भाजपा ने कैसे जीता उत्तर प्रदेश?

बीजेपी समर्थक इमेज कॉपीरइट AP

इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के 282 लोकसभा सीटें जीतने में उत्तर प्रदेश के शानदार प्रदर्शन का महत्वपूर्ण योगदान है. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में 42.3 फ़ीसदी वोट के साथ 71 सीटें हासिल की हैं.

साल 1989 के लोकसभा चुनावों के बाद किसी भी पार्टी को प्रदेश में मिले यह सबसे ज़्यादा वोट हैं. सिर्फ़ 1984 के लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस 50.4 फ़ीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही थी.

मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा का सहयोगी अपना दल भी वह दोनों सीटें जीतने में कामयाब रहा जो उसने लड़ी थीं. 22.2 फ़ीसदी वोट के साथ समाजवादी पार्टी पांच सीटें जीतने में कामयाब रहीं. पार्टी की सभी पांच सीटें मुलायम सिंह यादव के परिवार को ही मिली हैं.

कांग्रेस को 7.5 फ़ीसदी वोट मिले और पार्टी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की सीटें जीतीं. बीएसपी का वोट प्रतिशत 19.6 फ़ीसदी रहा लेकिन उसे कोई भी सीट हासिल नहीं हुई.

भाजपा की जीत इतनी बड़ी थी कि भाजपा (और सहयोगी) का वोट शेयर 26 संसदीय सीटों में एसपी, बीएसपी और कांग्रेस के सम्मिलित वोट शेयर से भी ज़्यादा था. छह-सात संसदीय क्षेत्रों में इन तीनों मुख्य पार्टियों का वोट शेयर भाजपा को मिले वोट से थोड़ा ही ज़्यादा था.

सीधे शब्दों में कहें तो अगर तीनों दलों ने गठबंधन करके भाजपा के ख़िलाफ़ संयुक्त उम्मीदवार उतारे होते तो भी भाजपा आसानी से 30 लोकसभा सीटों पर जीत जाती.

राष्ट्रीय लोक दल क्यों हुआ साफ़?

उत्तर प्रदेश में भाजपा को सफलता मुख्य तौर पर ग्रामीण मतदाताओं में भाजपा लहर की वजह से मिली है. भाजपा पहले ग्रामीण मतदाताओं के मुक़ाबले शहरी मतदाताओं में ज़्यादा लोकप्रिय हुआ करती थी. इस चुनाव में भाजपा के समर्थकों में महत्वपूर्ण परिवर्तन नज़र आया है. पार्टी ग्रामीण वोटों को रिझाने में कामयाब रही है.

सच तो यह है कि पार्टी को ग्रामीण संसदीय क्षेत्रों में शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा वोट मिले हैं.

भारतीय जनता पार्टी 17.5 फ़ीसदी से 42.3 फ़ीसदी वोट शेयर हासिल करने में कामयाब इस वजह से हुई क्योंकि ऊंची जातियों के मतदाता बहुत तेज़ी से भाजपा के पक्ष में लामबंद हुए और अन्य पिछड़ी जातियों, बहुत हद तक निचली पिछड़ी जातियों में और ग़ैर जाटव दलितों में से दलित वोट इसकी ओर खिसके.

इन चुनावों में पहली बार वोट देने वाले वोटर (18-22 साल) बहुत निर्णायक रहे, जो पिछली बार तक कई दलों में बंटे रहते थे.

इन चुनावों में ऊंची जाति- ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कई अन्य ऊंची जातियों - के वोटरों का आज तक का सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण देखने को मिला. इन सभी जातियों में से 75 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया.

गठबंधन का फ़ायदा

अजित सिंह के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय लोकदल जाट मतदाताओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय रहा था. आरएलडी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था और जाट वोटों का ध्रुवीकरण होने की उम्मीद की थी लेकिन यह गठबंधन जाट-वोट पाने में भी नाकाम रहा. जाट वोट उल्लेखनीय संख्या में भाजपा गठबंधन की ओर चले गए.

सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के चुनाव बाद के सर्वेक्षणों से पता चला कि जाट मतदाताओं में से 77 फ़ीसदी ने भाजपा गठबंधन और सिर्फ़ 13 फ़ीसदी ने कांग्रेस-आरएलडी के पक्ष में वोट दिया.

इससे आरएलडी के ख़राब प्रदर्शन की वजहें साफ़ हो जाती हैं और यह भी कि जाट नेता अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी अपने गढ़ बागपत और मथुरा में बुरी तरह क्यों हारे.

इमेज कॉपीरइट PTI

हालांकि यादवों ने बड़ी संख्या (53 फ़ीसदी) में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को वोट दिया लेकिन भाजपा यादव वोटरों में भी सेंध लगाने में कामयाब रही और उसने इनके 27 फ़ीसदी वोट हासिल किए.

अपना दल का उत्तर प्रदेश में मज़बूत आधार नहीं है लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा को उससे गठबंधन का फ़ायदा मिला है, जो कुर्मियों में ख़ासतौर पर लोकप्रिय है. पिछड़ी जातियों में से कुर्मियों के 53 फ़ीसदी वोट अपना दल और भाजपा गठबंधन को गए.

सर्वे के अनुसार निचली ओबीसी जातियों के वोट खिसकने से भाजपा और इसके सहयोगी को उत्तर प्रदेश में भारी फ़ायदा हुआ है.

मुसलमान वोट

हालांकि जाटव वोट अब भी मायावती की बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में ही हैं क्योंकि 68 फ़ीसदी जाटवों ने बीएसपी को वोट दिया है. लेकिन भाजपा अन्य दलित वोटरों का विश्वास जीतने में कामयाब रही. अन्य दलित वोटरों में से 45 फ़ीसदी ने भाजपा को और 30 फ़ीसदी ने बहुजन समाज पार्टी को वोट दिया.

दलितों का अच्छा-ख़ासा वोट हासिल करने वाली कांग्रेस पूरी तरह दरकिनार हो गई और दलितों ने कांग्रेस और उसके सहयोगी आरएलडी को शायद ही वोट दिया.

कुछ लोगों को लग रहा है कि कई दलों में मुसलमान वोटों के बंट जाने से भाजपा के लिए इतनी सीटें जीतना संभव हो सका लेकिन इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में मुसलमानों ने 2009 के चुनावों से भी ज़्यादा एकजुट होकर समाजवादी पार्टी को वोट दिया है.

इन चुनावों में 58 फ़ीसदी मुसलमान वोटरों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया है जबकि साल 2009 में सिर्फ़ 30 फ़ीसदी ने ही उसे वोट दिया था.

लेकिन यादव और मुसलमान वोटो का एकजुट होना भी समाजवादी पार्टी को भाजपा के मुक़ाबले में खड़ा नहीं कर पाया क्योंकि अन्य सभी वोटर बहुत शिद्दत से भाजपा के पक्ष में लामबंद हुए.

आश्चर्यजनक रूप से मुसलमान मतदाताओं में से 10 फ़ीसदी ने भाजपा को वोट दिया, जो साल 2009 के मुक़ाबले 7 फ़ीसदी ज़्यादा है और इसने भी भाजपा की शानदार जीत में सहयोग दिया होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार