नेहरू के निधन पर जब खाने के पड़ गए लाले!

दिल्ली में नेहरू की अंतिम यात्रा इमेज कॉपीरइट Nehru Memorial Museum and Library

नारायण दत्त शर्मा रिटायर पत्रकार हैं जो इन दिनों भोपाल में रह रहे हैं. जिस दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौत हुई, वे इलाहाबाद में थे. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए उनसे बात की रोहित घोष ने और पूछा कैसा था वो दिन.

मैं 1964 में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, में अंतिम वर्ष का छात्र था. मेरे एक मित्र बजरंग देव द्विवेदी को इलाहाबाद में कुछ काम था. वो मेरे साथ हॉस्टल में ही रहता था.

उन दिनों वाराणसी और इलाहाबाद के बीच छोटी लाइन की ट्रेन चलती थी. रात को 10.30 बजे बैठिए और तड़के पांच-साढ़े पांच बजे इलाहाबाद पहुँच जाइए. व्यवस्था काफ़ी सुविधाजनक थी. समय बदल चुका है - अब वो लाइन चौड़ी हो गई है और समय भी बहुत कम लगता है.

तो 26, मई, 1964 की रात हम दोनों ट्रेन में सवार हो गए. सुबह इलाहाबाद पहुँच कर हमने रेलवे स्टेशन के पास के लॉज में एक कमरा किराए पर लिया. क़रीब 9 बजे हल्का नाश्ता कर के हम लोग निकल पड़े.

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मेरे मित्र का जो काम था वो दोपहर एक बजे के आसपास पूरा हो गया और अब हम लोग दिन भर के लिए खाली थे.

हम लोगों ने बीयर पीने की सोची. उन दिनों इलाहाबाद में बार तो होते थे नहीं. तो हम लोग बीयर ख़रीद कर अपने लॉज के कमरे में वापस आ गए. हमने तय किया था कि बीयर पीने के बाद खाना खाने निकलेंगे.

सड़कें खाली

बीयर पीकर हम लोगों की भूख़ बढ़ गई और सोचा किसी होटल में जाकर जम के खाना खाएंगे.

पर जैसे ही हम लोग लॉज से बाहर निकले तो देखा एक के बाद के दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिर रहे थे.

पूछने पर पता चला की दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू की मौत हो गई है.

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सड़कों पर लोग कम होने लगे और चंद मिनटों में सड़कें एक दम खाली हो गईं. बाज़ारों और मोहल्लों में सन्नाटा छा गया. हमने अपने चारों तरफ़ घूम के देखा तो एक व्यक्ति भी नज़र नहीं आ रहा था.

होटल में खाना तो दूर लइया-चना खाकर पेट भरने का सवाल भी नहीं था. लइया चना बेचने वाले ठेले भी सड़क से ग़ायब हो चुके थे.

इहालाबाद का दबदबा

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Image caption नेहरू का जन्म इलाहाबाद में हुआ था

इलाहाबाद में कोई जान पहचान वाला था नहीं कि उसके घर जाकर खाना खा लेते. और होता भी तो कैसे जाते - सड़क पर एक भी वाहन नहीं था.

अचानक मुझे याद आया की मेरे एक जानने वाला, जो इलाहाबाद में रहता था और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढता था, उसका चयन आईएएस में हो गया है. उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का आईएएस परीक्षा में ख़ूब दबदबा हुआ करता था.

हम लोगों ने उसके घर जाने की सोची - पर कैसे जाते न उसका पता था न कोई गाडी. हम लोग इतने विवश थे कि किसी भी तरह से उसका घर ढूंढने का फ़ैसला किया. एक ही तरीक़ा था - इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाकर उसका पता लगाते.

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तो हम दोनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लिए निकल पड़े.

ऊपर चिलचिलाती धूप और नीचे तपती सड़क और उस पर केवल दो प्राणी जिनका भूख और प्यास से हाल निढाल हो रहा था. कपड़े पसीने से तर-बतर थे.

दिक़्क़त

जैसे तैसे हम लोग यूनिवर्सिटी कैंपस पहुंचे. उसका पता भी मिला. पर फिर से पैदल चलने की मशक्कत. ख़ैर, और कोई चारा था नहीं. तो हम लोग उसका घर ढूंढने निकल पड़े.

उसका घर कहाँ पर था, ये याद नहीं पर ढूंढने में बहुत दिक़्क़त हुई थी. पहुँचने में शाम हो गई. उसे परीक्षा पास करने की बधाई दी और वो अंदर से एक प्लेट में लड्डू ले कर आया.

हम लोगों ने फ़ौरन एक-एक लड्डू खा लिया, एक लड्डू खा कर थोड़ी जान आई. हमने उन लड्डूओं की ख़ूब तारीफ़ की, यही सोच कर कि वह कहेगा की एक और लीजिए. उसने ऐसा ही कहा. हम लोगों तुरंत ने एक-एक और लड्डू खा लिया.

भूख तो मिटी थी नहीं पर तीसरा लड्डू खाने की गुंजाइश बहुत कम थी. तो हम लोगों ने फिर उसको बधाई दी और उसके घर से निकल पड़े.

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