शेर उसके दोस्त को मारकर खाते रहे

गीर एशियाई शेर

पिछले दो वर्षों में गुजरात के गीर अभयारण्य से बाहर निकले शेरों ने 14 लोगों को और खेत-घर में बंधे करीब 1,000 से ज़्यादा पशुओं को मार दिया है.

हालांकि, ज़्यादा बड़ी समस्या गीर में शेर को देखने (लॉयन शो) की है, जिसमें अधिकतर लोगों की जान जाती है या घायल होते हैं.

(बेमौत मारे जा रहे हैं गीर के शेर)

सब मानते हैं कि शेर से लोगों को ख़तरा है, लेकिन उससे काफ़ी ज़्यादा ख़तरा अब शेर को इंसानों से है. पिछले साल अक्तूबर में गीर जंगल से थोड़ी दूर विसावदर तालुका के मौंपारी गांव में एक शेर खेत में लगे बिजली के तार से चिपककर मर गया और मामले को छुपाने के लिए किसान ने शेर की लाश एक नाले में छुपा दी.

इसके बाद मामला काफ़ी मुश्किल से सुलझा.

पढ़िए गीर जंगल के शेरों पर विशेष रिपोर्ट विस्तार से-

पूरी दुनिया में सिर्फ़ गुजरात के जंगलों में पाए जाने वाले एशियाई शेर के लिए गीर का जंगल अब छोटा पड़ने लगा है. इससे बाहर निकलकर वे खेतों और आम के बग़ीचों को अपना नया घर बना रहे हैं.

शेर अब गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में करीब 2,000 गांवों में देखे जा चुके हैं. पर जहां बाहरी दुनिया के खतरों से अनजान शेरों की ज़िन्दगी मुश्किल में है, वहीं बड़ी समस्या इंसान और जानवरों के संघर्ष की भी है.

पिछले दो वर्षों में गीर अभयारण्य से बाहर निकले शेरों ने 14 लोगों को और खेत-घर में बंधे करीब 1,000 से ज़्यादा पशुओं को मार दिया है. गुजरात में शेरों की आबादी 500 से ज़्यादा मानी जा रही है, जिनमें से 300 ही जंगल में है.

90 साल के मुल्लूभाई गुजरात के अमेरली जिले में कपास की खेती करते हैं. वह कहते हैं, "पांच साल पहले मेरी भैंस एक रात अचानक चिल्लाने लगी. मैंने बाहर निकलकर देखा तो लगा शायद कुत्ता उसे तंग कर रहा था. मैंने उसे भगा दिया पर सुबह देखा तो मेरी भैंस मरी हुई पड़ी थी."

"अगले कुछ दिन में गांव में कई भैंसें मारी गईं. फिर पता चला कि हमारे गांव में शेर आ गया है. बस फिर सब अपने जानवरों को कमरों में अपने साथ लेकर सोने लगे और अब सभी ने अपने घरों की दीवारें तीन से चार फ़ीट ऊँची करवा दी हैं".

लॉयन शो

जिला वन अधिकारी, गीर (पूर्व), अंशुमान शर्मा कहते हैं, "यहां पर वाइल्ड लाइफ़ मैनेजमेंट सिर्फ जंगल तक सीमित नहीं रहा है. फ़सल की कटाई के वक़्त हमें कई खेत मालिकों के फ़ोन आते हैं कि मज़दूर खेत में नहीं जा रहे, क्योंकि वहां शेर का ख़तरा है. तब हम खेतों पर पहरा देते हैं."

शर्मा के मुताबिक़, "आने वाले दिनों में जंगल विभाग के लिए आदमी-पशु संघर्ष और औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ती शेर की आबादी बड़ी चुनौती होगी."

वह बताते हैं, "हमने गांव में वन मित्र और जंगल से बाहर ट्रैकर रखे, ताकि हमें जानकारी मिलती रहे कि शेर कौन-कौन से गांवों में है."

आँकड़ों के मुताबिक जहाँ दस साल पहले जंगल विभाग को 'एनिमल रेस्क्यू' के सालाना 30 से 40 फ़ोन आते थे, वहीं अब 800 से 900 फ़ोन आते हैं. सालाना 2500 के करीब याचिकाएँ आती हैं, जहां शेर या तेंदुए ने गांव में किसी की भैंस या बकरी को मार दिया है.

हालांकि, ज़्यादा बड़ी समस्या गीर में शेर को देखने (लॉयन शो) की है, जिसमें अधिकतर लोगों की जान जाती है या घायल होते हैं.

गीर अभयारण्य से 150 किलोमीटर दूर लीलया गांव में शिक्षक और वन्य जीव कार्यकर्ता मनोज जोशी कहते हैं, "हमारे इलाके में करीब 40 से 50 शेर हैं. जैसे ही शेर शिकार करता है, लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बुला लेते है. 40 से 50 गाड़ियां भर के लोग शेर को अपना शिकार खाते देखने खेत में नदी के किनारे रात को इकट्ठे हो जाते हैं."

जोशी बताते हैं, "शेर अमूमन इंसान पर हमला नहीं करता लेकिन जब लोग रोज़ उसे खाना खाते हुए देखते हैं तो वह चिड़चिड़ा हो जाता है. और जैसे ही लोग ज़्यादा करीब जाने की कोशिश करते हैं, वह उन पर हमला कर देता है."

उनका कहना था, "हाल ही में राजुला के नज़दीक कुछ दोस्त शेर को देखने गए. वहीं एक शेरनी ने बच्चों को जन्म दिया. इतने लोगों को देखकर उसने हमला कर दिया. सभी भाग गए लेकिन दो दोस्त नहीं निकल पाए. शेरनी ने एक पर हमला किया और दूसरा पेड़ पर चढ़कर पूरी रात शेरों को उसके दोस्त को मारकर खाते देखता रहा."

संघर्ष

हालांकि, जहां शेर से लोगों को ख़तरा है, उससे काफ़ी ज़्यादा ख़तरा अब शेर को इंसानों से है.

बाहर निकले शेरों की सुरक्षा को लेकर सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली घटना पिछले साल अक्तूबर में गीर जंगल से थोड़ी दूर विसावदर तालुका के मौंपारी गांव में हुई.

वहां एक शेर खेत में लगे बिजली के तार से चिपककर मर गया और मामले को छुपाने के लिए किसान ने शेर की लाश एक नाले में छुपा दी. यह तार किसान ने शेर के लिए नहीं लेकिन अन्य जानवरों को फसल खाने से रोकने के लिए लगाया था.

उसी इलाके में रहने वाले पत्रकार हिरेन धकन कहते हैं कि लाश दो दिन में मिल गई और फिर जो हुआ उसने गुजरात को हिलाकर रख दिया.

धकन कहते हैं, "जांच के दौरान उस किसान का पता लग गया और पुलिस ने उसे पकड़ लिया. लेकिन उसके पक्ष में कुछ किसान आ गए और कहने लगे कि ये शेर तो रोज़ खेतों में घूमेंगे और अगर मर जाए तो हमारी क्या गलती है?"

उन्होंने बताया, "किसानों ने चेतावनी दी कि अगर गिरफ़्तार किसान को नहीं छोड़ा गया तो वे गुजरात में सभी शेरों को मार देंगे. हालांकि फिर मामला मिल-बैठकर सुलझा. इससे पहले भी शेर खेत में छिड़की हुई दवाई खाकर मर गए थे".

धकन कहते हैं कि वैसे तो किसान को शेर के उनके वहां रहने से फायदा ही है, "शेर के रहने से उनके खेत में नील गाय नहीं आती. इस इलाके में नील गाय की वजह से फसल का बहुत नुक़सान होता है. लेकिन आने वाले दिनों में शेर और इसांनों का सामना ज़्यादा होगा और इनमें भिड़ंत बढ़ेगी."

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