इशरत जहां केस: 'क्या सुशासन में इंसाफ़ मिलेगा?'

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इशरत जहां मुठभेड़ मामले में आरोपों से घिरे पुलिस अधिकारी जी एल सिंघल को गुजरात सरकार ने फिर से बहाल कर दिया है.

जी एल सिंघल पर एक विवादास्पद रिकॉर्डिंग करने का भी आरोप है. ये भी कहा जाता है कि उन्होंने गुजरात में एक महिला की जासूसी करने से जुड़ा एक अहम टेप भी सीबीआई को दिया था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) ने बुधवार शाम जानकारी दी कि जी एल सिंघल को बहाल कर दिया गया है और उन्हें गांधीनगर में राज्य रिज़र्व पुलिस में समूह कमांडेंट का पद भी दिया गया है.

बीबीसी ने इस मामले से जुड़ी वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर से पूछा कि वे क़ानूनी तौर पर इस फ़ैसले को कैसे देखती हैं.

वृंदा ग्रोवर ने कहा, "क़ानूनी तौर पर ये बहुत ही चौंका देने वाला फ़ैसला है. जी एल सिंघल इशरत जहां, जावेद शेख़ और दो अन्य लोगों के क़त्ल के मुक़दमे में आरोपी हैं. उन पर गुजरात की अदालत में सीबीआई धारा 302 की चार्जशीट दाख़िल कर चुकी है."

'परेशान करने वाली हरकत'

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उन्होंने कहा, "वे इस केस में एक मुख्य अभियुक्त हैं. इसलिए ऐसे पुलिसवाले को वापस लेना जिसके उपर एक क़त्ल का मुकदमा चालू होने वाला हो, ये बहुत ही परेशान करने वाली हरकत है."

लेकिन गुजरात सरकार के इस फ़ैसले के पीछे कोई तो वजह होगी?

इस सवाल के जवाब में वृंदा ग्रोवर ने कहा, "देखिए क़ानून में तो ऐसी कमजोरियां रहती ही हैं. लेकिन फ़ैसले करने वाले प्रशासनिक अधिकारी की ज़िम्मेदारी होती है ये देखना कि उसके इस कदम का असर क्या होगा."

उन्होंने कहा, "जिस समय इशरत जहां मुकदमे में जी एल सिंघल को गिरफ़्तार किया गया था, उस वक़्त ज़ाहिर तौर पर उन्हें सस्पेंड करना पड़ा था. क्योंकि वे करीब तीन महीने तक जेल में थे. उसके बाद जी एल सिंघल ने गुजरात पुलिस से इस्तीफ़ा दिया था. "

'खुला खेल'

वृंदा ग्रोवर का कहना है कि गुजरात सरकार ने ये इस्तीफ़ा कभी स्वीकार नहीं किया. उन्हें केवल 'निलंबन में' रखा गया. लगभग डेढ़-दो साल तक वे ऐसे ही थे.

वृंदा कहती हैं, "जी एल सिंघल काफ़ी समय से जेल से बाहर हैं. लेकिन उन्हें न तो कभी बहाल किया गया और न ही उन्हें वापस लिया गया."

उन्होंने कहा, "इस समय उन्हें वापस से बहाल करने का ताल्लुक एक और केस से है जो महिला की ज़ासूसी से जुड़ा है. इस समय जी एल सिंघल को सेवा में वापस लेने का सीधा संबंध है कि उनके सेवा में वापस आते ही कौन गवाह खड़ा होगा, कौन बोलेगा इन्क्वाइरी के सामने. बहुत खुला खेल खेला जा रहा है."

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वृंदा ग्रोवर इस मामले से हमेशा से जुड़ी रही हैं, ऐसे में बीबीसी ने जानना चाहा कि उनका अगला क़दम क्या होगा?

उन्होंने कहा "फ़िलहाल मैं कुछ काग़ज़ों का इंतज़ार कर रही हूं."

'न्याय बनेगा सुशासन का हिस्सा?'

वृंदा ग्रोवर का कहना है कि देश के लोगों को भी सोचना होगा कि नई सरकार ने हमें अच्छे शासन का जो वादा किया है क्या इंसाफ इस सुशासन का हिस्सा होगा.

उन्होंने कहा, "नई सरकार के दिल्ली में बागडोर संभालने के दो दिन के बाद अगर इस तरह की ख़बर आती है तो हमें कुछ कागज़ात देखने होंगे. बहुत से क़ानूनी क़दम हैं जो लिए जा सकते हैं, जो लिए जाएंगे. क्योंकि इस तरह के फ़ैसले भारतीय लोकतंत्र के लिए, जनता के लिए बहुत ख़तरनाक हैं."

इस मामले का एक सच ये भी है कि 90 दिनों में सीबीआई सिंघल के ख़िलाफ़ कोई चार्जशीट दायर नहीं कर पाई जिसकी वजह से उन्हें ये ज़मानत मिली.

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'पुलिस में जगह क्यों?'

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इस सवाल पर उन्होंने कहा, "ज़मानत मिलना तो एक बात है. जीएल सिंघल ने तो अपना इस्तीफ़ा तक दे दिया था फ़िर ऐसे व्यक्ति को क्यों पुलिस में रखा जा रहा है. पुलिस में वे जिस पद पर होंगे वो आपकी और हमारी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी की होगी. लेकिन क्या ऐसा व्यक्ति इस तरह की ज़िम्मेदारी के काबिल है."

उन्होंने कहा, "सवाल ये नहीं है कि उनके ऊपर 90 दिनों में चार्जशीट दायर की गई या नहीं लेकिन बात ये है कि क्या अगर ऐसे आदमी ने इस्तीफ़ा दिया है तो उनके इस्तीफ़े को तो तुरंत ही मंज़ूर कर उन्हें पुलिस से बाहर कर देना चाहिए था."

उनका ये भी मानना है कि अगर गुजरात सरकार ऐसे पुलिस अफ़सर को रख रही है तो इसके पीछे उसकी क्या दिलचस्पी है.

वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "देखिए इस देश में गवाहों को पकड़ने के केवल दो तरीके हैं या तो आप उनको डरा धमका दीजिए या उन्हें कोई और लोभ दे दीजिए. अब जी एल सिंघल मामले में तो सब कुछ इतने खुले में हो रहा है कि इसमें तो ज़्यादा सोचने-समझने की कोई बात ही नहीं."

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