पंजाबः प्रबंधक कमेटी विवाद से राजनीति में नया मोड़

  • 27 जुलाई 2014
स्वर्ण मंदिर, पंजाब इमेज कॉपीरइट AFP

हरियाणा में नए राज्यपाल की नियुक्ति और अकाल तख़्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह की तरफ़ से हुक्मनामा जारी किए जाने के बाद पंजाब की पंथक राजनीति में आया भूचाल थम गया लगता है.

ज्ञानी गुरबचन सिंह के हुक्मनामे की बाद पंजाब में सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल ने अमृतसर में रविवार को होने वाली पंथक कांफ्रेंस रद्द कर दी है.

तो वहीं दूसरी तरफ़ हरियाणा के सिखों ने भी करनाल में 28 में जुलाई को होने वाला हरियाणा सिख कन्वेंशन रद्द कर दिया है.

ज्ञानी गुरबचन सिंह ने हरियाणा के लिए अलग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मुद्दे पर सब कन्वेंशनों को रद्द करने का हुक्मनामा जारी किया है.

हरियाणा के नए राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने बयान दिया कि हरियाणा विधानसभा द्वारा पास एक्ट पर केंद्र सरकार की राय के मुताबिक़ फिर से विचार होना चाहिए.

पढ़ें क्या है विवाद?

हरियाणा के लिए अलग गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को विधानसभा में बिल पेश करके क़ानून का रूप दे दिया गया था.

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मगर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और पंजाब की सत्तारूढ़ पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने इसका विरोध किया था.

हरियाणा के सिख कई साल से अलग कमेटी की मांग कर रहे थे ताकि राज्य के गुरुद्वारों का प्रबंधन सुधारा जा सके.

पंथक सियासत में नया मोड़

इस विवाद के कारण पंजाब में पंथक सियासत को नया मुद्दा मिल गया. मगर इस मसले पर पंजाब की सिख संस्थाएं और संगठन एकमत नहीं हैं और सिखों के हितों की बात पंजाब के सियासी माहौल से जोड़कर देखी जा रही है.

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पंथक राजनीति और धर्मयुद्ध मोर्चा वाली शब्दावली में बात कर रहे हैं पर इस बार जाने-पहचाने शब्दों के मायने जाने-पहचाने नहीं है.

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एक तरफ मुख्यमंत्री पद त्याग कर मोर्चा लगाने की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ उनकी यह कार्यवाही लोकसभा चुनाव में खोया जनाधार वापस पाने की कवायद बताई जा रही है.

यह बात 14 साल से चल रही है. गुरुद्वारों के प्रबंध को लेकर लंबे संघर्ष के बाद 1925 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी बनी.

गुरुद्वारा सुधार लहर को महात्मा ग़ांधी ने आज़ादी की लड़ाई की पहली जीत करार दिया था.

प्रबंधन पर विवाद

सालों के मोर्चों के बाद गुरुद्वारों को महंतों के कब्ज़े से छुड़ाया गया था. तब पंजाब काउंसिल ने सिख गुरुद्वारा एक्ट 1925 बनाया, जिसके तहत ऐतिहासिक गुरुद्वारों का प्रंबध शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को दिया गया.

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Image caption पंजाब साहिब पाकिस्तान में दर्शन करते लोग.

देश के बंटवारे के बाद 1947 से पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारों का प्रबंध शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से छिन गया.

तभी से सिखों की अरदास में 'जिन गुरुधामों का पंथ से विछोह हो गया है उनके दर्शन-दीदार' की इच्छा प्रकट की जाती है.

दिल्ली सिख गुरुद्वारा एक्ट 1971 के तहत दिल्ली के गुरुद्वारों का प्रबंध दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी को दे दिया गया.

खालसा पंथ के 300 साल 1999 में पूरे हुए, तो पाकिस्तान में गुरुद्वारों का प्रबंध देखने के लिए वहां की सरकार ने पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी बनाने का फ़ैसला किया.

अलग प्रबंधक कमेटी

अब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का घेरा पंजाब, हरियाणा और हिमाचल तक सिमटकर रह गया.

हरियाणा से अलग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी मांग हुई तो राजस्थान से भी यही मांग उठी.

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पंजाब में भी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के काम में शिरोमणि अकाली दल की दखलंदाज़ी और इसके राजनीतिक इस्तेमाल का सवाल उठता रहता है.

ऐसे में गुरुद्वारों का प्रबंध सुधारने और उनकी कमाई का सही इस्तेमाल करने के सवाल अलग-अलग संस्थाए और संगठन उठाते रहते हैं.

अब हरियाणा के लिए अलग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का सवाल हर संस्था और संगठन के लिए अहम बना हुआ है.

'पंथ को ख़तरे' की दलील

शिरोमणि अकाली दल ने 'पंथ को खतरा' और 'सिखों के मामलों में दखलंदाज़ी' की दलील देनी शुरू की है.

अब तक अकाली मोर्चों में कहा जाता था कि 'एकता' और 'अखंडता' के नाम पर दिल्ली सरकार 'सिखों के मामलों में दखलंदाज़ी' करती है.

अब कहा जा रहा है कि 'दिल्ली सरकार हमारे साथ है' और हरियाणा ने देश की 'अखंडता' तोड़ने का काम किया है.

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प्रकाश सिंह बादल कह चुके हैं कि 'पंथ को खतरा है' और 'धर्मयुद्ध मोर्चा' का समय आ गया है.

पंजाब के धर्मयुद्ध मोर्चों में तमाम सिख संस्थाए और संगठन भाग लेते रहे हैं. इस बार चंडीगढ़ में 10 सिख संस्थाओं ने प्रस्ताव पास किया है कि हरियाणा के गुरुद्वारों का प्रबंध वहां के सिखों को दिए जाने से सुधरेगा.

'सिखों का सिखों के ख़िलाफ़ मोर्चा'

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Image caption प्रोफ़ेसर गुरुदर्शन सिंह ढिल्लों अलग कमेटी की मांग के लिए भ्रष्टाचार को जिम्मेदार मानते हैं.

इनमें भाई गुरदास इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज़, केंद्रीय श्री गुरुसिंह सभा, शिरोमणि खालसा पंचायत और गुरुमत मिशनरी कॉलेज शामिल हैं, जो धर्मयुद्ध मोर्चों का हिस्सा रहे हैं.

सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल में भी अभी तक कोई सहमति नहीं है.

शिरोमणि अकाली दल अमृतसर के नेता सिमरनजीत सिंह मान का कहना है कि पंजाब तथा हरियाणा के सिख भाई-भाई हैं.

वरिष्ठ नेता मंजीत सिंह, कलकत्ता के मुताबिक़ सिखों का सिखों के ख़िलाफ़ मोर्चा जायज़ नहीं है.

गर्म दलिया सिख संस्थाओं में माने जाते शिरोमणि अकाली दल पंच प्रधानी और दल खालसा हरियाणा के लिए अलग कमेटी का समर्थन कर रहे है. संत समाज तथा दमदमी टकसाल में सहमति नहीं बन पाई है.

'मांग के पीछे भ्रष्टाचार'

दमदमी टकसाल और यूनाइटेड सिख मूवमेंट के नेता मोहकम सिंह धर्मयुद्ध मोर्चों वाले रवायती मुद्दों को लेकर सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल के ख़िलाफ़ चार अगस्त को चंडीगढ़ में प्रदर्शन करने वाले हैं. वह हरियाणा के लिए अलग कमेटी का समर्थन करते हैं.

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Image caption अमरिंदर सिंह कहते हैं कि अलग कमेटी बनाने का काम दस जनपथ के इशारे पर हुआ है.

इस पर सिख बुद्धिजीवियों की राय भी बंटी हुई है.

सिख इतिहासकार प्रो. गुरदर्शन सिंह ढिल्लों कहते हैं, "धर्मयुद्ध मोर्चे जैसी बात प्रकाश सिंह बादल के लिए धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर आत्महत्या है."

उन्होंने कहा, "सिख पंथ उनके साथ नहीं है क्योंकि अलग कमेटी की मांग के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का भ्रष्टाचार ज़िम्मेदार है. इससे भी आगे अलग कमेटी पंथ की संघीय ढांचे की मांग का हिस्सा भी है."

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य रहे अमरिंदर सिंह संभावित मोर्चे को इतिहास के साथ जोड़कर देखते हैं, "यह ग़ांधी परिवार और सिखों की पुरानी लड़ाई की अगली कड़ी है. हुड्डा ने अलग कमेटी बनाने का काम 10, जनपथ के इशारे पर किया है. इस मोर्चे के साथ सिख पंथ की भावनाएं जुडी हैं."

'गुरु की गोलक और राजनीति'

कभी सिख मिलिटेंट मूवमेंट का हिस्सा रहे सुरिंदर सिंह किशनपुरा के मुताबिक़, "अलग कमेटी से सिख पंथ कोई दो नहीं हो जाता. यह प्रबंधन का मसला है. गुरुद्वारों का प्रबंधन अलग कमेटी से सुधरेगा."

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Image caption सुरिंदर सिंह किशनपुरा कहते हैं कि अलग कमेटी से सिख पंथ कोई दो नहीं हो जाता.

वह कहते हैं, "दिल्ली या पाकिस्तान की अलग कमेटियों ने पंथ को कहां बांटा है? अलग कमेटी के विरोधी गुरु की गोलक और अपनी राजनीति को ध्यान में रखकर सब कुछ कर रहे हैं."

इन बातों से लगता है कि आने वाले दिन पंजाब की पंथक राजनीति का नया अध्याय हो सकते हैं.

देखना यह है कि अकाल तख़्त के जत्थेदार के हुक्मनामे का असर कन्वेंशनों को रद्द करने तक ही सीमत रहेगा या हरियाणा के नए राज्यपाल के साथ यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाएगा.

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