रायसेनः जहां तोप बोलती है- खोल लो रोज़ा

  • 27 जुलाई 2014
रायसेन, रमज़ान की तोप

मध्यप्रदेश का रायसेन ज़िला रमज़ान के दौरान आज भी एक अनूठी परंपरा जारी रखे है. यहां आज भी रमज़ान में इफ़्तार और सेहरी तोप के गोले की गूंज से शुरू और ख़त्म होते हैं.

रायसेन से 45 किलोमीटर दूर भोपाल और सीहोर में भी पहले रमज़ान में तोप चलाई जाती थी, लेकिन बाक़ी दोनों शहरों में वक़्त के साथ यह परंपरा ख़त्म हो गई.

रायसेन के शहर काज़ी ज़हीरुद्दीन बताते हैं कि पहले तोप बड़ी हुआ करती थी लेकिन अब छोटी तोप चलाई जाती है.

वह बताते हैं, ”पहले बड़ी तोप का इस्तेमाल होता था लेकिन क़िले को नुक़सान न पहुंचे इसलिए अब इसे दूसरी जगह से चलाया जाता है.”

इस परंपरा की शुरुआत भोपाल की बेग़मों ने 18वीं सदी में की थी. उस वक़्त आर्मी की तोप से गोला दागा जाता था. शहर काज़ी इसकी देखरेख करते थे.

इंतज़ार

आज रायसेन में रमज़ान के दौरान चलने वाली तोप के लिए बक़ायदा लाइसेंस जारी किया जाता है. कलेक्टर तोप और बारूद का लाइसेंस एक माह के लिए जारी करते हैं.

इसे चलाने का एक माह का ख़र्च क़रीब 40,000 रुपए आता है. इसमें से तक़रीबन 5000 हज़ार रुपए नगर निगम देता है. बाक़ी लोगों से चंदा कर इकट्ठा किया जाता है.

तोप को रोज़ एक माह तक चलाने की ज़िम्मेदारी सख़ावत उल्लाह की है. वे रोज़ा इफ़्तार और सेहरी ख़त्म होने से आधा घंटे पहले उस पहाड़ में पहुंच जाते हैं, जहां तोप रखी है और उसमें बारूद भरने का काम करते हैं.

उन्हें नीचे मस्जिद से जैसे ही इशारा मिलता है कि इफ़्तार का वक़्त हो गया, वैसे ही वह गोला दाग़ देते हैं.

सख़ावत उल्लाह इसे बहुत अहम काम मानते हैं. उनका कहना है, "लोगों को मेरे तोप चलाने का इंतज़ार रहता है. तभी वे रोज़ा खोल सकते हैं."

पहले तोप की आवाज़ दूर-दूर तक सुनाई पड़ती थी लेकिन अब शोर शराबे ने उसे कम कर दिया है.

इसके बावजूद शहर और क़रीब के गांव के लोगों को गोला दाग़े जाने की आवाज़ का इंतज़ार सेहरी ख़त्म करने और रोज़ा खोलने के लिए रहता है.

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