जातीय और लैंगिक हिंसा पर आख़िर कब तक रहेगा पर्दा?

  • 14 जून 2014
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जब मैं उत्तर प्रदेश में बदायूं के एक छोटे से गांव में दो चचेरी बहनों के बलात्कर और उसके बाद उन्हें पेड़ से लटकाए जाने के बारे में सोचती हूं, तो एक बात मुझे बहुत कचोटती है.

वो बात ये कि क्या इनकी मौतों को रोका नहीं जा सकता था.

ये दोनों चचेरी बहनें पिछड़ी जाति की थीं. इसीलिए वो कहीं ज़्यादा प्रभावशाली यादव जाति के उन पुरूषों का निशाना बनीं जिन पर उनके बलात्कार और हत्या के आरोप हैं.

ये लड़कियां देर रात शौच के लिए बाहर गई थीं. जिन जगहों पर घर में शौचालय नहीं होते, वहां महिलाएं आम तौर पर अंधेरे में ही शौच के बाहर जाती हैं.

वैसे भारत में शहर के मॉल में फ़िल्म देखने जाने से लेकर एक छोटे से कस्बे में साबुन ख़रीदने जैसे साधारण से कामों के लिए बाहर जाना भी महिलाओं के लिए ख़तरा समझा जा सकता है.

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब लड़कियां वापस नहीं लौटीं तो इनमें से एक के पिता ने पुलिस को अपने ग़ायब बच्चों के बारे में जानकारी दी. ड्यूटी पर मौजूद कॉन्स्टेबल ने उन्हें थप्पड़ जड़ दिया और भगा दिया. यह ऐसी बातें हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता है.

'अकेली घटना नहीं'

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यदि यह पिता निचली जाति से न होता, यदि पुलिस ने लड़कियों की तलाश की होती तो उन्हें पेड़ से लटकाए जाने से पहले उन्हें तलाशा जा सकता था.

बदायूं में हुई हत्याओं को लेकर मीडिया का उन्मांद और जनता के गुस्से की वजह से भारत में लैंगिक और जातीय हिंसा फिर से रिपोर्टिंग का हिस्सा बनने लगे हैं.

बदायूं में बर्बर तरीके से हत्या की यह भयानक घटना कोई अकेली घटना नहीं है. ना ही निचली जातियों या आदिवासी लोगों की हत्या और उनके ख़िलाफ़ ऊंची जाति के लोगों के अत्याचार पिछले चार महीनों से बंद हुए हैं.

इससे पहले ज़िंदा जलाने, बलात्कार और जाति की वजह से पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले हमले, घरेलू हिंसा के मामले और दहेज हत्याओं की पूरी फेहरिस्त दिखी थी.

लेकिन मीडिया का ध्यान चुनाव पर था. ऐसे में लगातार होने वाली ऐसी घटनाओं और लैंगिक हिंसा मुख्य रूप बलात्कार की विचलित कर देने वाली ख़बरों का प्रवाह बंद हो गया था.

जिस तरह 1980 के दशक में दहेज को लेकर होने वाली हत्याओं ने सबको परेशान कर दिया था, उसी तरह ये दशक बलात्कार और ख़ास कर शहरी और ग्रामीण भारत में होने वाले सामूहिक बलात्कारों की वजह से पहचान पा रहा है.

बदायूं में की घटना में जिस तरह अपराध की बुनियाद जाति, ग़रीबी और बलात्कार दिखते हैं, उसके चलते इसकी गूँज ऐसे अन्य अपराधों के मुक़ाबले ज़्यादा लंबे दौर तक सुनाई देगी.

कमज़ोर तबके, आसान शिकार

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जो समुदाय कमज़ोर समझे जाते हैं, अकसर वे हिंसा और हमलों के आसान शिकार होते हैं.

लेकिन बदायूं की घटना ने दो ऐसे कारकों को उजागर कर दिया है जो इस तरह के अत्याचार में एक जैसे पाए जाते हैं; समय रहते कमज़ोर जातियों के पीड़ितों की जान बचाने में प्रभावशाली जातियों के पुलिस अधिकारियों का इनकार और असहिष्णु सरकार और नागरिक समाज की ओर से कार्रवाई के लिए दबाव डालने की स्थानीय समुदायों की दृढ़ता.

बदायूं में ग्रामीण उस आम के पेड़ के चारों ओर एक मजबूत घेरा बनाकर बैठ गए थे. उन्होंने लड़कियों के शवों को तब तक उतारने नहीं दिया जब तक प्रशासन और मीडिया ने इस ओर अपना ध्यान नहीं दिया.

आज, उन लड़कियों के परिजनों को धमकियां मिल रही हैं और इन हत्याओं को उन्हीं के सिर मढ़ने की बेहद बेढंगे तरीके से अफवाहें उड़ाने की कोशिशें हो रही हैं.

इसी तरह की चीजें बड़े शहरों में बलात्कार की घटनाओं में भी होती हैं: अभियुक्त को बेकसूर ठहारने की मंशा और लड़की के परिजनों पर उनकी हत्या का आरोप मढ़ना.

कमज़ोर माने जाने वाले समुदायों के लिए न्याय की क़ीमत ज़्यादा होती है: उन्हें अकसर ही धमकी और हिंसा का सामना करना पड़ता है.

हरियाणा भगाना के गांव में चार दलित महिलाओं के सामूहिक बलात्कार के बाद गांव से 80 परिवार पलायन कर गए और राजधानी दिल्ली में बलात्कार पीड़ितों के साथ अपनी कहानी बयान करने के लिए जमा हो गए.

लंबा इतिहास

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पिछले चार या पांच वर्षों में जातीय अत्याचार के लगभग हर मामले में एक ही जैसी प्रतिक्रिया आई: स्थानीय लोग हड़ताल या चक्का जाम करते हैं, अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए अपनी नौकरियों और मज़दूरी से भी महरूम हो जाते हैं, जो उनके लिए और भारी पड़ता है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के उस जवाब ने लोगों में आक्रोश पैदा किया जब उन्होंने बदायूं के मामले में एक महिला संवाददाता से कहा, ''आप पर तो नहीं ख़तरा है?''

उनकी टिप्पणी जितनी स्पष्ट थी, उतनी निंदनीय भी थी. वे भारतीय जिन पर सीधे कोई ख़तरा नहीं है और जाति के विशेषाधिकार, संपन्नता या सत्ता की वजह से वे सुरक्षित हैं, उनसे यह उम्मीद नहीं है कि वे उनके बारे में चिंता करें जो इन कवचों से महरूम हैं.

साम्प्रदायिक दंगों के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ जानबूझ कर की जाने वाली यौन हिंसा से इनकार किए जाने या इसे नज़रअंदाज करने को लेकर भारत का एक लंबा इतिहास है. इसी तरह पूरे देश में कमज़ोर जातियों के पुरूषों, महिलाओं और बच्चों को प्रताड़ित करने, फांसी पर लटकाने और उनकी हत्या करने का भी एक लंबा इतिहास है.

बदायूं में हुए अपराध का सबसे भयानक पक्ष है कि कितनी सामान्य तरीके से इसे बस जाति के आधार पर होने वाले अपराध का नाम दे दिया जाता है.

स्वीकार करना होगा

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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा का एक अलग श्रेणी में रिकॉर्ड रखता है.

इन अपराधों की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं होती, लेकिन इसके बावजूद ब्यूरो के 2012 के आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष 651 मामले हत्या के, विवादों में घायल होने वाले लोगों के 3,855 मामले, बलात्कार 1,576 मामले, अपहरण के 490 मामले और आगजनी के 214 मामले सामने आए.

हिंसा कितनी व्यापक हो चुकी है और जाति और लैंगिक लड़ाई कितनी विकराल हो गई, इस बात को देश को स्वीकार करना होगा.

इस पूरी लड़ाई में पीड़ित पक्ष सबसे ग़रीब, सबसे हाशिये वाला और सबसे खामोश तबका होता है.

पिछले सप्ताह दिल्ली में भगाना के परिवारों को उनके प्रदर्शन स्थल से हटा दिया गया था. पुलिस बहुत आक्रामक थीः एक शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों को पीटा गया और पुलिस अधिकारियों ने उनके साथ यौन दुर्व्यवहार भी किया.

प्रदर्शनकारियों में अधिकांश महिलाएं थीं. आख़िरकार बातचीत के बाद उन्हें प्रदर्शन करने की इजाज़त दे दी गई.

भगाना गांव के रहने वाले वेद पाल तँवर ने कहा, ''हम अपने गांव नहीं जा सकते. यह संभव नहीं है. वह सुरक्षित नहीं है. हमें अपनी कहानी लगातार बताने के सिवाय कोई चारा नहीं है जब तक कि हमारे समुदाय के लिए कुछ परस्थितियां नहीं बदलतीं.''

(निलांजना रॉय न्यूयॉर्क टाइम्स और बिजनेस स्टैंडर्ड में स्तंभाकार हैं और दि वील्डिंग्स और द हंड्रेड नेम्स ऑफ डार्कनेस की लेखिका हैं.)

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