मिलिए कोलकाता के हिंदू रोज़ेदार से

कोलकाता के 71 वर्षीय संजय मित्रा एक परंपरागत हिन्दू परिवार से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन रमज़ान के महीने में वो नियम से रोज़ा रखते हैं.

संजय मित्रा मुस्लिम बहुल रज़ाबाज़ार इलाक़े में रहते हैं और भारत विभाजन के समय हुए हिन्दू मुस्लिम दंगों की याद उनके ज़ेहन में आज भी ताज़ा है.

वो कहते हैं, “मैंने कई सांप्रदायिक दंगे देखे हैं. साल 1992 में जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई, उस साल मैं दिल्ली में था. हर जगह दंगे हो रहे थे. मैंने ख़ुद को असहाय महसूस किया और बहुसंख्यक समुदाय से होने के नाते मैं इन दंगों पर शर्म महसूस करता हूं.”

कभी कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे मित्रा ने इन दंगों का विरोध करने का अपना ही तरीका अपनाया.

वो कहते हैं, “बाबरी मस्जिद गिरने के बाद मैंने अपने मुसलमान भाइयों के साथ एकता दिखाने के लिए इस घटना का विरोध करने का निश्चय किया. और फिर 1993 से ही रमज़ान के दौरान मैंने रोज़ा रखने का संकल्प लिया.”

'धार्मिक नहीं हूं'

सूर्योदय से पहले सहरी करना मित्रा शायद ही कभी भूलते हों लेकिन दिन के समय वो अपने मुसलमान साथियों के साथ इफ़्तार नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें डायबिटीज़ है.

मित्रा कहते हैं, “मैं वैसे धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं. इसलिए मैं पांच वक़्त की नमाज़ नहीं पढ़ता और न ही मैं पूजा करता हूं.” लेकिन उनके घर में पिछले 125 साल से दुर्गा पूजा का आयोजन होता है.

मैं जब उनसे मिलने गया तो मुझे घर के बाहर इफ़्तार के लिए ले गए.

ठीक उस जगह पर जहां हिन्दुओं का इलाका ख़त्म होता है और मुसलमानों का इलाक़ा शुरू होता है, वहीं एक छोटा सा भोजनालय है जो पिछले 55 वर्षों से मित्रा का प्रिय स्थान है.

मित्रा बताते हैं, “मुझे याद है जब यहां मैंने पहली बार गोमांस खाया था. करीब पचास साल पहले की बात है. ये भोजनालय पहले बिल्कुल अलग था, अब तो इसमें काफी बदलाव आ गया है. अब आपको यहां गोमांस नहीं मिलेगा क्योंकि ये लोग अब हिन्दू ग्राहकों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं.”

'बात मुझे लग गई'

हम लोगों की बातचीत जैसे ही शुरू हुई, भोजनालय के साथ ही लगी मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आने लगी. इसी के साथ इफ़्तार का वक़्त हो गया और मित्रा भी अन्य रोज़ेदारों के साथ वहां बैठ गए.

भोजनालय के मालिक नईमुद्दीन मित्रा को कई दशक से जानते हैं. वो कहते हैं, “जब हमने पहली बार सुना कि मित्रा भी हम लोगों की तरह रोज़ा रखते हैं तो हमने इसका स्वागत किया.”

सामान्य तौर पर मित्रा घर पर ही रोज़ा तोड़ते हैं लेकिन कभी-कभी वो यहां भी आते हैं.

रमज़ान के अलावा मित्रा मार्च-अप्रैल के महीने में भी व्रत रखते हैं. इसकी वजह वे बताते हैं, “एक बार मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि हिन्दू होकर आप रोज़ा रखते हैं, लेकिन अपने धर्म से जुड़ा कोई व्रत आप क्यों नहीं रखते.

तो ये बात मुझे लग गई. मैंने कहा कि अब मैं चैत्र के महीने में व्रत रखूंगा जब बंगाल के भूमिहीन श्रमिक गजन नाम का एक स्थानीय त्योहार मनाते हैं. इस तरह से मैं साल में दो महीने व्रत रखता हूं.”

और व्रत के दौरान मित्रा संगीत और किताबों के साथ ही रहना पसंद करते हैं.

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