आप जानते हैं कैसे राजनीति में आईं आनंदीबेन पटेल?

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'सरदार पटेल के बाद गुजरात के और देश के अगले लौह पुरुष नरेंद्र मोदी हैं.' जब लोग यह बात कहते होंगे तो शायद नरेंद्र मोदी को अच्छा लगता होगा. अब, जब 'मिस्टर आयरन मैन' गुजरात का मुख्यमंत्री पद छोड़ भारत के प्रधानमंत्री बन रहे हैं तो उनकी कुर्सी और कोई नहीं बल्कि 'आयरन लेडी' कहलाने वाली आनंदीबेन पटेल ले रही हैं.

कुछ देर पहले नरेंद्र मोदी और भाजपा के विधायकों ने उनके नाम पर मोहर लगा दी है.

73 वर्षीय आनंदीबेन गुजरात राज्य की सबसे पहली महिला मुख्यमंत्री होगी. वह गुरुवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी.

एक गाँधीवादी के घर जन्मी और स्कूल टीचर से राजनीति के क्षेत्र में आईं आनंदीबेन पटेल, गुजरात की राजनीति के लिए नया चेहरा नहीं है. लेकिन उनकी ज़िन्दगी के कई ऐसे पहलू हैं, जो बहुत से लोग नहीं जानते.

रेस में सबसे आगे

बेहद अनुशासित, सख़्त और सीधी बात करने वाली आनंदीबेन मोदी की सबसे करीबी और विश्वासपात्र नेता हैं.

मोदी के कुर्सी खाली करते ही, गुजरात की राजनीति में मुख्यमंत्री पद के लिए मानो दौड़ लग गई थी. हर नेता अपने सहयोगियों और कार्यकर्ताओं से अपने लिए पैरवी करवा रहा था.

राज्य भाजपा के कई नेता भिखू दलसाणिया, अमित शाह, सौरभ पटेल, नितिन पटेल और गणपत वसावा मुख्यमंत्री पद की आस लगाए बैठे थे. लेकिन पिछले कुछ दिनों से यह लगभग तय लग रहा था कि आनंदीबेन इस रेस में सबसे आगे निकल जाएंगी.

और बुधवार को मोदी ने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए राजस्व और शहरी विकास मंत्री आनंदीबेन को अपनी कुर्सी सौंपी.

कौन है आनंदीबेन?

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राजनीति में आने से पहले आनंदी बेन अहमदाबाद के मोहिनीबा कन्या विद्यालय में प्रधानाचार्य थीं.

राजनीति में उनका का प्रवेश 1987 में स्कूल पिकनिक के दौरान एक दुर्घटना की वजह से हुआ.

हुआ यूं कि स्कूल पिकनिक के दौरान दो छात्राएं नर्मदा नदी में गिर गईं. उन्हें डूबता देख आनंदीबेन भी उफनती नदी में कूद पड़ीं और दोनों को ज़िंदा बाहर निकाल लाईं.

इसके लिए आनंदीबेन को राज्य सरकार ने वीरता पुरस्कार से नवाज़ा. इस घटना के बाद आनंदीबेन के पति मफतभाई पटेल, जो उन दिनों गुजरात भाजपा के कद्दावर नेताओ में से एक थे, के दोस्त नरेंद्र मोदी और शंकरसिंह वाघेला ने उन्हें भाजपा से जुड़ने और महिलाओं को पार्टी के साथ जोड़ने के लिए कहा.

बस उसी साल आनंदीबेन, गुजरात प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष बनकर, भाजपा में शामिल हो गईं. पार्टी में उन दिनों कोई मजबूत महिला नेता नहीं थी इसलिए कुछ ही दिनों में भाजपा में आनंदीबेन एक निडर नेता के तौर पर उभरीं.

राजनीति में आने के सात वर्ष बाद ही 1994 में वह गुजरात से राज्यसभा की सांसद बनीं. उसके बाद 1998 के विधानसभा चुनाव में वह बतौर विधायक गुजरात के मांडल इलाक़े से चुनी गईं और केशुभाई पटेल की सरकार में उन्हें शिक्षा मंत्री बनाया गया.

लेकिन वह हमेशा से ही मोदी के नज़दीक रहीं. 1995 में शंकरसिंह वाघेला का विद्रोह हो या 2001 में केशुभाई को पद से हटाने की बात हो, आनंदीबेन हमेशा मोदी के साथ खड़ी रहीं.

मोदी सरकार में आए उसके बाद कुछ दिनों तक शिक्षा मंत्री रही आनंदीबेन को शहरी विकास और राजस्व मंत्री बनाया गया. वह राज्य सरकार की कई और समितियों की भी अध्यक्ष थीं.

गुरु और चेला?

यह बात काम ही लोग जानते हैं कि टाटा नैनो को ज़मीन देने की बात हो या नर्मदा नहर के लिए किसानों से ज़मीन लेने का काम, इन सबके पीछे आनंदीबेन का हाथ था.

गुजरात राज्य की कई और नीतियां, जिनके लिए मोदी ने वाहवाही लूटी है, उनके पीछे आनंदीबेन ही हैं.

फिर चाहे वह ई-ज़मीन कार्यक्रम हो, जमीन के स्वामित्व डाटा और जमीन के रिकॉर्ड को कंप्यूटरीकृत करके जमीन के सौदों में होने वाली धांधली को रोकने की बात हो, या फिर गुजरात के 52 प्रतिशत किसानों के अंगूठे के निशानों और तस्वीरों का कंप्यूटरीकरण कर देने की बात हो.

आनंदीबेन पटेल मोदी के लिए प्रशासनिक काम करने वाली सबसे कुशल मंत्री रही हैं.

आनंदीबेन की बेटी अनार पटेल ने कहा, "मोदी और आनंदीबेन के बीच गुरू और चेले जैसा रिश्ता है. उन्होंने मोदी चाचा से बहुत सीखा है और वह उनका बहुत आदर करती हैं,"

अनार कहती हैं कि उनकी माँ एक निडर नेता हैं और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने से कभी पीछे नहीं हटतीं. आनंदीबेन के दो बच्चे हैं बेटा संजय और बेटी अनार. अपने पति, मफतभाई, से वह कई साल पहले अलग हो गई हैं.

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अनार अपने पति जयेश के साथ पिछले कई सालों से गांधी आश्रम में मानव साधना नाम की एक संस्था चला रही है.

पिता से प्रभावित

अनार बताती हैं. "जब वह राजनीति में नहीं थीं तब उन्होंने अपने भाई को अपने बेटे का बाल विवाह करने से रोकने की कोशिश की. उन दिनों पटेल समाज में बाल विवाह बहुत ही आम बात थी. लेकिन मेरे मामा देवचन्दभाई नहीं माने तो उन्हें रोकने के लिए मम्मी ने पुलिस कंप्लेंट कर दी और पुलिस ने शादी के दिन आकर विवाह रोक दिया".

"उस दिन से लोगों ने हमारे समाज में बाल विवाह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना शुरू कर दिया और कुछ ही दिनों में यह प्रथा बंद हो गई."

अनार कहती हैं कि आनंदीबेन के आदर्श, उनके पिता जेठाभाई पटेल, हैं जो उत्तर गुजरात के एक छोटे से गांव में रहने वाले एक गाँधीवादी थे, "नानाजी पूरी तौर से गाँधीवादी थे. उन्हें कई बार लोगों ने गाँव से निकाल दिया था क्योंकि वह ऊंच-नीच और जातीय भेदभाव को मिटाने की बात करते थे."

"उस समय जब कोई लड़कियों को स्कूल नहीं भेजता था उन्होंने मम्मी को हमेशा पढ़ने के लिए प्रोत्साहन दिया. उन्हीं की तरह आनंदीबेन भी किसी में भेदभाव नहीं रखती और पैसे खाने वाले और चापलूस लोगों को अपने करीब नहीं आने देतीं."

अनार कहती हैं कि आनंदीबेन बहुत सख़्त हैं और उतनी ही सरल भी. वह बताती हैं, "उनको पक्षियों से बहुत लगाव है और बागवानी में अपना समय बिताना अच्छा लगता है. मेरे और मेरे भाई के घर पर उपयोग में आने वाली सब्ज़ियां और फल वही भिजवाती हैं. उन्होंने अपने सरकारी मकान के बगीचे में कई तरह के आर्गेनिक फल और सब्ज़ियां उगा रखे हैं."

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