सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं टिक सका अक्षरधाम केस?

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"जब इस तरह से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो तो हम हाथ बाँधे हुए बैठे नहीं रह सकते."

अक्षरधाम मामले पर 281 पन्नों के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सार इस एक लाइन में निकाला जा सकता है.

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सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसले में ये कहा है कि पोटा से जुड़े मामलों में सुनवाई करते वक़्त ये ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इस क़ानून को मानवाधिकारों के उल्लंघन और पुलिस को दी गई ताक़त के बेजा इस्तेमाल की वजह से ही ख़त्म किया गया था.

इस ऐतिहासिक फ़ैसले ने अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की जाँच और अभियोजन पक्ष की कहानी के तमाम सुराखों को सामने लाकर रख दिया है.

'गृह मंत्री ने विवेक से काम नहीं किया'

कोर्ट के मुताबिक़ अक्षरधाम मामले में तत्कालीन गृहमंत्री ने बिना पूरी तरह से सोचे समझे और जाने बगैर अभियुक्तों पर पोटा के तहत मुकदमा चलाए जाने की इजाज़त दी थी.

सरकार ये साबित करने में नाकाम रही कि पूरी जानकारी और जाँच अधिकारी से मशविरे के बाद सरकार ने ये फ़ैसला किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पोटा लगाए जाने की मंज़ूरी देना ही ग़ैरक़ानूनी था.

'इकबालिया बयान'

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कोर्ट के फ़ैसले में अभियुक्तों या जुर्म में साथ देने वाले लोगों के बयान दर्ज करने के तौर तरीक़ों पर भी सवाल उठाए गए हैं.

(मुसलमान किसके साथ?)

अभियुक्तों से 'इकबालिया बयान' के बाद जिस कागज पर दस्तखत लिए गए, उन्हें उसी दस्तावेज़ पर इसके अंजाम के बारे में भी बयान से पहले लिख कर बताया जाना चाहिए था.

पंद्रह पन्ने के बयान को पढ़कर सुनाने के लिए महज आधे घंटे का वक़्त दिया गया था. न तो सीजेएम ने और न ही बयान दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी ने क़ानूनों का ठीक से पालन किया.

अभियुक्तों को ये नहीं बताया गया कि वे कुछ कुबूल करने के लिए मजबूर नहीं हैं.

अभियुक्तों को सीजीएम के सामने गवाही के बाद न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की बजाय फिर से पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया. कोर्ट ने सीजेएम को असंवेदनशीलता के लिए भी फटकार लगाई है.

अभियुक्तों के 'साथियों' की गवाही

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इस मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने तीन ऐसे लोगों को बतौर गवाह पेश किया था जिन पर ख़ुद ही वारदात में शामिल होने के आरोप थे.

(देश के कानून के भरोसे...)

उनकी गवाही सुप्रीम कोर्ट का भरोसा नहीं जगा पाई. फ़ैसले में अदालत ने कहा, "तीनों की मंशा अक्षरधाम मंदिर पर हमले की साज़िश में अपनी ज़िम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की थी."

उनके मुताबिक़ केवल अभियुक्तों को ही बदले की योजना के हर पहलू के बारे में पता था. वे अभियुक्तों के बारे में कोई ठोस सबूत पेश कर पाने में भी नाकाम रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनकी गवाही संदेह पैदा करती है और वे अभियुक्तों के ख़िलाफ़ उनके इकबालिया बयान की आगे की कड़ी में क़ानूनी सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किए जा सकते हैं.

उर्दू में लिखी चिट्ठियाँ

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Image caption अभियुक्तों पर गुजरात दंगों का बदला लेने की साज़िश में शरीक होने का आरोप लगाया गया था.

अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले के दौरान मुठभेड़ में मारे गए दो फिदायीन हमलावरों की जेब से उर्दू में हाथ से लिखी दो चिट्ठियाँ बरामद हुई थी.

(मोदी काल में असहमति की आवाजें)

इन्हीं चिट्ठियों को अभियुक्तों के साजिश में शरीक होने के सबूत के तौर पर पेश किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने इसी खामी की ओर ध्यान दिलाया कि फिदायीन हमलावरों की लाशें ख़ून और मिट्टी से सनी हुई थीं लेकिन उन चिट्ठियों पर इसका कोई निशान तक नहीं था.

चिट्ठियों की लिखावट को लेकर पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा गया था. हस्ताक्षर विशेषज्ञ उर्दू, अरबी और फारसी ज़ुबानों में फ़र्क कर पाने की स्थिति में नहीं थे.

इन चिट्ठियों को अदालत ने सबूत मानने से इनकार कर दिया.

साजिश की कहानी

अभियोजन पक्ष का कहना था कि अक्षरधाम हमले की साज़िश सऊदी अरब में रची गई और हवाला के ज़रिए पैसा भारत भिजवाया गया.

पकड़े गए अभियुक्तों पर इसी साज़िश में शामिल होने का आरोप लगाया गया था.

(अक्षरधाम मामले में गिरफ्तारी)

लेकिन अदालत के सामने पेश किए गए उनके इकबालिया बयानों में कई खामियाँ थीं और वे वारदात की अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे थे.

हर अभियुक्त ने ये कहा कि उसे साज़िश की पूरी जानकारी थी लेकिन उसके बयान दूसरे अभियुक्त के बयान से मेल नहीं खाते थे.

अहमदाबाद क्राइम ब्रांच

भले ही क्राइम ब्रांच ने जाँच की ज़िम्मेदारी मिलते ही 24 घंटे के भीतर मामले को सुलझा लेने का दावा किया हो लेकिन उसकी कहानी सुप्रीम कोर्ट में हर मोड़ पर आकर कमज़ोर पड़ गई.

मुकदमे का पूरा दारोमदार अभियुक्तों के बयान, उनके कथित 'साथियों' की गवाही और फिदायीन हमलावरों की लाश से कथित तौर पर बरामद की गई उर्दू में लिखी दो चिट्ठियों पर था.

एक भी स्वतंत्र गवाह या सबूत पेश नहीं किया गया जिससे अभियुक्तों का अपराध साबित होता हो.

अभियुक्त मुकदमे के दौरान अपने इकबालिया बयान से ये कहते हुए पलट गए कि उन पर इसके लिए दबाव डाला गया था.

जाँच एजेंसियों की अकर्मण्यता

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Image caption क्राइम ब्रांच की ओर से सिंघल ने अक्षरधाम मामले के जाँच की थी.

अभियोजन पक्ष सुप्रीम कोर्ट को ये भी समझाने में नाकाम रहा कि अभियुक्त एक जैसी मंशा या एक ही इरादे से इस साज़िश में शामिल हुए थे.

इन छह अभियुक्तों में से अदमभाई अजमेरी, अब्दुल कयूम मुफ्ती साब मोहम्मद भाई और चाँद ख़ान को मौत की सज़ा सुनाई गई थी.

मोहम्मद सलीम हनीफ शेख को उम्र कैद और अब्दुल मियां यासीन मियां को दस साल की क़ैद की सज़ा दी गई थी.

इसी मामले के एक अभियुक्त अल्ताफ मलिक सुप्रीम कोर्ट में अपील में नहीं गए थे लेकिन इसके बावजूद उनकी सज़ा ख़ारिज की गई. हालांकि वे पाँच साल की सज़ा पूरी कर चुके थे.

सुप्रीम कोर्ट ने जाँच एजेंसियों की अकर्मण्यता पर नाराजगी ज़ाहिर की है. कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने कसूरवार लोगों को पकड़ने की बजाय निर्दोष लोगों को गंभीर मामलों में फंसाया.

(यह आलेख सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आधारित है.)

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