किस्सा पर्चे, चर्चे और ख़र्चे का

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मैंने छद्म राष्ट्रवादियों को अक़्सर यह तर्क़ देते सुना है कि विदेशों से फ़ंड प्राप्त करने वाले ग़ैर सरकारी संगठन भारत के हितों को ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. इस तर्क़ को अब भारतीय ख़ुफ़िया विभाग की मीडिया में आई एक लापरवाही से लिखी आधारहीन रिपोर्ट ने स्वीकृति दे दी है.

ख़ुफ़िया विभाग की रिपोर्ट से सिर्फ़ गैर सरकारी संगठनों के ख़िलाफ़ लाखों लोगों के मन में जो विरोध है उसे ही मज़बूती मिलेगी. कार्यकर्ताओं और एनजीओ को अपनी छवि सुधारने के लिए अब व्यापक जनसंपर्क करना होगा. सबसे पहले उन्हें अपने फ़ंड के स्रोतों को पारदर्शी करना होगा.

इस रिपोर्ट में पर्यावरण बचाव के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस का नाम प्रमुखता से लिया गया है. ग्रीनपीस का कहना है कि वह चंदे की पाई-पाई का हिसाब अपनी वेबसाइट पर देती है. बाक़ी संस्थाओं को भी ऐसा ही करने की ज़रूरत है.

राष्ट्र विरोध?

हैरानी की बात यह है कि इस रिपोर्ट में विकास परियोजनाओं के विरोध को 'राष्ट्र विरोध' की संज्ञा दे दी गई है. यह हास्यास्पद आरोप इस धारणा पर आधारित है कि यदि आप अरबों डॉलर की किसी विकास परियोजना का विरोध कर रहे हैं तो आप भारत की आर्थिक विकास का विरोध कर रहे हैं. वो आर्थिक विकास जिसकी भारत को बहुत ज़रूरत है.

इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि बहुत से कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन आर्थिक विकास के रास्ते में आ रहे हैं.

हैरत की बात यह भी है कि कार्यकर्ता और एनजीओ बचाव में उतर आए हैं. उदाहरण के तौर पर शुक्रवार को हुई एक प्रेस कांफ्रेंस में अचिन विनायक और प्रफ़ुल्ल बिदवई लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहे कि उन्हें विदेश से कोई फ़ंड नहीं मिलता है. अधिक प्रभावशाली होता यदि उन्होंने कहा होता कि विदेशों से फ़ंड लेना कोई अपराध नहीं है क्योंकि विदेशों से मिलने वाले तमाम तरह के फ़ंड को गृह मंत्रालय में पंजीकृत कराना होता है.

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एक पहलू यह भी है कि रिपोर्ट में क्या है इससे ज़्यादा बहस इस बात पर हो रही है कि इस रिपोर्ट का मक़सद क्या है. नागरिक समूहों पर होने वाले इस हमले से फ़ायदा किसे पहुँचेगा. भारतीय मीडिया में इस बात को लेकर क़यास लगाए जा रहे हैं कि किसके कहने पर इस रिपोर्ट को मीडिया में लीक किया गया.

बदनामी

चलिए हम रिपोर्ट के मक़सद पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता प्रफ़ुल्ल बिदवई ने बताया कि इसका मक़सद ग़ैर सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के कार्य को बदनाम करना है. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यह विरोध की आवाज़ों को ख़ामोश करने की कोशिश भी हो सकती है." यदि इसका मक़सद विरोध की आवाज़ों को बदनाम करना या ख़ामोश करना है तो यह एक गंभीर शुरुआत है.

यदि यह प्रयास सफ़ल हो गया तो फ़ायदा किसे पहुँचेगा? यह बिलकुल साफ़ है. फ़ायदा कार्पोरेट इंडिया के अरबों डॉलर की योजनाओं को ही पहुँचेगा. कुछ योजनाओं का नाम तो रिपोर्ट में भी लिया गया है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस क्रम में जो भी कुछ हुआ है उसका संज्ञान लेकर नागरिक समाज को यह विश्वास दिलाने की ज़रूरत है कि उन्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

हालांकि यदि प्रधानमंत्री रिपोर्ट को स्वीकार करते हैं और ग़ैर सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं तो इसके अंतरराष्ट्रीय परिणाम होंगे. कई संगठनों को विदेशी चंदा मिलता है और पश्चिमी देशों से इनके संबंध हैं. मोदी विदेशों में जहाँ भी जाएंगे उन्हें इस मुद्दे पर विरोध का सामना करना होगा. उनकी सरकार को दुनियाभर में गंभीर आलोचना का सामना करना होगा और बहुत संभावना है कि पीछे भी हटना पड़े.

शक की सूई

ग़ैर सरकारी संगठनों की ताक़त और प्रभाव को उस स्तर पर नहीं पहुँचने दिया जाना चाहिए की वह राष्ट्रीय चुनावों तक को प्रभावित करने लगे. माना जाता है कि बांग्लादेश में ग़ैर सरकारी संगठन चुनावों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. भारत में भी ऐसे संगठनों का एक बड़ा नेटवर्क है. कई दूरस्थ इलाक़ों, ख़ासकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ग़ैर सरकारी संगठन ही ज़रूरतमंदों और ग़रीबों तक मदद पहुँचाने का अंतिम ज़रिया होते हैं.

लेकिन ख़ुफ़िया विभाग जैसी ताक़तवर संस्था का एनजीओ पर खुलकर आरोप लगाना इस बात का संकेत है कि उन्हें घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जा रहा है. हो सकता है कि ख़ुफ़िया विभाग, जिसे हमेशा से ही केंद्र सरकार का पिट्ठू माना जाता रहा है, ने ये रिपोर्ट लीक की हो लेकिन शक़ की सूई केंद्र सरकार की ओर भी घूम रही है.

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