नौकरी, कामयाबी, गर्लफ़्रेंड, केवल गोरेपन से?

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अच्छी नौकरी, कामयाब ज़िंदगी और ख़ूबसूरत गर्लफ़्रेंड या स्मार्ट ब्वॉयफ़्रेंड पाने के लिए क्या ज़रूरी है?

अच्छी शिक्षा, लगन या मेहनत. इनमें से कुछ नहीं, आपको चाहिए बस एक गोरापन बढ़ाने वाली क्रीम और बस दुनिया आपके क़दमों में.

ये हमारा कहना नहीं है बल्कि ये संदेश देने की कोशिश करते हैं इऩ फ़ेयरनेस क्रीम के वो तमाम विज्ञापन जो अख़बारों, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर छाए रहते हैं.

एतराज़

कुछ विज्ञापन तो ये बताने की कोशिश भी करते हैं कि अगर आप गोरे नहीं हैं तो फिर आप में कहीं ना कहीं कमी है.

या फिर आपकी त्वचा में निखार की कमी ही आपका आत्मविश्वास कम होने की वजह है.

ऐसे ही विज्ञापनों पर अब एतराज़ जताया जा रहा है.

एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने अब ऐसे विज्ञापनों पर काबू पाने के उद्देश्य से कुछ दिशा निर्देश बनाने का प्रस्ताव रखा है जिसके बाद उन्हें विशेषज्ञों के सुझाव के लिए रखा जाएगा. सुझाव के बाद इन प्रस्तावित दिशा निर्देशों में बदलाव भी लाए जा सकते हैं.

प्रस्ताव

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बहरहाल निर्देश बनाने का प्रस्ताव का अभी शुरूआती रूप है इसमें से जो बातें शामिल हैं वो इस प्रकार हैं.

- विज्ञापन में त्वचा के रंग के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं दिखाना चाहिए.

- विज्ञापन में क्रीम के इस्तेमाल के बाद त्वचा पर आए बदलाव को दिखाने के लिए मॉडल के चेहरे पर किसी तरह के स्पेशल इफ़ेक्ट का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

- विज्ञापनों में गहरे या हल्के रंग की त्वचा को आर्थिक स्तर पर या फिर किसी जाति, धर्म और समुदाय विशेष से जोड़कर दिखाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए.

शिक़ायतें

एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य और परामर्शदाता दिलीप चेरियन ने बीबीसी को बताया कि पिछले कुछ समय से इन विज्ञापनों के संबंध में संस्था के पास शिक़ायतें आ रही थीं.

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Image caption दिलीप चेरियन (एडवर्टाइज़िंग काउंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य): "ये हमारी संस्था का मकसद है कि विज्ञापनों में कोई अनैतिक बात ना कही जाए. किसी भी उपभोक्ता की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे. हमको इऩ विज्ञापनों के संबंध में शिक़ायतें मिली थीं. इसलिए हमने ये क़दम उठाया."

उन्होंने कहा, “ये हमारी संस्था का मकसद है कि विज्ञापनों में कोई अनैतिक बात ना कही जाए.किसी भी उपभोक्ता की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे. हमको इऩ विज्ञापनों के संबंध में शिक़ायतें मिली थीं. इसलिए हमने ये क़दम उठाया."

विशेषज्ञ मानते हैं कि इन क्रीम को इस्तेमाल करने वाले लोगों की मानसिकता का ये कंपनियां फ़ायदा उठाती हैं और वही बात इन विज्ञापनों में भी साफ़ नज़र आती है.

हीनता की भावना ?

मशहूर मनोवैज्ञानिक अरुणा ब्रूटा के मुताबिक़, “हमें जो पैदाइशी तौर पर मिला होता है हम उससे ख़ुश नहीं होते. इन विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि ये क्रीम लगाकर आप गोरे हो जाओगे. यानी कि साफ़ संदेश दिया जा रहा है कि अभी आप अच्छे नहीं हो, क्रीम लगाने के बाद अच्छे हो जाओगे.”

ब्रूटा कहती हैं कि इन विज्ञापनों से प्रभावित होने वाले दरअसल वो लोग होते हैं जिनमें हीनता की भावना होती है.

अरुणा ब्रूटा के मुताबिक़, “हम भारतीय क्रीम लगा-लगाकर अंग्रेज़ों की तरह गोरे होना चाहते हैं और वहां अंग्रेज़ धूप सेंक-सेंककर ख़ुद टैन (रंग दबना) होना चाहते हैं.”

'कंपनियां करती हैं गुमराह'

विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियां लोगों की हीन भावना को हवा देती हैं, लेकिन लोगों को गुमराह करना बिलकुल ग़लत बात है.

क्रीम के इस्तेमाल से आप गोरे हो जाएंगे या फिर गोरा होना अच्छा है, ये दोनों ही बातें नैतिक रूप से बिलकुल ग़लत हैं

इन क्रीम का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं की इस पर क्या राय है?

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दिल्ली में रहने वाली पूनम सालों से एक ऐसी ही क्रीम का इस्तेमाल कर रही हैं.

वो कहती हैं, “हमारा समाज ही इस तरह का है. लड़की अगर गोरी है तो उसकी शादी आसानी से हो जाती है. इस वजह से गोरापन बढ़ाने का दावा करने वाली क्रीम को लड़कियां इस्तेमाल करती हैं. मैनें ख़ुद काफ़ी सालों तक ऐसी क्रीम का इस्तेमाल किया है. अब भी करती हूं."

ख़ूबसूरत लगने का या उसकी कोशिश करने का हक़ सबको है. लेकिन उसके नाम पर लोगों को गुमराह करना ठीक नहीं.

दिशा निर्देशों की ज़रूरत

एक विज्ञापन एजेंसी के प्रमुख और कई विज्ञापन बनाने वाले मशहूर एड गुरु पीयूष पांडे कहते हैं, “हमें दिशा निर्देशों की ज़रूरत तो है. किसी बात को बढ़ा चढ़ा कर बोलना और दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना निश्चित तौर पर ग़लत है."

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Image caption पीयूष पांडे (एड गुरु) : हम विज्ञापन जगत से जुड़े लोगों की भी समाज के प्रति ज़िम्मेदारी है. त्वचा के रंग करे आधार पर भेदभाव करना या अपने फ़ायदे के लिए ऐसा कोई संकेत ग़लत है. ये बताना कि सिर्फ़ गोरे लोग ही ख़ुश रह सके हैं, बिलकुल फ़िज़ूल बात है.

"हम विज्ञापन जगत से जुड़े लोगों की भी समाज के प्रति ज़िम्मेदारी है. त्वचा के रंग करे आधार पर भेदभाव करना या अपने फ़ायदे के लिए ऐसा कोई संकेत ग़लत है. ये बताना कि सिर्फ़ गोरे लोग ही ख़ुश रह सके हैं, बिलकुल फ़िज़ूल बात है.”

कंपनियों का पक्ष

इस मुद्दे पर गोरेपन बढ़ाने का दावा करने वाली एक कंपनी गार्नियर के प्रवक्ता ने इस आरोप पर अपने आपको क्लीन चिट देते हुए कहा, “हम भी इस बात पर विश्वास करते हैं कि विज्ञापन को त्वचा के रंग के आधार पर सामाजिक भेदभाव को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए. हम अपने विज्ञापनों में जो संदेश देते हैं उसका वैज्ञानिक आधार होता है."

"किसी की त्वचा का रंग कैसा भी हो, उससे फ़र्क नहीं पड़ता. हर कोई अलग और अद्वितीय है. हमारे उत्पाद और विज्ञापन उन विविधताओं को समझने और उनकी सेवा के लिए समर्पित हैं. "

लेकिन सवाल ये भी उठता है कि विज्ञापनों पर नियंत्रण लगाने की कोशिश क्या रचनात्मकता पर लगाम नहीं लगाएगी ?

पीयूष पांडे संक्षेप में जवाब देते हैं, “रचनात्मकता को झूठ के सहारे की ज़रूरत नहीं है.”

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