'रोटी पर नहीं मोदी पर था निशाना'?

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नई दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में शिवसेना सांसदों ने ख़राब खाने को लेकर हंगामा किया. नाराज़ सांसद राजन विचारे ने जिस केटरिंग कर्मचारी के मुंह में जबरन रोटी ठूंसने की कोशिश की वो एक रोज़ेदार मुसलमान था. शिवसेना इस मामले पर सफ़ाई पेश कर कह रही है कि उसके सांसद ख़राब खाने का विरोधकर रहे थे और भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे से किनारा कर लिया है.

क्या ये मामला केवल ख़राब खाने से नाराज़गी का है. वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर के मुताबिक इसके पीछे, मुश्किल दौर से गुज़रते भाजपा-शिवसेना गठजोड़ और भारतीय समाज के कमज़ोर पड़ते ताने-बाने की कहानी छिपी है.

पढ़िए क्या कहना है वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर का

भारत सांप्रदायिकता के ज्वालामुखी पर बैठा है. ज़्यादातर वक्त ये ज्वालामुखी शांत रहता है और इसलिए हमें आभास होता है कि सब कुछ सही है.

लेकिन अंदर ही अंदर एक आग हमेशा धधकती रहती है.

बेहद छोटी दिखने वाली कोई भी बात इस आग को भड़का सकती है और सांप्रदायिक बवाल उठ सकता है.

दो साल पहले की बात है. सोशल मीडिया पर एक समुदाय पर हो रही ज़्यादतियों की जाली तस्वीरें वायरल हुईं. मुसलमानों ने इसके ख़िलाफ़ जुलूस निकाले.

पुलिस के साथ हिंसक झड़पें भी हुईं. मामला इतना बढ़ गया कि मुंबई में दंगे भड़कने के आसार दिखने लगे, लेकिन उस मामले में लोगों की भावनाएं भड़काने और समाज को बांटने की कोशिश साफ़ झलकती थी.

ताज़ा मामला ये है कि महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के 11 सांसदों ने एक केटरिंग कर्मचारी के मुंह में रोटी ठूंसने की कोशिश की. ये सांसद सदन में ख़राब खाना परोसे जाने को लेकर नाराज़ थे और कर्मचारी एक रोज़ेदार मुसलमान था.

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शिवसेना सांसदों ने कैंटीन कर्मचारी के साथ जो 'गुंडाग़र्दी' दिखाई, वो शिवसेना का जाना पहचाना तरीका है. महाराष्ट्र के लोग शिवसेना के इस तौर-तरीके से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं.

लेकिन भारत के बाकी हिस्सों में लोगों को शिवसेना के इस रवैये की झलक टीवी चैनलों से ही मिलती है.

शिवसेना सांसदों ने मुसलमान कर्मचारी के साथ ये व्यवहार दिल्ली में किया. तमाम टीवी चैनलों ने फुटेज को बार-बार दिखाया और सोशल मीडिया पर बहस थम नहीं रह रही है.

इस सबके बीच सबसे हैरान करने वाली बात थी भारतीय जनता पार्टी की चुप्पी. इसके बावजूद पार्टी लगातार लोगों को ये समझाने की कोशिश करती रही कि वो धर्मनिरपेक्ष है सबको साथ लेकर चलना चाहती है.

इस मामले में ये स्पष्ट हो चुका है कि शिवसेना सांसदों ने उस कर्मचारी के मुसलमान होने की वजह से उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया. उसकी जगह कोई भी होता वो उसे इसी तरह लताड़ते.

लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वो ये कि महाराष्ट्र सदन में जो हुआ उससे हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क सकते थे. ये दिखाता है कि भारतीय समाज का ताना-बाना अब कितना नाज़ुक हो गया है.

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इस पूरे वाकये में कुछ और बातों का भी असर रहा है. मसलन महाराष्ट्र में होने वाले चुनावों को लेकर भाजपा-शिवसेना में अगर 'ठनी' न होती तो ये मामला शायद दब जाता. असर इस बात का भी कि केंद्र में मौजूद नरेंद्र मोदी की सरकार पर 2002 के गोधरा दंगों की छाया है.

भाजपा और शिवसेना दोनों आने वाले चुनावों में अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री चाहती हैं. महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ, उसमें सांप्रदायिकता की झलक इस राजनीतिक गणित से अछूती नहीं है.

फुटेज में शिवसेना सांसदों का जो गुस्सा दिखता है, उसके पीछे 'भेदभाव' की टीस भी है. शिवसेना सांसद 'सूखी रोटियों' से ही नहीं इस बात से भी नाराज़ थे कि महाराष्ट्र सदन में भाजपा नेताओं को 'खास' और शिवसेना सांसदों को 'आम' तरीके से बरता जाता है.

शिवसेना उस वक्त से खुद को उपेक्षित महसूस कर रही है, जबसे 26 मई को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है. 18 सांसद चुनकर आने के बावजूद उसे केवल एक मंत्रालय मिला है.

माना जाता है कि उद्धव ठाकरे ने जब इस बारे में अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की, तब भी उसपर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया गया.

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भारतीय जनता पार्टी को अब तक मध्यवर्ग और महानगरों में रहने वाले शहरी वर्ग की पार्टी माना जाता था. इस चुनाव में मिली बहुसंख्यक जीत से पहले भाजपा खुद भी अपने आपको इसी चश्मे से देखती थी.

अब जबकि भाजपा को लगता है कि शिवसेना भी 'मोदी की लहर' के सहारे लोकसभा में पहुंची है, वो इस मौके को खोना नहीं चाहते. भाजपा अब महाराष्ट्र चुनावों में इसी आधार पर सीटों का बंटवारा चाहती है.

शिवसेना का एक धड़ा ये भी मानता है कि उद्धव ठाकरे के प्रति मोदी का रवैया बेहद रूखा है. ये भी कि मोदी वैचारिक और भावनात्मक रूप से राज ठाकरे के ज़्यादा क़रीब हैं.

भाजपा और शिवसेना के बीच कई स्तरों पर मतभेद हैं. एक फर्क ये भी है कि भाजपा खुद को पढ़े-लिखों की और भद्र लोगों की पार्टी के रूप में पेश करना चाहती है. शिवसेना के तौर तरीके 'उपद्रवी', रूख़े और दो-टूक हैं.

यहां तक कि भाजपा में कुछ लोग शिवसेना के साथ गठबंधन तोड़ देना चाहते हैं हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि इससे महाराष्ट्र चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को फ़ायदा मिलेगा.

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हालांकि ज़्यादातर लोग ये मानते हैं कि आने वाले चुनावों में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की हार तय है और भाजपा-शिवसेना गठबंधन ही राज्य में सरकार बनाएगा.

कांग्रेस नेता नारायण राणे के विद्रोह और शरद पवार की खीझ की वजह भी यही है. दोनों ही मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के खिलाफ़ हैं.

महाराष्ट्र में इस वक्त असमंजस की स्थिति है और किसी भी पार्टी के लिए अकेले अपने बूते सरकार बनाना मुश्किल है, इसीलिए अब लड़ाई वर्चस्व और खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की है.

महाराष्ट्र सदन में जो हुआ, उसका इस स्थिति से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन कांग्रेस इसे अपने हित में भुनाकर शिवसेना और भाजपा के बीच दूरी को बढ़ाना चाहती और भाजपा खुद को इस मामले से अलग रखना चाहती है.

सबसे दुखद बात ये है कि इस मामले पर हिंदू-मुस्लिम रंग चढ़ा और महाराष्ट्र में अब राजनीति का स्तर इतना छिछला हो गया है.

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