एक बुकसेलर का इस दुनिया से जाना

केडी सिंह, द बुक शॉप इमेज कॉपीरइट Mayank Austen Soofi The Delhi Walla

बात 1992 की है. मेरा यूपीएससी का इंटरव्यू था. चूंकि मैंने अपने आवेदन में अपना शौक किताबें पढ़ना लिखा था, मैंने सोचा कि क्यों न ख़ान मार्केट जाकर एक नई किताब ख़रीदकर पढ़ी जाए ताकि अगर हाल ही में पढ़ी किताब को लेकर कोई सवाल पूछा जाए तो मैं कह सकूं कि मैने फ़लां-फलां किताब पढ़ी है.

मैं खान मार्केट की बुक शॉप पर जाने-माने क्रिकेटर संदीप पाटिल की आत्मकथा सैंडी स्टॉर्म के पन्ने पलट रहा था कि पीछे से आवाज़ आई, "बरख़ुरदार अगर क्रिकेट पर पढ़ना है, तो जॉन आरलट की किताब बेज़िंगस्टोक ब्वॉय पढ़ो."

मार्केज़: उनके वाक्य हमें पलट कर पढ़ते रहेंगे

मैं पीछे पलटा और देखा एक सरदार जी मेरे हाथ में मौजूद किताब को निहार रहे थे. मैंने उनकी तरफ़ नज़र उठाई तो फ़ौरन उन्होंने सवाल दागा, "जॉन आरलट का नाम सुना है."

मैंने कहा, "मशहूर क्रिकेट कॉमेंटेटर जॉन आरलट को कौन नहीं जानता?"

मेरा यह कहना था कि वो सरदार जी मेरे और नज़दीक आ गए. बोले, "जनाब मेरी बात मानिए..ये किताब ले जाइए. आप मुझे दुआ देंगे. गुंडप्पा विश्वनाथ के लेग ग्लांस की बारीक़ी कॉमेन्टेटर की नज़र से जानना चाहते हैं, तो इस किताब को पढ़िए."

यह थे बुक शॉप के मालिक कंवरजीत सिंह ढींगरा. 21 मई को कंवरजीत सिंह ढींगरा का 73 साल की आयु में देहांत हो गया. वह कैंसर से पीड़ित थे.

कानों में फ़ुसफ़ुसाने वाले बुकसेलर

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Image caption केडी सिंह और उनकी पत्नी निनि सिंह, द बुक शॉप में

दुनिया में कितने बुकसेलर हैं, जो पाठक को इस तरह कोई ख़ास किताब ख़रीदने की सलाह देंगे, वह भी इस तर्क के साथ कि इस किताब को क्यों पढ़ा जाए. शायद इसके दो अपवाद हैं.

एक तो है लखनऊ में हज़रतगंज की मशहूर किताबों की दुकान राम आडवानी बुकसेलर्स के मालिक राम आडवानी. शायद यह दुनिया की उन गिनी-चुनी किताबों की दुकानों में है, जहां कथा साहित्य या लोकप्रिय साहित्य नहीं बेचा जाता.

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बहुत मुमकिन है कि आप किसी किताब के पन्ने पलट रहे हों और राम आडवानी चुपके से आपके पीछे आकर खड़े हो जाएं और फुसफुसाकर बोलें, "इंदिरा गांधी पर किताब ढ़ूंढ़ रहे हैं, तो ख़्वाजा अहमद अब्बास की दैट वूमेन पढ़िए."

कुछ इसी तरह के व्यवहार की उम्मीद आप लंदन की मशहूर बुकशॉप चेन ‘डिलंस’ में कर सकते थे जहां के बारे में मशहूर था कि वहां के सेल्समेन हर तरह की किताब चुनने में आपकी मदद किया करते थे.

खुशवंत सिंह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि जब नेहरू लंदन आया करते थे, तो वहीं से अपनी किताबें ख़रीदते थे.

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की भी वह पसंदीदा किताब की दुकान हुआ करती थी. अब तो डिलंस को वॉटरस्टोन्स ने खरीद लिया है..और अब वहां पहले जैसी बात नहीं रही.

'संभवतः सबसे ख़ुशुनमा बुक स्टोर'

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पहले कंवरजीत सिंह ढींगरा की किताबों की दो दुकानें हुआ करती थीं. एक ख़ान मार्केट में और दूसरी जोरबाग़ में. दिल्ली के पुस्तक प्रेमियों की एक पूरी पीढ़ी ने इन दोनों दुकानों से किताबें ख़रीदने का आनंद उठाया है.

उन्होंने 1970 में खान मार्केट में दुकान खोली थी. बाद में सिर्फ़ जोरबाग़ वाली बुक सेलर्स रह गई थी क्योंकि ख़ान मार्केट वाली दुकान की मालिक मेनका गांधी ने उसका किराया बढ़ा दिया था.

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उनकी दुकान इतनी मशहूर थी कि दुनिया के बड़े से बड़े लेखक और साहित्यकार यहां से किताबें ख़रीदने आया करते थे.

एक बार मशहूर लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान किताबें खरीदने आए थे. न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस दुकान को दुनिया का ‘संभवत: सबसे ख़ुशनुमा बुक स्टोर’ बताया था.

बहुत कम लोगों को पता है कि कंवरजीत को बिलियर्ड्स खेलने का बहुत शौक था और वह रोज़ अपना शौक पूरा करने स्पोर्ट्स क्लब ऑफ़ इंडिया जाया करते थे.

अपने जीवन के आखिरी दिनों में ट्वीड कोट पहने कंवरजीत अपनी ‘बुकशॉप’ के बाहर बैठे धूप सेक रहे होते थे और उनकी जेब में उनकी पगड़ी से मैच करता हुआ रुमाल हुआ करता था.

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