'हंगामे से ख़ुश तो बहुत होंगे वैदिक'

  • 17 जुलाई 2014
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भारतीय पत्रकार वेद प्रताप वैदिक और पाकिस्तान स्थित संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद की मुलाक़ात का मुद्दा सियासी बवाल का रूप ले चुका है.

चाय पर हुई बातचीत देखते ही देखते विवाद का रूप ले चुकी है. वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल के मुताबिक़ इस विवाद से सबसे ज़्यादा ख़ुशी वेद प्रताप वैदिक को मिली है.

इस विवाद पर आकार पटेल का पूरा विश्लेषण पढ़िए

जून 2014 में 12 सदस्यीय प्रतिनिधि-मंडल पाकिस्तान गया था. मैं भी उसमें शामिल था. हम तीन दिन में लौट आए थे, लेकिन वेद प्रताप वैदिक वहां कई सप्ताह के लिए रुक गए. इसके बाद उन्होंने कुछ लोगों से मुलाक़ात की, जिसमें हाफ़िज़ सईद भी शामिल थे. पता नहीं क्यों?

भारत लौटने के बाद वैदिक ने कहा कि अगर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान के दौरे पर जाते हैं तो हाफ़िज़ सईद उनका विरोध नहीं करेंगे. उन्होंने ये भी बताया कि सईद ने उनसे मोदी की पत्नी के बारे में पूछा. किसी साक्षात्कार में ये बातें कैसे शामिल हुईं, इसे मैं नहीं समझ पा रहा हूं. लेकिन यह बड़ा मुद्दा नहीं है.

वैदिक ने कहा है कि वे एक पत्रकार की हैसियत से जिससे चाहें मिल सकते हैं. मैं इससे सहमत हूं और यह नहीं समझ पा रहा हूं कि इस पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है.

हंगामा है क्यों बरपा?

अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहें, तो हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है.

ख़ासकर ख़बरिया चैनलों पर हंगामा ज़्यादा हो रहा है. मैं एक टीवी डिबेट में शामिल होने गया, जहां 40 मिनट की चर्चा में किसी ने भी एक तर्कसंगत बात नहीं की.

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वैदिक-हाफ़िज़ की इस मुलाक़ात की लोकसभा में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने निंदा की. संसद में दो दिनों से हंगामा जारी है. इस्लामाबाद में तैनात भारतीय उच्चायुक्त को वैदिक की मंशा पर रिपोर्ट भेजने को कहा गया है. हालांकि इस बाबत उन्हें मालूम नहीं है.

आम चुनाव के बाद राजनीतिक परिदृश्य से ग़ायब नज़र आ रहे राहुल गांधी ने भी वैदिकपर निशाना साधते हुए कहा कि वैदिक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आदमी हैं और इसे सब जानते हैं.

इसके जवाब में वैदिक ने कहा कि वह हिंदुत्व समूह और ऐसे व्यक्तियों के क़रीब हैं, ख़ासकर बाबा रामदेव के. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं हैं.

संसद में हंगामा

अभी भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ और सेना प्रमुखों को यह मालूम करना है कि चर्चा में रहने को उतावले एक व्यक्ति की ऐसे ही उतावले दूसरे व्यक्ति से मुलाक़ात से भारत को क्या ख़तरा हो सकता है.

मैं ये मानता हूं कि इस पूरे हंगामे से वैदिक बेहद ख़ुश होंगे. वह अपने उद्देश्य में कामयाब रहे. उन्होंने दुनिया को एक बार फिर से दिखाया कि उनके चलते संसद में हंगामा हो सकता है.

1960 के दशक में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से अफ़ग़ानिस्तान पर उनके शोध ग्रंथ हिंदी में लिखने के मुद्दे पर भी संसद में हंगामा हुआ था.

न्यूज़ चैनल टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने अपने डिबेट शो में वैदिक से कहा, "आपने मेरे एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया और अपना बायोडाटा बताते रहे."

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दरअसल वैदिक यही चाहते थे अर्णब. आपने उनके ऐसा करने के लिए एक घंटे का एयर टाइम मुहैया करा दिया. वैदिक 48 घंटों से यही कर रहे हैं. वे लोगों के साथ अपने संबंधों का ज़िक्र कर रहे हैं और आत्म प्रशंसा कर रहे हैं.

मीडिया में जो दूसरा मुद्दा छाया हुआ है, वह पाकिस्तान के डॉन न्यूज़ को दिया वैदिक का इंटरव्यू है जिसमें वह कहते हैं कि कश्मीर का स्वतंत्र होना संभव नहीं है लेकिन भारत और पाकिस्तान को कश्मीर को ज़्यादा से ज़्यादा आज़ादी देनी चाहिए.

अगर वे इतनी संवेदनशील बात कहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है? लेकिन ख़बरिया चैनलों में इस पर हंगामा मचा हुआ है.

शर्मसार करने वाला ड्रामा

एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर मेरे लिए इन बातों को भारत के ख़िलाफ़ दिखाया जाना शर्मनाक लगता है. संयोग यह है कि वैदिक ने इस हंगामे की शुरुआत से एक दिन पहले 13 जुलाई को मुझे फ़ोन कर कहा था कि उन्हें मेरा साप्ताहिक कॉलम पसंद आया है और वे इसे ('नरेंद्र' और 'अमित') को दिखाएंगे.

सच्चाई यही है कि वे कई बड़े नेताओं को अच्छे से जानते हैं. पाकिस्तान में वैदिक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से भी मिलने गए थे.

दूसरी ओर, मोदी अगर वैदिक को जानते होंगे, तो वे निश्चित तौर पर वैदिक से नाराज़ होंगे. इस ड्रामे ने मोदी की ब्राज़ील यात्राऔर चीनी नेताओं से उनकी मुलाक़ात को चर्चा से बाहर कर दिया है. स्पॉट-लाइट से बाहर होना मोदी को पसंद नहीं आया होगा.

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हालांकि मुझे ख़ुशी है कि इस छोटे से मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को घेरा जा रहा है. वो भी तो विपक्ष में रहने के दौरान नियमित तौर पर यही सब करते थे. चाहे वो पाकिस्तान में एक आयोजन में शामिल होने के लिए मणिशंकर अय्यर पर हमला रहा हो या फिर पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के श्री हफ़ीज़ सईद (सिर्फ़ शिष्टाचार का मामला भर था) कहने पर. और ना जाने ऐसे कितने मुद्दे थे.

अब इस हंगामे पर कसमसाने की बारी भारतीय जनता पार्टी की हैं. हालांकि हमारे लिए यह मनोरंजक ड्रामा शर्मसार करने वाला है.

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