कश्मीरी छात्रों का भविष्य अब भी अधर में

ठ, निजी विश्वविद्यालय, स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ के एक निजी विश्वविद्यालय ने निलंबित किए गए 67 कश्मीरी छात्रों में से 57 का निलंबन वापस ले लिया है. जबकि बाकी 10 छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन ने वापस नहीं बुलाया.

मार्च में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के दौरान विश्वविद्यालय के 67 कश्मीरी छात्रों को कथित तौर पर पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने और हॉस्टल की संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने के आरोप में निलंबित किया गया था.

जब कश्मीरी छात्रों ने इस बारे में स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय से संपर्क किया तो उनको माइग्रेशन सर्टिफ़िकेट देने की बात कही गई.

हालांकि इन 10 छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई है. लेकिन बाकी छात्रों की तरह उनको माफ़ नहीं किया गया.

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छात्रों का निलंबन

बीबीसी ने स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर मंज़ूर अहमद से पूछा कि उन्होंने बाकी 10 छात्रों के निलंबन का फ़ैसला वापस क्यों नहीं लिया?

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "हमने 67 छात्रों को अगले आदेश तक के लिए निलंबित किया था. इस घटना की जांच के बाद हमने पाया कि दस छात्र इसमें शामिल थे. हमने 57 बच्चों को वापस बुला लिया और निलंबन हटा लिया. वे वापस आने के बाद क्लास जा रहे हैं और अपने हॉस्टल चले गए हैं."

बाकी 10 छात्रों के बारे में मंज़ूर अहमद कहते हैं, "जो दस छात्र नहीं बुलाए गए, वे जानते थे उनकों क्यों नहीं बुलाया गया है. मुझे उनको बताने की ज़रूरत नहीं है. ऐसे छात्रों ने कॉलेज आकर माइग्रेशन की मांग की. हमने इन छात्रों को परीक्षा की अनुमति दे दी ताकि उनका एक साल ख़राब न हो."

उन्होंने जांच समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा, "जो आदमी शरारत करेगा, यूनिवर्सिटी का हक़ है उनको निकाल देने का. हम तो निकाल भी नहीं रहे हैं, वो खुद ही माइग्रेशन माँग रहे हैं. ये सभी छात्र पहले या दूसरे साल में पढ़ रहे हैं."

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अधर में भविष्य?

अभी तो इन 10 छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई है. पहले या दूसरे साल की पढ़ाई करने वाले छात्रों को दाखिले में काफ़ी दिक्कत होती है. इस बारे में मंज़ूर अहमद ने कहा, "आराम से दाखिला हो जाता है. तमाम जगहें खाली रहती हैं. कोई दिक्कत नहीं है."

फ़ैसले की कठोरता के बारे में कुलपति मंज़ूर अहमद कहते हैं, "यहां उस जमाने में बड़ा टेंशन था. यह फ़ैसला कतई कठोर नहीं है. विश्वविद्यालय बराबर छात्रों को निलंबित करते रहते हैं, कोई ऐसी बात नहीं है. आप दो महीने बाद बात करेंगे तो सबका कहीं न कहीं दाखिला हो जाएगा."

आपने माफ़ी देने की क्यों नहीं सोची? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "बाकियों को तो माफ़ कर दिया था. इन्होंने बताया नहीं. बाकी छात्रों को हमने कोई सज़ा नहीं दी, केवल डांट-डपट कर मामला ख़त्म कर दिया. सज़ा उनको मिली जो उस घटना में वाक़ई शामिल थे. सौभाग्य से समिति के अध्यक्ष एक वरिष्ठ कश्मीरी प्रोफ़ेसर थे."

मार्च में मामला सामने आने पर भारत प्रशासित कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने ट्वीट किया था, "कश्मीरी छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला एक अस्वीकार्य और कड़ी सज़ा है जो उनका भविष्य ख़त्म कर देगा और उन्हें विमुख कर देगा."

इन छात्रों पर से देशद्रोह का मामला तो वापस ले लिया गया था. लेकिन सभी कश्मीरी छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन ने निलंबित कर दिया था.

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