सूरज की रोशनी दूर कर सकती है 'भारत का अंधेरा'

 बुधवार, 21 मई, 2014 को 07:12 IST तक के समाचार
गुजरात में सौर उर्जा

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का एक बड़ा इलाक़ा बाक़ी दुनिया से कटा हुआ है. भौगोलिक परिस्थिति और दुर्गम रास्ते दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर और बीजापुर जैसे क्षेत्रों में पहुंच को और भी मुश्किल बना देते हैं.

इन इलाक़ों में चल रहे संघर्ष की वजह से बहुत सारी सुविधाएं ऐसी हैं जो यहाँ तक पहुंचाई नहीं जा सकती है. इनमें सबसे अहम है बिजली. कई इलाक़े हैं जहां मौजूदा हालात में बिजली के तार पहुंचाना भी काफ़ी मुश्किल काम साबित हो रहा है.

मगर इन इलाक़ों में ग़ैर परंपरागत ऊर्जा ने एक नई उम्मीद की किरण रोशन की है. नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा के सुदूर इलाक़े हों या फिर इस ज़िले के शहरी क्षेत्र. सौर ऊर्जा ने यहां की जीवन शैली को बदल कर रख दिया है.

चाहे सड़क के किनारे बिजली के बल्ब हों या जंगल के इलाक़ों में स्कूल या आश्रम हों या स्थानीय प्रशासन, सबने नियमित बिजली की आपूर्ति पर निर्भर होने के बजाय, सौर ऊर्जा का सहारा लिया है. और प्रशासन का दावा है कि इस पहल के अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं.

सीमित इस्तेमाल

भारत में ग़ैर परम्परागत ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता 12 प्रतिशत है जो 24000 मेगावाट से बस थोड़ी ज़्यादा है. 2020 तक इसका लक्ष्य पंद्रह प्रतिशत रखा गया है. इसमें ज़्यादा योगदान सौर ऊर्जा का है जबकि पवन-चक्की यानी 'विंड मिल' और बायो गैस का योगदान बहुत ही कम है.

"सौर ऊर्जा का इस्तेमाल मुख्य रूप से घरेलू और व्यावसायिक हो सकता है जबकि ये तकनीक औद्योगिक क्षेत्र की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती है."

उत्पल भास्कर, ऊर्जा मामलों के जानकार

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि भारत की कुल आबादी के 40 प्रतिशत लोगों तक आज भी बिजली नहीं पहुंच पाई है. कई राज्य ऐसे हैं जहां आज भी ग्रामीण विद्युतीकरण का काम नहीं हो पाया है. ऐसे में ग़ैर परम्परागत ऊर्जा एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है.

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यह परम्परागत ऊर्जा का विकल्प तो नहीं हो सकता है, मगर ये उन इलाक़ों में बिजली पहुंचाने में कारगर साबित हो सकता है जहां तक तार पहुंचाने मुश्किल हों.

'मिंट' अख़बार के ऊर्जा सम्पादक उत्पल भास्कर मानते हैं कि सौर ऊर्जा का इस्तेमाल मुख्य रूप से घरेलू और व्यावसायिक हो सकता है जबकि ये तकनीक औद्योगिक क्षेत्र की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती है.

उनका कहना है कि ये एक बेहतर विकल्प ज़रूर है ऐसे में जब परंपरागत बिजली के लिए कोयले पर निर्भरता बढ़ती जा रही है और कोयले के भण्डार भी सीमित हैं, सौर ऊर्जा या बायो गैस से पैदा की जाने वाली ऊर्जा को ही विकल्प बनाने की दिशा में काम करना चाहिए.

सरकारी अनुदान

सौर ऊर्जा फार्म

चीन जैसे देशों में सौर ऊर्जा फार्म बनाए जा रहे हैं

ऊर्जा क्षेत्र पर नज़र रखने वाले केशव चतुर्वेदी कहते हैं कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत परंपरागत ऊर्जा की बजाय सौर ऊर्जा की माध्यम से विद्युतीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

"बायो गैस और सौर ऊर्जा पन-चक्कियों की तुलना में ज़्यादा टिकाऊ हैं. शहरी इलाक़ों में पन-चक्कियां लगाई नहीं जा सकती है. मगर शहरों में सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा सकता है."

केशव चतुर्वेदी, उर्जा विशेषज्ञ

वे कहते हैं, "बायो गैस और सौर ऊर्जा पन-चक्कियों की तुलना में ज़्यादा टिकाऊ हैं. शहरी इलाक़ों में पन-चक्कियां लगाई नहीं जा सकती है. मगर शहरों में सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा सकता है. उसी तरह ग्रामीण इलाक़ों में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना पर ज़्यादा ज़ोर देने की बजाय, सौर ऊर्जा पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए."

उनका कहना है कि घरेलू खपत के लिए सौर ऊर्जा की इकाई लगाने के लिए सरकार अनुदान भी दे रही है. इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

वैसे 2010 में सौर ऊर्जा जो बढ़ावा देने के लिए 'रिन्यूएबल पावर पर्चेज़ आर्गेनाईजेशन' तैयार किया गया जिसके तहत राज्यों से कहा गया कि वो कम से कम पांच प्रतिशत ऊर्जा ग़ैर परंपरागत तरीके से पैदा करने की कोशिश करें.

कुछ राज्यों ने ऐसा करना शुरू भी किया. इसमें छत्तीसगढ़ और गुजरात प्रमुख हैं. लेकिन दिल्ली जैसे कुछ राज्य अब भी काफी पीछे चल रहे हैं.

राज्यों की इच्छाशक्ति की कमी का उदहारण इस बात से मिलता है की राष्ट्रमंडल खेलों के बाद त्यागराज स्टेडियम में जो सौर ऊर्जा के लिए एक मेगावाट की इकाई लगाई गई थी, वो खेल ख़त्म होने के बाद से बेकार पड़ी हुई है.

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