हिंदी पर बोलीं जयललिता, मोदी सरकार को ख़त

  • 20 जून 2014
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सोशल मीडिया पर हिंदी को प्राथमिकता देने के निर्देश पर तमिलनाडु और केंद्रीय गृह मंत्रालय के बीच तकरार बढ़ गई है.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सेल्वी जे जयललिता और प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक के सुप्रीमो एम करुणानिधि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है.

गृह मंत्रालय ने नौकरशाहों को कथित तौर पर निर्देश दिया था कि वे फ़ेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, गूगल और यू ट्यूब जैसी सोशल मीडिया साइटों पर हिंदी को प्राथमिकता दें.

पत्र में मुख्यमंत्री ने लिखा है कि 1968 में हुए संशोधन के तहत अस्तित्व में आए आधिकारिक भाषा एक्ट 1963 के अनुच्छेद 3(1) में कहा गया है कि केंद्र और ग़ैर हिंदीभाषी राज्यों के बीच संवाद के उद्देश्य से अंग्रेज़ी भाषा का उपयोग किया जाएगा.

उन्होंने सोशल मीडिया पर होने वाले संवाद की भाषा अंग्रेज़ी बनाए रखने की मांग करते हुए तमिल समेत आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को भारत की आधिकारिक भाषा घोषित करने की अपनी मांग दोहराई. उनका कहना है कि इस तरह सोशल मीडिया में सभी आधिकारिक भाषाओं को बढ़ावा मिल सकेगा.

उधर, समाचार एजेंसी एएनआई ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह के ट्वीट के हवाले से कहा है, ''भारत विविध धर्मों और भाषा वाला देश है, यहां एक भाषा को थोपना असंभव है.''

विरोधाभास काफ़ी गहरा है. एक तरफ एक क्षेत्रीय नेता ने भाषा के मुद्दे पर केंद्र सरकार को पिछले पांव पर धकेल दिया है, तो दूसरी तरफ़ अदालत ने राज्य सरकार से याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें स्कूली स्तर पर तमिल के अलावा दूसरी भाषाओं को पढ़ाए जाने का अनुरोध किया गया है.

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दोनों मामले दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु से जुड़े हैं.

तमिलनाडु के पू्र्व मुख्यमंत्री और प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक के सुप्रीमो एम करुणानिधि ने भी केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और गृह राज्यमंत्री किरण रिजूजू को भाषा के मुद्दे पर आड़े हाथों लिया है.

सफ़ाई

मगर करुणानिधि की आलोचना के बाद दोनों मंत्रियों ने सफ़ाई देते हुए कहा कि सभी भारतीय भाषाएं अहम हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए करुणानिधि के चार पन्नों के पत्र के हवाले से एक अंग्रेज़ी अख़बार ने लिखा, "हिंदी को प्राथमिकता देना ग़ैर हिंदीभाषी लोगों में मतभेद पैदा करने और उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बनाने की दिशा में पहले क़दम के तौर पर देखा जाएगा."

करुणानिधि ने 60 के दशक में हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया था और इसके सहारे सत्ता हासिल की थी. उन्होंने कहा, "ऐसे समय जब सकारात्मक प्रयासों से सभी वर्गों की आकांक्षाओं को पूरा करने की ज़रूरत है, संवाद की भाषा में दिलचस्पी लेना विभाजनकारी होगा."

पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में लिखा, "हम प्रधानमंत्री मोदी से अपील करते हैं कि वह देश की आर्थिक प्रगति और सामाजिक विकास पर ध्यान दें."

प्रासंगिकता

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तमिल लेखक और राजनीतिक विश्लेषक ज्ञानी शंकरन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "उन्होंने दक्षिण भारत के लिए एक प्रासंगिक सवाल उठाया है. यह चिंता का विषय है. करुणानिधि जानते हैं कि किस समय क्या मुद्दा उठाना है ताकि वह राज्य में अपनी पार्टी को पुनर्जीवित कर सकें. लेकिन जो मुद्दा वह उठा रहे हैं, वह प्रासंगिक है."

शंकरन ने कहा, "इस बारे में संविधान स्पष्ट है. हिंदी और अंग्रेज़ी को संवाद के लिए इस्तेमाल किया जाना है. अब मोदी सरकार अंग्रेज़ी को किनारे करने की कोशिश कर रही है. संविधान की आठवीं अनुसूची में अंग्रेज़ी को वैकल्पिक भाषा के रूप में उल्लिखित किया गया है."

करुणानिधि का बयान आने के तुरंत बाद गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने साफ़ किया कि 27 मई को नौकरशाहों को ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया था.

चेन्नई में डेक्कन क्रॉनिकल के रेज़िडेंट एडिटर भगवान सिंह ने कहा, "वे दो दिन तक चुप क्यों रहे? ये निर्देश दिल्ली से छपने वाले एक प्रमुख अख़बार में प्रकाशित हुआ न कि किसी ज़िलास्तरीय छोटे अख़बार में."

भावनात्मक मुद्दा

तमिलनाडु में भाषा एक भावनात्मक मुद्दा है, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों से लोगों के तमिलनाडु में आने के बाद से शैक्षिणिक संस्थाओं, अभिभावकों और छात्रों का परिदृश्य बदल गया है.

अब इस मुद्दे का दूसरा पहलू देखिए.

एसोसिएशन ऑफ़ मेट्रिकुलेशन स्कूल्स एंड मैनेजमेंट्स इन तमिलनाडु एंड पुद्दुचेरी की एक याचिका पर मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है.

याचिका में मांग की गई है कि स्कूलों में केवल तमिल न थोपी जाए और अन्य भाषाओं को पढ़ाने की इजाज़त दी जाए.

एसोसिएशन के वकील आर कन्नन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "दूसरे राज्यों के कई छात्र तमिलनाडु में हैं. वे दसवीं कक्षा तक केवल तमिल माध्यम में पढ़ाई के लिए मजबूर हैं."

उन्होंने कहा, "सरकार 2006 में पारित एक विधेयक को थोपने की कोशिश कर रही है. इस विधेयक के मुताबिक़ छात्र केवल तमिल माध्यम में ही पढ़ाई कर सकते हैं. पढ़ाई के माध्यम के चयन का अधिकार अभिभावकों और छात्रों को है. यहां तक कि दूसरी भाषा के चयन में भी अभिभावकों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे इसका फ़ैसला करें कि उनके बच्चे किस भाषा में पढ़ें."

शिक्षा का माध्यम

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कन्नन ने कहा, "हम तमिल पढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ नहीं हैं. हमारा दृष्टिकोण यह है कि हिंदी बोलने वाले बच्चे भी तमिल सीखें और तमिल बोलने वाले बच्चे हिंदी. तमिल बोलने वाले कई छात्रों ने स्कूलों से कहा है कि वे हिंदी सीखना चाहते हैं. यह उनका अधिकार है और उन्हें इससे वंचित नहीं किया जा सकता."

कन्नन ने उच्चतम न्यायालय के एक हालिया फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें कर्नाटक सरकार से साफ़ शब्दों में कहा गया है कि शिक्षा के माध्यम का चयन करना अभिभावकों और छात्रों का अधिकार है और राज्य को नागरिकों पर अपनी पसंद नहीं थोपनी चाहिए.

तो क्या भाषा के मुद्दे का कोई समाधान है?

शंकरन कहते हैं, "आप किसी हिंदीभाषी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध तमिल सीखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते और न तमिल भाषी बच्चे को हिंदी पढ़ने के लिए. अगर अंग्रेज़ी एक अतिरिक्त भाषा है, तो इसने एक संतुलन कायम किया है. हिंदी भी तमिल, बांग्ला, मलयालम, कन्नड़ और ओड़ि़या की तरह एक क्षेत्रीय भाषा है. अंग्रेज़ी संवाद की भाषा होनी चाहिए.''

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