जब नेहरू ने कार्टूनिस्ट से कहा, 'मुझे भी न बख़्शें...'

Nayantara Sahgal

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति के बारे में उनकी भांजी और लेखिका नयनतारा सहगल का कहना है कि ये अपने आप में ‘अजीब’ थी, क्योंकि उस वक्त अमरीका और रूस पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांट लेना चाहते थे, लेकिन भारत ने अपना अलग ही रास्ता चुना.

नयनतारा सहगल ने बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में पंडित नेहरू के व्यक्तित्व और उनके जीवन से जुड़ी कुछ ख़ास बातें बताईं. पेश हैं बातचीत के कुछ मुख्य अंश –

आपका बचपन एक ऐसे दौर में बीता, जब भारत आज़ादी के लिए लड़ रहा था, आपके माता-पिता और मामा पंडित नेहरू समेत तमाम बड़े नेता स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे. कैसा था उस दौर में बड़ा होना, ख़ासकर ऐसे परिवार में जो संग्राम का नेतृत्व भी कर रहा था?

अब मैं क्या बताऊं उन दिनों के बारें में. हमारी पढ़ाई बराबर नहीं चल पाई, क्योंकि जब भी राजनीतिक स्थिति ख़राब होती थी तो हमारे स्कूल बदल दिए जाते थे. कुछ ऐसा ही हमारे ज़िंदगी में भी रहा.

घर पर भी हमें पता नही होता था कि कल कैसा दिन रहेगा. आप कह रहे थे ना कि जिन परिवारों से इतिहास बनता है, तो वो बात तो ठीक है, लेकिन उन घरों के बच्चों के लिए ये काफ़ी मुश्किल हो जाता है.

हमारे लिए वक़्त मुश्किल इसलिए था कि हमारे मां-बाप और मामू जेल जाते रहे थे और हम कई वर्षों तक उनसे मिल नहीं पाते थे. काफ़ी कठिन था, लेकिन उनकी विचारधारा का हम पर भी बहुत प्रभाव पड़ा.

सबसे बड़ा विचार ये था, कि जिस विचारधारा पर आधुनिक भारत क़ायम हुआ है कि हिंदुस्तान अनेक धर्मों, अनेक जातियों और अनेक संप्रदायों से जुड़ा हुआ है और हम सिर्फ़ एक हिंदू राष्ट्र नहीं हैं.

आज भारत की जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, बड़े-बड़े चुनाव होते हैं, सरकार चुनी जाती हैं.. इसकी नींव जब रखी जा रही थी, तो ज़ाहिर तौर पर आपने भी इसे क़रीब से देखा था. क्या यादें है उस वक्त की?

सबसे पहले हिंदुस्तान ने ये फ़ैसला लिया कि हम शुरू से एक लोकतंत्र बनाएंगे, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाएंगे. दुनिया में किसी मुल्क ने ऐसा नहीं किया था.

पहले मुल्क विकसित हुए और उसके बाद जाकर उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित की. सबसे पहले हमारे देश ने कहा कि हर आदमी एक समान है और देश के हर एक व्यक्ति को सरकार चुनने का हक़ है.

ये काफ़ी ज़ोर से शुरू हुआ और फिर चलता ही रहा. ये बड़ी अजीब बात रही कि पहले चुनाव के बाद किसी ने ये नहीं कहा कि ये बदलना चाहिए या ऐसा सुधार होना चाहिए. सब चलता ही रहा और हर एक चुनाव के साथ ये व्यवस्था और मज़बूत होती गई.

नेहरू जी की विदेशी नीति काफ़ी क्रांतिकारी मानी जाती थी. हालांकि चीन से संबंधों को लेकर उनकी काफ़ी आलोचना भी होती रही. कैसी प्रतिक्रिया मिलती थी उन्हें देश-विदेश में?

उनकी विदेश नीति बहुत अजीब थी. अमरीका और रूस के बीच उन दिनों शीत युद्ध चल रहा था और दोनों ही कोशिश कर रहे थे कि दुनिया को आपस में बांट लें. नेहरू की समझ थी कि हम ऐसा नहीं चाहते हैं और अपना फ़ैसला ख़ुद करना चाहते हैं.

उपनिवेशवाद से आज़ाद हो रहे नए देशों ने भी जब देखा कि एक ऐसा गुट निरपेक्ष आंदोलन (नॉन अलाइंड मूवमेंट) चल रहा है तो वो भी इससे जुड़ गए. तो एक तीसरा रास्ता बन गया, जिसमें ज़्यादातर देश शामिल हुए. हालांकि पाकिस्तान जैसे कुछ अपवाद भी थे, जिन्होंने अमरीका का साथ दिया. बाद में ये एक बड़ा अभियान बन गया.

गुट निरपेक्ष देशों की आवाज़ इतिहास में पहली बार संयुक्त राष्ट्र की बैठक में सुनी गई, उन्होंने अपने फ़ैसले खुद लिए. इस तरह से ‘वेस्ट इज़ द वर्ल्ड’ यानी 'पश्चिमी देश ही दुनिया हैं' की सोच ख़त्म हो गई.

पंडित नेहरू एक बड़े नेता होने के साथ एक लेखक भी थे, आपने भी लेखन को ही अपना करियर चुना, क्या इसके लिए आपके मामू ने प्रोत्साहित किया था?

उनका प्रभाव तो रहा ही है, वो तो जीवन भर रहा है. जब शुरू-शुरू में वो लिख रहे थे, उन दिनों हमारी बातें-मुद्दे पश्चिमी लेखकों की कलम से अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंच रहे थे. तो जब नेहरू ने अपनी पहली क़िताब लिखी तो ये एक विरोध की तरह था कि 'मेरी तरफ़ देखो, हमारे विचार सुनो, मैं भी हूं यहां'. उन्होंने जो इतिहास पर क़िताब लिखी, उसे अपनी सोच के लिखी.

जब मैंने लिखना शुरू किया तब तक ये बात नहीं रही थी लेकिन फिर भी भारत की साहित्यिक किताबें विदेशों में नहीं पहुंच पाती थीं. मेरा नॉवेल शायद पहला थी जो विदेशों तक पहुंचा.

जहां तक लिखने को करियर बनाने का सवाल है तो उन्होंने ही मुझसे कहा कि अगर तुम्हें सक्रिय राजनीति में नहीं आना है तो मत आओ. बिल्कुल वही करो, जो करना चाहती हो, जिसका तुम्हें शौक है, लिखो. हालांकि मेरे लेखन में उनका कोई ख़ास प्रभाव नहीं था

नेहरू उस समय युवाओं के बीच ख़ासे लोकप्रिय थे, इसका क्या कारण लगता है आपको?

युवा तो हमेशा क्रांति से जुड़े रहे हैं. जो व्यक्ति उठ कर कहे कि 'मुझे ये बात मंज़ूर नहीं है और मैं इसे ख़िलाफ़ लड़ूंगा', तो ये बात युवाओं को पसंद आती है. और नेहरू जी ऐसे ही थे.

हमें याद रखना चाहिए कि उन दिनों हुकूमत के विरोध की सज़ा होती थी जेल, निर्वासन या मौत, तो जिन लोगों ने भी ये रास्ता चुना वो बहुत बहादुर थे. ऐसे लोग युवाओं के लिए उदाहरण हो जाते हैं.

पंडित नेहरू के व्यक्तित्व की अगर बात करें... तो वो निजी जीवन में कैसे थे... क्या उन्हें हंसी मज़ाक पसंद था, उनके गुलाब की बहुत चर्चा थी, किस तरह का फैशन पसंद करते थे वो?

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फ़ैशन उस व्यक्ति के जीवन में कैसे आए, जो अपना आधा जीवन जेल में बिता दे. हां, ये ज़रूर है कि वो हमेशा शेरवानी पहनते थे और उसके ऊपर के बटन-होल में गुलाब का फूल लगा होता था. उनका व्यक्तित्व ही इस बात से मशहूर था.

खेल उन्हें बहुत पसंद थे. वो तैरते थे, घुड़सवारी करते थे, यूरोप में स्की कर चुके थे. तो कई मामलों में वो ख़तरे पसंद करने वाले व्यक्ति थे.

देश का नेता होने के नाते उन्हें कभी तारीफ़ तो कभी आलोचनाएं भी झेलनी पड़ती होंगी. आलोचकों से कैसा बर्ताव था उनका?

वो चाहते थे कि ये बात रहे. वो इसे बहुत ज़रूरी समझते थे कि लोगों को अपने ख़्याल प्रकट करने में कोई बाधा न पहुंचे. लोकतंत्र के यही मायने है कि हर कोई अपना पक्ष बता सके, उसे कोई रोके नहीं. उन्हें अपनी आलोचना पसंद थी.

वो समझते थे कि स्वतंत्रता के मायने ही ये हैं कि हर प्रकार के ख़्यालात लोग प्रकट कर सकें.

एक क़िस्सा हमने भी सुना है जाने माने कार्टूनिस्ट शंकर के कॉलम के उद्घाटन का...क्या हुआ था उस वक्त?

उन्होंने मामू (जवाहर लाल नेहरू) से आग्रह किया कि वो उनके कार्टून कॉलम का उद्घाटन करें, तो मामू ने कहा कि वो ज़रूर करेंगे, लेकिन एक शर्त पर कि वो उन्हें भी न बख़्शें और उनके भी कार्टून बनाएं.

मज़ाक के लहज़े में कही गई ये एक गंभीर बात थी.

नेहरू जी को साहित्य का भी शौक था. शायद आख़िरी समय में भी उनके पास रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक किताब थी. तो इन सब के लिए अपने व्यस्त दिनचर्या से कैसे वक़्त निकाल पाते थे वो?

इस बात का उन्हें बहुत रंज था कि उन्हें समय नहीं मिलता था पढ़ने के लिए. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन वक्त ही नहीं मिलता था. और हां ये बात सही है कि उनकी मृत्यु के वक़्त उनके पास रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक किताब थी जिसकी लिखी कविता कुछ इस प्रकार से थी –

“The woods are lovely dark and deep, but I have promises to keep and miles to go before I sleep and miles to go before I sleep.”

उन्हें अंत तक ये महसूस होता था कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है, जितना वो कर सकते थे, उन्होंने किया लेकिन फिर भी बहुत कुछ रह गया है.

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