की है जबकि ज़रूरत के हिसाब से वर्ष 2030 तक 8 लाख मेगावाट तक की स्थापित क्षमता की ज़रूरत होगी.

मौजूदा क्षमता में कोयले पर आधारित 160,484 मेगावाट है जबकि पन-बिजली पर 39,875 मेगावाट, सौर ऊर्जा की 29,463 और परमाणु पर सिर्फ 4780 मेगावाट है.

ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता (इन्सटाल्ड कैपेसिटी) का 54 प्रतिशत कोयले पर आधारित है जबकि 24 प्रतिशत पन-बिजली पर, 12 प्रतिशत सौर ऊर्जा पर, 8 प्रतिशत गैस पर और मात्र 2 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा पर.

आंकड़े बताते हैं कि आज भी परमाणु ऊर्जा को वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में नहीं देखा जा सकता है क्योंकि यूरेनियम की आपूर्ति के लिए रूस, मंगोलिया, कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर होना पड़ेगा.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने संसद में वर्ष 2014-15 का अंतरिम बजट पेश करते हुआ कहा था कि भारत की विद्युत उत्पादन की स्थापित क्षमता दस सालों में दोगुनी हो गई है.

उनका कहना था कि दस साल पहले ये क्षमता सिर्फ 112,700 मेगावाट ही थी. चिदंबरम का दावा है कि सिर्फ़ पिछले वित्तिय वर्ष में ही 29,000 मेगावाट की क्षमता जोड़ी गई.

कोयले के अलावा चारा नहीं

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केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के सदस्य रहे अलोक गुप्ता का कहना है कि आने वाले कई सालों तक विद्युत उत्पादन के लिए कोयले और गैस पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. बीबीसी से उन्होंने कहा, "अभी तो इन दो संसाधनों पर ही पूरी निर्भरता रहेगी. सौर ऊर्जा पर लम्बे समय तक निर्भर नहीं रहा जा सकता है. ये पूरी तरह से मौसम के भरोसे ही चलती है."

मगर गुप्ता का कहना है कि कोयला और गैस के संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं इसलिए ऊर्जा का संकट बना ही रहेगा.

कोयले की अगर बात की जाए तो भारत के पास कोयले के भण्डार हैं तो ज़रूर, मगर यह सब उन इलाक़ों में ज़्यादा हैं जहां जंगल हैं. इसलिए ये फैसला करना कठिन होगा की हमें कोयला चाहिए या पर्यावरण.

दूसरी तरफ कोयले के जो भंडार भारत में मौजूद हैं वो उतनी अच्छी गुणवत्ता वाले नहीं हैं और निर्भरता आखिरकार दूसरे देशों पर बनी हुई है. चूंकि आयात किए हुए कोयले का मूल्य अधिक पड़ता है इसलिए आने वाले दिनों में भी बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी होती रहेगी.

ऊर्जा क्षेत्र पर नज़र रखने वाले केशव चतुर्वेदी का कहना है कि सौर ऊर्जा से औद्योगिक ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं, इसलिए उस पर पूरी तरह निर्भर भी नहीं रहा जा सकता है.

वो कहते हैं, "हमारे पास यूरेनियम के उतने भंडार नहीं हैं, और ना ही उतना कोयला ही है. पन-बिजली के लिए बड़े बड़े बांध बनाने पड़ेंगे जो किफ़ायती भी नहीं हैं और उनके बनने से पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा."

बिजली के उत्पादन के लिए जो मुख्य स्रोत बचता है वो है कोयला और कोयले का निर्यात करने के अलावा भारत के पास कोई दूसरा चारा नहीं है.

सौर ऊर्जा से करें रोशन

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जानकारों का कहना है कि इस परिस्थिति से निपटने का उपाय है कि सौर ऊर्जा का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल ग्रामीण इलाक़ों में विद्युतीकरण के लिए किया जाना चाहिए जिससे काफी राहत मिल सकती है और कोयले से उत्पादित बिजली औद्योगिक ईकाइयों के लिए मुहैया करायी जा सकती है. सौर ऊर्जा का इस्तेमाल उन इलाक़ों तक बिजली पहुंचाने में किया जा सकता है.

अलोक गुप्ता का कहना है कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत ग्रामीण इलाक़ों में बिजली के तार तो पहुँच चुके हैं. लेकिन एक बड़े इलाक़े में आपूर्ति शुरू नहीं हो पाई है. उनका कहना है कि ग्रामीण इलाक़ों में बिजली पहुंचाने के लिए उत्पादन क्षमता को बढ़ाना होगा. तब कहीं जाकर इन इलाक़ों में बिजली पहुंच पाएगी.

मगर केशव चतुर्वेदी कहते हैं कि सरकार को चाहिए कि जिन इलाक़ों में बिजली पहुंचाना संभव नहीं हो पा रहा है वहां पर सौर ऊर्जा का इंतज़ाम कराया जाना चाहिए ताकि कम से कम वहां बल्ब तो जल सकें.

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