गज़ा संघर्ष को लेकर भारत की चुप्पी पर सवाल

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इसराइल और फ़लस्तीन के बीच मौजूदा संघर्ष की स्थिति में भारत किस तरफ़ है? भारत की विदेश मंत्री के मुताबिक भारत के दोनों देशों से दोस्ताना संबंध हैं, इसलिए राज्यसभा में इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हो सकती.

भारत और अरब देशों के बीच हमेशा से बेहतर संबंध रहे हैं लेकिन मौजूदा समय में भारत की चुप्पी का असर आपसी संबंधों पर पड़ सकता है. इससे तेल आयात से लेकर अरब देशों में बसे भारतीयों की सुरक्षा तक पर सवालिया निशान उठ रहे हैं.

इस पूरे प्रसंग के ज़रिए भारतीय जनता पार्टी की विदेश नीति पर सवाल उठा रहे हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर.

मणिशंकर अय्यर का पूरा विश्लेषण विस्तार से पढ़िए.

भारत की विदेश मंत्री इसराइल और फ़लस्तीन के मुद्दे पर बहस से बचना चाहती हैं. इसके पीछे दो वजहें हैं. एक तो सुषमा स्वराज का दावा है कि कि भारत के दोनों देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते हैं, ऐसे में उन दोनों देशों के तनाव पर चर्चा की क्या ज़रूरत है.

दूसरी ओर, उनके प्रधानमंत्री अभी विदेश यात्रा पर हैं. शायद इस वजह से वे अपनी सरकार की विदेश नीति को लेकर निश्चिंत नहीं हैं. भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में परंपरागत विदेश नीति को जिस तरह से सुदृढ़ और फोकस्ड बनाने की बात कही गई थी, अगर यह उसका उदाहरण है तो निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में हम बड़ी मुश्किल में फंसने वाले हैं.

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1938 में, महात्मा गांधी ने फ़लस्तीन के साथ हमारे परंपरागत दोस्ती की शुरुआत की थी. उन्होंने तब कहा था, "फ़लस्तीन फ़लस्तीनियों के लिए है, जैसे इंग्लैंड अंग्रेजों के लिए है और फ़्रांस फ़्रेंच लोगों के लिए."

तब से भारत इसी राह पर चलता रहा. 1947 में संयुक्त राष्ट्र की दो समितियों के सदस्य के रूप में भारत को फ़लस्तीन पर लीग ऑफ़ नेशंस द्वारा थोपे गए प्रावधानों को आंकने का मौका मिला था. तब भारत ख़ुद ही विभाजन की कगार पर था, लेकिन उसने फ़लस्तीन के विभाजन का विरोध किया था.

1947 से है रिश्ता

भारत ने उस वक्त जो तर्क दिए वो आज भी प्रासंगिक हैं. भारत का तर्क था कि विभाजन से यहूदी-अरबकी समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि बढ़ेगी. भारत फ़लस्तीन के संघीय ढांचे के पक्ष में था, जिसमें निश्चित क्षेत्र को यहूदी लोगों को दे दिया जाता और दूसरे इलाके को अरब क्षेत्र घोषित किया जाता.

इन दोनों देशों को एक कॉमन सेंटर से जोड़ा जाता, जिसका चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से संभव था. इससे यहूदियों को घर मिलता, लेकिन वह अरब के लोगों की कीमत पर नहीं.

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इससे यहूदी और अरब लोगों के बीच आपसी संबंध भी बेहतर होते. सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के दबाव में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया, लेकिन भारत अपने मूल रूख़ पर कायम रहा. नवंबर, 1947 में फ़लस्तीन के विभाजन के विरोध में मत डालने वाला भारत दुनिया का इकलौता ग़ैर-अरब और ग़ैर-मुस्लिम देश था.

अरब आज तक उस बात को नहीं भूले हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी इसे भूल चुकी है. बीजेपी के मुताबिक फ़लस्तीन का पक्ष लेनातुष्टीकरण की नीति है. यह रवैया जिन्ना के उस बयान को जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत एक हिंदू राष्ट्र होगा, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं, को मान्यता देने जैसा है.

दरअसल भारत की हिंदुत्ववादी ताकतें हमेशा से इसराइल के पक्ष में रही हैं. अरब विरोधी, मुस्लिम विरोधी नज़रिए से संघ के एजेंडे को फैलाने में मदद मिलती है. भारत के पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो यरुसलम में यहां तक कह दिया था कि भारत अपने मुसलमानों के तुष्टीकरण के लिए लंबे समय तक इसराइल को राजनयिक तौर पर मान्यता नहीं देता रहा.

तुष्टिकरण का मामला नहीं

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यह बकवास था. हमने इसराइल के साथ अपने राजनयिक संबंध तभी बहाल किए, जब यासिर अराफ़ात ने पीवी नरसिम्हा राव को गोपनीय ढंग से सूचना भेजी कि ऑस्लो में चल रही गुप्त बातचीत में इसराइल फ़लस्तीन को देश के तौर पर स्वीकृति दे रहा है.

अरब और फ़लस्तीन के लोग यह जानना चाहते हैं कि इसराइल द्वारा 13 जून और 7 जुलाई को शुरू सैन्य अभियान के बारे में भारत की क्या राय है? करीब एक महीने की हिंसा में194 फ़लस्तीनी मारे गए हैं. इनमें बच्चे और महिलाएं शामिल हैं.

करीब 1450 लोग घायल हुए हैं. 13,000 लोगों के घर तबाह हो गए. 21,000 लोगों को अपने ठिकानों से विस्थापित होना पड़ा है. लोग स्कूलों और अस्पतालों में शरण लेने के लिए मजबूर हैं, लेकिन इस हालत पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली भारत सरकार चुप है.

हालात इससे भी बदतर हैं. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का वो बयान है जिसमें उन्होंने गज़ा में हो रहे हवाई हमलों की तुलना इसराइल में सीमा पार रॉकेट हमले से की है जिसमें किसी की मौत नहीं हुई है.

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फ़लस्तीन इस पूरे मामले को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के सामने 7, 11 और 14 जुलाई को उठा चुका है. लेकिन मोदी के नेतृत्व में भारत को इस मसले पर न कुछ कहना है और न करना.

चुप्पी से नुकसान

दिल्ली स्थित फ़लस्तीनी दूतावास ने भी भारत से अपील की है, "इन परिस्थितियों में इसराइल जिस तरह का भेदभाव चाहता है, उससे भारतीय प्रशासन को इनकार करना चाहिए. दोनों देशों के बीच कोई साम्य नहीं है. एक तरफ़ परमाणु क्षमता से संपन्न देश तो दूसरी ओर कॉलोनी में रहने वाले लोग जिनके पास कोई सेना नहीं है."

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झूठे प्रचार में विश्वास रखने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार कह रही है कि इसराइल में 70 से 80 हज़ार भारतीय काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार यह नहीं बता रही है कि अरब देशों में 70 से 80 लाख भारतीय लोग मौजूद हैं.

ये लोग हर साल लाखों डॉलर भारत भेजते हैं और उन्हीं पैसों से हम इसराइल से हथियार खरीदते हैं. ईरान से लेकर लाल सागर के इलाके से ही हमारा 70 फ़ीसदी तेल आयात होता है.

नैतिकता और राष्ट्रीय हित का तकाजा है कि हमें अरब देशों सेबेहतर संबंध बनाकर रखने चाहिए. अगर इस दिशा में गंभीर कोशिशें नहीं हुईं तो हम अरब देशों के साथ वो सद्भावना खो देंगे, जो बीते सात दशक में बनी है.

(इसी श्रृंखला में 20 जुलाई को पढ़िए भाजपा नेता शेषाद्रि चारी का आलेख)

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