पटनाः फर्जी मुठभेड़ मामले में दारोगा को फांसी

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पटना की एक स्थानीय अदालत ने 12 साल पुराने एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में दोषी एक दारोगा को फांसी की सज़ा सुनाई है.

न्यायाधीश रविशंकर सिन्हा की अदालत ने दोषी दारोगा शम्स-ए-आलम को फांसी की सज़ा सुनाई और एक सिपाही अरुण कुमार सिंह सहित अन्य सात दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी.

पांच जून को अदालत ने दो पुलिसकर्मी सहित आठ लोगों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ का दोषी करार दिया था. अदालत ने पहले 12 जून को सज़ा की घोषणा की तारीख़ तय की थी, लेकिन यह फ़ैसला मंगलवार को सुनाया गया.

पुलिसकर्मियों के अतिरिक्त दोषी करार दिए गए बाकी छह पटना के आशियाना नगर इलाके में स्थित सम्मेलन मार्केट के दुकानदार हैं. राजनीतिक बवाल की वजह बन चुके इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी.

मामला

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Image caption फर्जी मुठभेड़ में मारे गए एक छात्र विकास रंजन के माता पिता.

राजधानी पटना के तत्कालीन शास्त्रीनगर थाना क्षेत्र में 28 दिसंबर, 2002 को हुई इस घटना में तीन छात्रों- विकास रंजन, प्रशांत और हिमांशु, की हत्या कर दी गई थी.

ये तीनों छात्र एक टेलीफोन बूथ पर फोन करने गए थे. जानकारी के मुताबिक़ टेलीफोन बिल के भुगतान को लेकर छात्रों की फ़ोन बूथ के मालिक से बहस और झड़प हो गई.

पहले बूथ मालिक ने स्थानीय दुकानदारों की मदद से युवाओं की पिटाई की और बाद में पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर तीनों युवाओं को डकैत कह कर मार गिराया.

घटना के बाद व्यापक विरोध ने राजनीतिक रंग ले लिया था और सत्तारूढ़ राजद को छोड़ लगभग बाकी सभी दलों ने कई दिनों तक लगातार विरोध प्रदर्शन किया था.

इसके मद्देनज़र तत्कालीन राबड़ी देवी सरकार ने मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी.

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