महाराजा की वसीयत और सिख समुदाय की मांग

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Image caption (दबी ज़ुबान में महाराजा दलीप सिंह के शव को अमृतसर ले जाने की मांग उठ रही है.)

पत्रकार और लेखक क्रिस्टी कैंपबेल कहते हैं, "24 घंटे के अंदर ही ब्रितानी विदेश सचिव को निर्देश दे दिए गए कि वह महाराजा दलीप सिंह का शव संरक्षित कर, एक ताबूत में रखकर वापस इंग्लैंड के एल्वेडन ले आएं."

"उनका अंतिम संस्कार ईसाई ढंग से किया गया और उन्हें सेंट एंड्यूज़ एंड सेंट पैट्रिक्स चर्च में दफ़नाया गया. सरकारी वजहों से ब्रितानी सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि उन्हें ईसाई के रूप में दफ़नाया जाए, ताकि उन पर दावा हमेशा बना रहे."

'महाराजाज़ बॉक्स' के लेखक कैंपबेल कहते हैं कि महाराजा के शरीर को क़ब्र खोदकर निकाला जाना सही है क्योंकि उन्हें इंग्लैंड में दफ़नाया ही नहीं जाना चाहिए था.

लेकिन खुदाई को लेकर सिख समाज में भी राय बंटी हुई है.

अमनदीप सिंह मद्रा कहते हैं कि वह और उनका धर्मार्थ संगठन, यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन इसका समर्थन नहीं करेगा.

'यहीं रहने दिया जाए'

वह कहते हैं कि जहां तक उनका सवाल है, दलीप सिंह की लिखी गई अंतिम वसीयत में साफ़ लिखा है, "मुझे वहीं दफ़न किया जाना चाहिए जहां मैं मरूं."

वह कहते हैं कि उनके अवशेषों को नहीं छेड़ा जाना चाहिए.

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लेकिन सिख समुदाय में अन्य लोगों के लिए मुद्दा यह है कि सिखों के अंतिम राजा का अंतिम आश्रय कहां होना चाहिए?

उनका जन्म लाहौर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. दबी ज़ुबान में कहा जा रहा है कि उन्हें, सिखों के पवित्र शहर, अमृतसर ले जाया जाए. लेकिन अभी तक कुछ भी तय नहीं है.

चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के विचारों को सेंट्र एंड्रयूज़ एंड सेंट पैट्रिक्स के पॉल टैम्स के बयान से समझा जा सकता है, "मेरा मानना है कि उन्हें यहीं आराम से रहने दिया जाए."

चूंकि महाराजा का ईसाई तरीक़े से अंतिम संस्कार हुआ था, इसलिए क़ब्र की खुदाई के लिए इन मामलों को देखने वाली मिनिस्ट्री ऑफ़ जस्टिस के आगे दरख़्वास्त करने से पहले चर्च ऑफ़ इंग्लैंड को मनाना होगा.

लेकिन महाराजा के शव को पंजाब ले जाने की मांग करने वालों को इससे फ़र्क नहीं पड़ता.

'महाराजा दलीप सिंह शताब्दी उत्सव ट्रस्ट' के जसविंदर सिंह नागरा कहते हैं, "अगर हमें अपनी मुहिम के सफल होने का यकीन नहीं होता तो हम इस मामले को कभी भी सार्वजनिक रूप से नहीं उठाते."

(पढ़ें पहली कड़ी - सिखों के आख़िरी महाराजा क्यों बने ईसाई)

(पढ़ें दूसरी कड़ी - महाराजा की वसीयत और सिखों की माँग)

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