'दलालों के चक्कर में फँसकर दिल्ली आ जाती हैं'

अतंरराष्ट्रीय कामगार दिवस, दिल्ली, महिलाएँ

झारखंड के गुमला की रहने वाली बिनीता कुजूर जब दिल्ली आईं तब उन्हें पता नहीं था कि शहर की 'चकाचौंध वाली ज़िंदगी के चंगुल में' वो लगातार उलझती जाएँगी. उन्होंने घरेलू कामगार के रूप में अपनी जीविका अर्जित करनी शुरू कर दी.

अपने गाँव से दिल्ली आए उन्हें 14 साल हो चुके हैं मगर जितना मानदेय उन्हें तब मिलता था, उतना ही आज भी मिलता है.

कम उम्र में ही बिनीता एक रिश्तेदार के साथ दिल्ली घूमने आई थीं. उन्हें पता नहीं था कि उनकी रिश्तेदार ने दक्षिण दिल्ली के किसी घर में उनके काम की बात पहले ही कर ली थी.

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बस तब से लेकर आज का दिन. बिनीता की उम्र घरों में काम करते ही बीत गई.

बबीता ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "मुझे बस एक दो दिन में ही किसी के घर पर काम में लगवा दिया गया. बस वो दिन और आज का दिन. मैं तो रिश्तेदार के साथ घूमने आई थी. तब मुझे 1300 रुपए मिलते थे. आज तीन हज़ार मिलते हैं. वो भी 14 सालों के बाद."

पछतावे के सिवाय कुछ नहीं मिलता

Image caption मोनिका बताती है कि प्लेसमेंट एजेंसी के दलाल लड़कियों को अच्छी ज़िंदगी और नौकरी का लालच देकर शहर ले आते हैं.

बिनीता बताती हैं, "झारखंड के गुमला में जहाँ मेरा गाँव है, वहां की ज़्यादातर लड़कियां दलालों के चक्कर में फंसकर दिल्ली आ जाती हैं. यहाँ उन्हें पछतावे के अलावा कुछ नहीं मिलता."

बिनीता की तरह ही झारखंड की मोनिका भी हैं जो घरेलू कामगार के तौर पर गुज़र बसर कर रही हैं.

उनका मानना है कि ग्रामीण इलाक़ों में प्लेसमेंट एजेंसी के दलाल लड़कियों को गुमराह करते हैं. वे उन्हें अच्छी ज़िंदगी और अच्छी नौकरी के सब्ज़बाग़ दिखाकर धोखे से शहर लाते हैं.

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मगर ये दोनों ही महिलाएं ख़ुशक़िस्मत हैं कि इन्हें वो सब कुछ नहीं झेलना पड़ा जो छोटे शहरों और क़स्बों से उनकी तरह दिल्ली काम की तलाश में आई कई अन्य लड़कियों को झेलना पड़ रहा है.

आंकड़े बताते हैं कि बड़े महानगरों में लाखों लड़कियां घरेलू कामगार के तौर पर काम कर रहीं हैं. न्यूनतम मज़दूरी तो दूर अब ऐसी लड़कियां मानव तस्करों के जाल में फंसती जा रहीं हैं.

जिस्मफरोशी के जाल में

Image caption बिनीता बताती हैं कि उनके गाँव की ज़्यादातर लड़कियां दलालों के चक्कर में फंसकर दिल्ली आ जाती हैं.

नेशनल डोमेस्टिक वर्कर्स मूवमेंट की लीज़ा का कहना है कि गाँव और क़स्बों से ऐसी लड़कियों को शहरों में लाकर बेचा जाता है.

वह बताती हैं, "लड़कियों के माँ बाप को सिर्फ दो हज़ार रुपए दिए जाते हैं जबकि शहर में इन्हे 40 से 50 हज़ार रुपयों में बेचा जाता है. कम उम्र की लड़कियां दलालों का शिकार ज़्यादा बनती हैं."

लीज़ा कहती हैं, "सिर्फ दिल्ली की बात अगर करें तो यहां दस लाख से ज़्यादा लड़कियां या महिलाएं ऐसी हैं जो घरेलू कामगार के रूप में काम कर रही हैं. यहाँ इस तरह की मांग भी बढ़ रही है, इसलिए अलग-अलग राज्यों से इनकी तस्करी हो रही है."

क्या घरेलू कामगारों को मिलेगा न्यूनतम वेतन?

इसी हफ़्ते दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में घरेलू कामगारों का एक अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की सुशीमा रेयीको का कहना था कि भारत सरकार ने 2011 में संगठन द्वारा लाए गए प्रस्ताव का समर्थन किया था.

ठोस क़ानून

सुशीमा का कहना था, "यह सम्मलेन घरेलू कामगारों की न्यूनतम मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा का समर्थन करता है. अब तक 13 देशों ने इस सम्मलेन के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए घरेलू कामगारों के अधिकारों को स्वीकृत किया है. मगर भारत सरकार ने अभी तक ऐसा नहीं किया है."

वहीं घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था निर्मला निकेतन की सुजाता मधोक का कहना था कि घरेलू राष्ट्रीय महिला आयोग की पहल पर 2009 में एक क़ानून का प्रारूप तैयार किया गया. मगर इतने सालों के बाद भी उस प्रारूप को क़ानून का रूप नहीं मिल पाया है.

ठोस क़ानून के अभाव में बड़े शहरों में घरेलू काम करके अपनी जीविका चलाने की आस लेकर आने वाली लड़कियां जिस्मफरोशी के जाल में फंसकर एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच रहीं हैं जहाँ से वो वापस लौटने की स्थिति में नहीं रहतीं. शायद यही वजह है कि इनके लिए ठोस क़ानून की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है.

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