अबकी रूठे, तो नहीं मनाए जाएंगे आडवाणी !

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भारतीय जनता पार्टी में मोदी युग की शुरुआत के साथ ही आडवाणी युग समाप्त हो गया है.

पार्टी या सरकार में उनका कोई दखल नहीं है और न ही उन्हें पूछने वाला कोई रह गया है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि मोदी और उनकी टीम ने आडवाणी की यह दुर्गति की है. संघ की सहमति के बिना ऐसा संभव नहीं होता.

और आडवाणी की यह स्थिति अचानक नहीं हुई है. यह तो 2005 में पाकिस्तान में उनके जिन्ना की तारीफ़ करने से शुरू हुई प्रक्रिया की पूर्णाहुति ही है.

आडवाणी के लिए राहत यही है कि उन्हें बलराज मधोक की तरह पार्टी से बाहर नहीं किया गया है.

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लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी में 'शिखरपुरूष' या 'लौहपुरूष' जैसे विशेषणों से नवाजे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति में अब गांधीनगर से निर्वाचित एक सांसद भर रह गए हैं.

पार्टी या उसकी अगुवाई वाली सरकार में उनका कोई दखल नहीं है. जिस पार्टी के सारे मौजूदा नीति-निर्धारक एक समय उनके 'राजनीतिक-शिष्य' रहे हों, उसमें अब उनसे कोई सलाह तक नहीं लेता.

उनसे मिलने-जुलने वाले भी कम हो गए हैं. चुनाव-नतीजे आने और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही पार्टी संसदीय दल के अध्यक्ष और एनडीए के कार्यकारी अध्यक्ष जैसे पदों से उनकी छुट्टी हो गई.

संसद भवन स्थित उनका कार्यालय-कक्ष भी छिन गया. फिर कुछ तरस आया और संघ से संकेत मिले तो कमरा वापस दे दिया गया पर किसी पद के बगैर.

कमरे के बाहर लगी उनके नाम की पट्टी भी उतर गई. हाल ही में वह फिर लगाई गई पर उसमें सिर्फ नाम है, कोई पदनाम नहीं.

सियासत ऐसी ही होती है. उनकी छत्रछाया में दीक्षित सारे प्रमुख शिष्य आज 'मोदी-भक्ति' में जुटे हैं और आडवाणी अकेले बैठे कुढ़ते रहते हैं.

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Image caption मोदी और आडवाणी के बीच काफी समय से रिश्ते सहज नहीं माने जाते हैं

पार्टी से वह बाहर नहीं हुए पर पार्टी में उनकी मौजूदगी अब सिर्फ नाम भर की है.

'पार्टी नहीं देश का लौहपुरुष'

वस्तुतः आडवाणी का राजनीतिक पराभव पहले ही शुरू हो गया था लेकिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पार्टी के 'लौहपुरूष' को शीर्ष से फर्श पर ला दिया गया.

यह सब आरएसएस की इच्छा और आदेश पर हुआ. संघ ने उनके पराभव की पटकथा सन 2005 में (पाकिस्तान-दौरे में मोहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा किए जाने के तत्काल बाद) लिखनी शुरू कर दी थी.

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Image caption आम चुनाव में इस बात को लेकर भी काफी खींचतान रही कि आडवाणी कहां से चुनाव लड़ेंगे

पर आडवाणी को तब लगा कि संघ कुछ भी कहे, पार्टी और सहयोगी दलों के बीच वह वाजपेयी के बाद सबसे 'श्रद्धेय-नेता' हैं, उन्हें कोई कमजोर नहीं कर सकता.

सन 2009 में वह पीएम-पद के पार्टी-प्रत्याशी भी घोषित हो गए. पर वह पीएम नहीं बन सके.

संसदीय चुनाव में कांग्रेस को 2004 के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलीं और फिर से यूपीए सरकार बन गई.

आडवाणी को इसके बाद ही अपने को मार्गदर्शक वाली भूमिका में लाना चाहिए था और कमान अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को सौंपने पर सहमत हो जाना चाहिए था. पर वह एक बार और भाग्य आजमाने पर अड़े रहे.

यही आकलन उनके निर्णायक-पतन का कारण बना. सन 2010 और 2012 के बीच, संघ को मोदी के रूप में उसकी पसंद का नया राष्ट्रीय नेता मिल चुका था.

यही वह दौर था, जब संघ में बदलाव हो रहा था. 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और 'कारपोरेट-पक्षधरता' के मिश्रित रसायन से अपने राजनीतिक एजेंडे को संवारा जा रहा था.

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Image caption आडवाणी कई बार सार्वजनिक तौर पर भावुक हो चुके हैं

'उग्र हिन्दुत्व' के प्रतीक रहे मोदी के साथ सन 2010-11 के दौर में 'विकास पुरुष' की छवि जोड़ी गई. सन 2012 की चुनावी-जीत के बाद इसका मोदी ने खूब प्रचार कराया.

इसी दौर में उन्होंने अपनी पार्टी के 'लौहपुरुष' को छोड़ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को भगवा-नजरिए से व्याख्यायित करना शुरू किया.

'माई कंट्री, माई लाइफ'

भारतीय कारपोरेट के बड़े हिस्से ने उऩके हर उपक्रम का भरपूर समर्थन किया. इसकी अभिव्यक्ति कई तरह से देखी गई.

सन 2012-13 के बीच मीडिया, खासकर निजी टीवी चैनलों में मोदी लगातार छाए रहे. आडवाणी को भगवा-जमातों में भी लोग भूलने लगे. संघ पूरी तरह मोदी के साथ दिखा.

आडवाणी के पास विकल्प नहीं थे. अगर वह संघ के सामने आत्मसमर्पण नहीं करते तो बलराज मधोक बनकर पार्टी से बाहर होते.

उनसे बेहतर और कौन जानेगा कि भाजपा में बड़े से बड़े नेता को भी संघ की नज़र में गिरने के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.

स्वयं आडवाणी ने अपनी आत्मकथा, 'माई कंट्री, माई लाइफ' में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम का जिक्र किया है.

दिसम्बर, 1972 में पहली बार जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद आडवाणी को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक के राजनीतिक भविष्य का फैसला करना था.

कई महीने से पार्टी और संघ के अंदरूनी हलकों में मधोक को लेकर नाराजगी चल रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी और नाना जी देशमुख ही नहीं, संघ के नेता भी मधोक से नाराज थे.

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Image caption आडवाणी पार्टी के सबसे बुजुर्ग नेताओं में से एक हैं

वाजपेयी-नानाजी-आडवाणी की तिकड़ी मधोक को पार्टी से बाहर करने पर आमादा थी. लेकिन संघ की अनुमति के बगैर ऐसा संभव नहीं था.

मौका निकालकर आडवाणी ने एक दिन गोलवलकर से दिल्ली हवाई अड्डे पर गोपनीय मुलाकात की.

गोलवलकर कहीं जा रहे थे. आडवाणी ने उनसे समय मांगा तो उन्होंने कहा कि हवाई अड्डे पर ही आ जाइए.

आडवाणी को संघ की अनुमति मिल गई. अंततः 1973 की शुरुआत में ही बलराज मधोक को जनसंघ से बाहर कर दिया गया.

सन 2014 में आडवाणी को सिर्फ इतनी राहत मिली है कि उन्हें 'मधोक' नहीं बनाया गया, 'आडवाणी' ही रहने दिया गया, पर एक हारा हुआ, बुझा-बुझा आडवाणी.

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