ऑपरेशन ब्लू स्टारः ज़ख़्मों को मत कुरेदो

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ये बात है जून 2004 की....

जब मैं चंडीगढ़ से जुड़े शहर मोहाली के एक गर्ल्स हॉस्टलनुमा स्कूल में गया तो ऑपरेशन ब्लू स्टार को हवाएँ बीस बरस पीछे फेंक चुकी थीं.

इस हॉस्टलनुमा स्कूल में वे बच्चियां पल, बढ़ और पढ़ रहीं हैं जो सरकारी खातों में ख़ालिस्तानी दहशतगर्दों की औलाद और सिख समाज में शहीदों की बच्चियों के तौर पर जानी जाती हैं.

इनमें से दो बच्चियां अक्सर बात करते-करते आँसू पीने की कोशिश में रुक-रुक जाती थीं.

आज जून 2009 शुरू होने वाला है. हवाओं ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को और पांच बरस पीछे फेंक दिया है.

किन परिस्थितियों में हुआ ऑपरेशन ब्लूस्टार..

इस दफ़ा मैं मोहाली ना जा सका. मगर मुझे यक़ीन है कि वे दो बच्चियां जिनके नाम इस वक़्त मुझे याद नहीं आ रहे, अब अपने बच्चों के साथ किसी पुरसुकून से घर में बैठी हँस खेल रही होंगी. क्योंकि इन बच्चियों की वॉर्डन ने बताया था कि हम इन दोनों बच्चियों की अगले पांच छह महीने में बड़ी अच्छी जगहों पर शादियां करवा रहे हैं.

आक्रोश और उम्मीदें

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Image caption स्वर्ण मंदिर के अंदर ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए लोगों की तस्वीरों का म्यूज़ियम.

इसी हॉस्टल में नन्हीं सी कृपाण गले में लटकाए 14-15 बरस की प्रीत कौर ने ग़ुस्से से अपने गाल लाल करते हुए बड़े जोश से बताया था, ''मैं अपने बापू के क़ातिलों को कभी नहीं भूलूंगी. मैंने शहद चखकर, क़सम खाकर ये कृपाण लटकाई है और ये तब भी मेरे गले से नहीं उतरेगी जब मैं डॉक्टर बन जाऊँगी...''

मुझे यक़ीन है कि अब वो ग़ुस्से से जूझती नाज़ुक सी बच्ची या तो डॉक्टर बन चुकी होंगी या फिर बनने वाली होंगी.

मुझे यक़ीन है कि दोनों ही सूरतों में अब प्रीत कौर के गले में लटकी नन्हीं-मुन्नी सी कृपाण स्टेथोस्कोप में बदल चुकी होगी.

बतौर पत्रकार, जो कुछ मैंने देखा...

मौंटी सिंह परवाना इस वक़्त दिल्ली के ख़ान मार्केट के क़रीब रेन्ट-ए-कार के काउंटर पर बैठते हैं. मौंटी आज 25 बरस बाद भी बड़े जोश से क़सम खाकर बताते हैं कि उनके पिता का संत जरनैल के जत्थे या सियासत से न लेना एक था न देना दो.

वो तीन जून को गोल्डन टेम्पल में सैकड़ों दूसरे यात्रियों की तरह फ़ौज के घेरे में फँस गए थे और फिर सैंकड़ों लाशों में उनकी लाश भी शामिल हो गई.

ज़ख़्मों के निशान

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मौंटी सिंह कहते हैं, ''उस वक़्त मैं साढ़े छह बरस का था. मुझे याद है कि जब पिता की मौत की पुष्टि हो गई तो माँ ने मुझे पल्लू में छुपाकर ज़ोर से भींच लिया था. वो दिल्ली आना चाहती थीं मेरे मामा के पास. मगर बात टलती गई. अच्छा ही हुआ. वरना हम भी उस दिन दिल्ली में होते जिस दिन इंदिरा गाँधी को दो सरदारों ने मारा था...आज मेरे दोनों बच्चे अपने दादा को मुझसे ज़्यादा जानते हैं.''

मौंटी बताते हैं, ''वाहे गुरू की कृपा से धंधा भी अच्छा चल रहा है.... बस कभी-कभी बड़े ज़ोर से हौल उठता है कि ये सब न होता तो कितना अच्छा था.''

ब्लूस्टार: पूर्व जत्थेदार वेदांती के अनुभव

वो कहते हैं, ''पर अच्छी बात ये है कि ज़ख़्म चाहे कैसा ही हो, निशान आ ही जाता है... कुछ लोग अपने ज़ख़्मों का निशान बार-बार खुरच लेते हैं. पर हम सिख ऐसा नहीं करते..आगे बढ़ जाना ही ठीक है... निशान से ज़्यादा छेड़-छाड़ अच्छी नहीं होती...तकलीफ़ लंबी हो जाती है...''

मौंटी मुझसे मुख़ातिब हैं. कहते हैं, ''आप सुनाओ... आपको फ़ुल-डे के लिए गाड़ी चाहिए या हाफ़-डे के लिए...कब तक हो यहां...पाकिस्तान कब जाओगे...अब तो आपके देश में भी ऑपरेशन ब्लू स्टार वाला गोल्डन टेम्पल बन गया है....है कि नहीं.''

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