यूपीएससी: स्टील प्लांट यानी 'स्टील का पौधा'

यूपीएससी विरोध

यूपीएससी की परीक्षा में ‘सीसैट’ का पेपर लाने को हिंदी और अन्य भाषाओं के छात्र अपने साथ स्पष्ट भेदभाव मान रहे हैं.

इस मुद्दे पर आंदोलन कर रहे छात्रों का कहना है कि इस भेदभाव को उन्होंने परीक्षा के विभिन्न स्तरों और पूछे गए प्रश्नों में महसूस किया है.

पढ़िए विस्तार से

दिल्ली का मुखर्जी नगर आमतौर पर एक शांत रहने वाला इलाका है. यहाँ आपको सड़कों पर हज़ारों नौजवान दिखेंगे जो हिंदी माध्यम से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते हैं.

पर उनकी भीड़ से कभी किसी को खौफ़ नहीं होता. सब जानते हैं कि वे अपने भविष्य के सपनों को साकार करने में जुटे विनम्र और मेहनती युवा हैं.

पर पिछले एक महीने से ये नौजवान काफ़ी नाराज़ हैं. इनकी नाराज़गी यूपीएससी और भारत सरकार दोनों से है.

इन्हें लगने लगा है कि यूपीएससी ने एक सोची-समझी साजिश के तहत भाषाई भेदभाव करते हुए इनसे इनका सपना छीन लिया है. शक तो इन्हें पिछले 2-3 सालों से था, पर इस साल तो पानी सिर के ऊपर चला गया.

दरअसल, वर्ष 2011 में यूपीएससी ने सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा का ढाँचा बदला. पहले इसमें दो पेपर होते थे- 150 अंकों का सामान्य अध्ययन और 300 अंकों का वैकल्पिक विषय. छात्र अपनी रूचि से एक वैकल्पिक विषय चुनते थे और उस पर गहरी पकड़ बनाकर प्रारम्भिक परीक्षा पास कर लेते थे.

चूँकि हर विषय की मैरिट सूची अलग होती थी, इसलिए हर विषय के उत्कृष्ट छात्र लगभग बराबर अनुपात में सफ़ल होते थे. एक ‘सेन्स ऑफ़ प्रपोर्शन’ था जो सबकी समझ में आता था.

नए पैटर्न में प्रारम्भिक परीक्षा से वैकल्पिक विषय को हटा दिया गया और एक नया पेपर लाया गया जिसे ‘सीसैट’ (सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट) कहते हैं.

असंभव सी चुनौती

इस पैटर्न ने हिंदी तथा अन्य भाषाओं के माध्यम वाले उम्मीदवारों के सामने एक असंभव सी चुनौती पेश की जिसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ 2010 तक मुख्य परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों में 40-45% अनुपात हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों का था, वहीं 2011 से यह घटकर 15-16% के आसपास पहुँच गया.

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जल्दी ही उन्हें महसूस होने लगा कि अब वे प्रारम्भिक परीक्षा में सफल होने के लायक भी नहीं रहे.

यह संकट इसलिए नहीं आया कि ये छात्र अयोग्य थे, संकट की जड़ें परीक्षा पैटर्न में निहित भेदभाव में थीं. मसलन, ‘सीसैट’ में कुल 80 में से 8-9 सवाल सिर्फ़ अंग्रेज़ी में पूछे जाने लगे थे जिनका कुल मूल्य 20 से 22.5 अंकों का था. अंग्रेज़ी वालों के लिए बेहद आसान और कम समय लेने वाले थे जबकि ग्रामीण और गैर-अंग्रेज़ी भाषियों के लिए कठिन.

कठिनाई यह थी कि अगर उनसे 3 सवाल भी गलत हो जाएँ तो 7.5 अंक तो जाएंगे ही, साथ ही निगेटिव मार्किंग के कारण 2.5 अंक और कटेंगे.

इसी तरह, 30-35 सवाल कोम्प्रिहेंशन क्षमता की जाँच के लिए पूछे जाने लगे जिनका हिंदी अनुवाद बेहद अटपटा और बेतुका होता था (जैसे ‘टैबलेट कंप्यूटर’ के लिए ‘गोली कंप्यूटर’, ‘स्टील प्लांट’ के लिए ‘इस्पात पौधा’ और ‘लैंड रिफॉर्म्स’ के लिए ‘आर्थिक सुधार’).

भेदभावपूर्ण पैटर्न

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संकट यह था कि अगर हिंदी वाला छात्र ऐसा अनुवाद पढ़कर उत्तर देना चाहे तो 5-7 सवाल गलत होना तय था और अगर वह साथ में अंग्रेज़ी पाठ भी देखे तो समय की कमी से बाकी खण्डों के सवाल छूटने तय थे. कुल मिलाकर, जिस परीक्षा में 1-1 अंक के अंतराल से सैकड़ों उम्मीदवार विफल हो जाते हैं, उसमें उन्हें कम से कम 25-30 अंकों का अवैध नुकसान उठाने के लिए मजबूर किया गया.

साथ ही, ‘सीसैट’ में गणित और रीज़निंग के ज़्यादा प्रश्न होने और उनका मूल्य (2.5 अंक प्रति प्रश्न) सामान्य अध्ययन के प्रश्नों (2 अंक) से ज़्यादा होने के कारण मानविकी विषयों के छात्र भी तुलनात्मक रूप से नुकसान में रहे.

सामान्य अध्ययन का पेपर इतना मुश्किल पूछा जाता है कि शायद ही कोई 100 में से 60-65 प्रश्नों से आगे बढ़ सके जबकि ‘सीसैट’ के पेपर में तकनीकी पृष्ठभूमि के लोग आसानी से 70-75 प्रश्न (80 में से) कर लेते हैं. चूँकि मैरिट सूची दोनों पेपर के अंकों को जोड़कर बनाई जाती है, इसका परिणाम है कि पिछले तीन वर्षों में इस परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि व्यापक तौर पर बदल गई है.

आंदोलनरत छात्रों के तर्क

सवाल है कि ये आंदोलनरत छात्र आख़िर चाहते क्या हैं? क्या ये अंग्रेज़ी विरोधी हैं? क्या इन्हें गणित से दिक्कत है? बिल्कुल नहीं. ये सिर्फ़ भेदभाव के विरोधी हैं. इनके तर्कों पर गौर कीजिए-

ये तर्क कमज़ोर नहीं हैं. या तो सरकार इन्हें तथ्यों व तर्कों से ख़ारिज करे, नहीं तो यह ज़रूरी हो जाता है कि प्रारंभिक परीक्षा की संरचना में बदलाव लाया जाए.

बड़ा भेदभाव का दायरा

पर, यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह आंदोलन सिर्फ़ ‘सीसैट’ और प्रारंभिक परीक्षा तक सीमित नहीं है. भारतीय भाषाओं के साथ मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार में भी गंभीर भेदभाव होता है. उदाहरण के लिए, मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन के चारों पेपरों की जाँच के लिए मॉडल उत्तर सिर्फ़ अंग्रेज़ी में बनाए जाते हैं और उन्हीं को देखकर भारतीय भाषाओं की उत्तर पुस्तिकाओं को जाँचा जाता है.

अगर यूपीएससी किसी भी साल की भाषावार अंक तालिका जारी करे तो यह बात साफ़ हो जाएगी कि हर पेपर में औसतन 15-25 अंकों का अवैध नुकसान (यानी 60-100 अंकों का कुल नुकसान) भारतीय भाषाओं के उम्मीदवारों को होता है.

इसी तरह, साक्षात्कार में भी भाषाई भेदभाव को आसानी से देखा जा सकता है. जिन उम्मीदवारों का माध्यम हिंदी, तमिल, बांग्ला आदि होता है, उन पर दबाव बनाया जाता है कि वे अंग्रेज़ी में इंटरव्यू दें पर आज तक नहीं सुना गया कि अंग्रेज़ी भाषी उम्मीदवार को कोई भारतीय भाषा बोलने के लिए बाध्य किया गया हो.

अगर यूपीएससी में नैतिक साहस हो तो उसे भाषावार वर्गीकरण के साथ इंटरव्यू के अंक जारी करने चाहिए ताकि यह साफ़ हो सके कि भेदभाव होता है या नहीं. यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि औसत रूप से यह अंतर 20-25 अंकों से कम नहीं होगा.

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