सियासी भंवर में उत्तर प्रदेश की बत्ती गुल

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उत्तर प्रदेश में एक तरफ़ तो क़ानून व्यवस्था को लेकर सरकार परेशान है और दूसरी ओर बिजली की क़िल्लत का कोई समाधान नहीं निकाल पा रही है.

ऐसे में केवल मॉनसून का सहारा है. जितनी जल्दी बारिश शुरू होगी, बिजली की मांग और सरकार की परेशानियां उतनी ही जल्दी कम होंगी.

भीषण गर्मी में बिजली को लेकर हो रही राजनीति से प्रदेश की जनता त्रस्त है. अति-विशिष्ट व्यक्तियों के क्षेत्रों को तो पूरे 24 घंटे बिजली आपूर्ति की व्यवस्था है लेकिन अन्य ज़िलों में बिजली कटौती मनमानी ढंग से हो रही है. कहीं-कहीं तो 10-15 घंटों तक बिजली का पता नहीं चलता.

यही नहीं, जहां समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के इटावा ज़िले और सैफई गाँव तक में 24 घंटे बिजली मुहैया कराने की बातें सामने आ रही हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में आज भी दो से तीन घंटे बिजली नदारद रहने के आरोप लग रहे हैं.

इटावा और सैफ़ई में शायद ही कभी बिजली जाती हो. इसके बाद भी सैफ़ई में बिना किसी रुकावट के बिजली आपूर्ति की व्यवस्था की जा रही है.

'बिजली की कमी नहीं'

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सैफ़ई के नायकपुर इलाके में एक नया सब-स्टेशन लगाने की क़वायद इतनी तेज़ी से की गई कि किसी को पता ही नहीं चला कि कब पुराना सब-स्टेशन बंद हुआ और कब नया शुरू हो गया.

सैफ़ई के पीडब्लूडी गेस्ट हाउस के निकट स्थित पुराने सब-स्टेशन की 95 प्रतिशत लाइन नए सब-स्टेशन से जोड़ दी गई हैं और नायकपुर के 220 केवी क्षमता वाले ट्रांसफार्मर ने काम शुरू कर दिया है.

इस बात की पुष्टि सैफई के अधिशासी अभियंता (संचार) और सब-डिविज़नल मजिस्ट्रेट दोनों ने की.

बिजली आपूर्ति में सैफई प्रदेश के अन्य गाँवों के लिए ईर्ष्या का केंद्र बन कर रहेगा क्योंकि अन्य गाँवों का क्या कहा जाए, राजधानी लखनऊ के आस-पास के गाँव भी बिजली के लिए तरसते हैं.

लखनऊ से 35 किलोमीटर दूर मोहनलालगंज के निकट करोरा गाँव में बिजली आपूर्ति की व्यवस्था इतनी ख़राब है कि भारतीय जनता पार्टी के सांसद कौशल किशोर को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा.

इटावा के अलावा नोएडा, रामपुर, कन्नौज, अमेठी और रायबरेली में 24 घंटे बिजली आपूर्ति की व्यवस्था है लेकिन नोएडा में भी दो-तीन घंटे बिजली गुल रहना आम बात है. ग्रेटर नोएडा और गाज़ियाबाद में स्थिति और ख़राब बताई जाती है.

उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक एपी मिश्रा के अनुसार प्रदेश में बिजली की कोई कमी नहीं है. पिछले वर्ष की तुलना में इस साल जून 1 और जून 12 के बीच 49.6 मिलियन यूनिट अधिक आपूर्ति की गई है. जहां 2013 में 226.7 मिलियन यूनिट बिजली आपूर्ति हुई थी वहीं इस वर्ष 276.3 मिलियन यूनिट आपूर्ति हुई.

पावर कॉरपोरेशन कंगाल

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17 जून को पावर कॉरपोरेशन की वेबसाइट पर दी गई दैनिक प्रणाली रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है. इस रिपोर्ट के अनुसार 15 जून को ग्रामीण और तहसील इलाकों में औसत आपूर्ति केवल 11.38 घंटे रही जबकि उद्योग को पूरे 24 घंटे बिजली मुहैया कराई गई. इस दिन ज़िलों में केवल 19 घंटे बिजली दी गई.

उत्तर प्रदेश उत्पादन निगम लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर कामरान रिज़वी का कहना है कि 70 से 72 मिलियन यूनिट्स ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है जो पावर कॉरपोरेशन की 290 मिलियन यूनिट्स की उच्चतम मांग से बहुत कम है. इस कमी को पूरा करने के लिए कॉरपोरेशन को बाहर से भी बिजली खरीदनी पड़ती है.

मज़ेदार बात ये है कि पावर कॉरपोरेशन कंगाल है. उत्पादन निगम के 6000 करोड़ रुपए अभी पावर कॉरपोरेशन पर बकाया है.

भारत का संविधान सबको बराबरी का स्थान देने की बात करता है लेकिन जब बिजली जैसे संसाधनों का बँटवारा होता है तो उत्तर प्रदेश में आम आदमी की तुलना में आज़म खान, नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी और मुलायम जैसे नेताओं का पलड़ा बहुत भारी पड़ता है.

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