इन्हें जान से ज़्यादा शेर की चिंता है

1980 के मध्य और आख़िर तक शेर दिल्ली, बिहार, बुंदेलखंड, राजस्थान, गुजरात और एशिया के कई इलाक़ों में पाए जाते थे. लेकिन 19वीं शताब्दी के अंत तक शेर सौराष्ट्र को छोड़कर बाक़ी जगह से लगभग विलुप्त हो गए.

सौराष्ट्र में औसत बारिश होती है और इस क्षेत्र में घने जंगल भी नहीं है, लेकिन यह एशियाई शेरों को बचाने में कामयाब रहा.

आज तो सौराष्ट्र का इलाक़ा शेर संरक्षण में कामायबी का इतिहास बना चुका है. लुप्त होने की कगार से शेर आज सौराष्ट्र में अच्छी तादाद तक पहुंच गए हैं.

यह कैसे संभव हुआ? पानी, जंगल, संरक्षण विधि से या फिर शिकार की उपलब्धता.

लेकिन जो लोग शेर की प्रजाति को समझते हैं, उन्हें मालूम है कि शेर को बचाने में यहां के लोगों का प्यार और लगाव की अहम भूमिका रही है.

लोगों का शेर से लगाव

सौराष्ट्र के एक सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक और पर्यावरणविद ताखुभाई सांसुर कहते हैं, "20वीं शताब्दी के आरंभ तक सौराष्ट्र के राजाओं का पसंदीदा शग़ल शिकार था. लेकिन जब शेरों की संख्या कम होने लगी और वे दर्जन भर से भी कम रह गए तो लोगों से शेर संरक्षण के लिए अपील की गई."

इलाक़े के ज़्यादातर लोगों का उपनाम सिंह या शावज है, जिसका मतलब शेर होता है.

खंभा-गीर नेचर क्लब के अध्यक्ष भीखुभाई जेटवा ने कहा, "पहले गीर के अंदर, शेर अलग-अलग मलधारी (चरवाहों) के साथ रहते थे. आज शेर गीर के जंगल से बाहर निकल रहे हैं क्योंकि उन्हें अंदर इंसान नहीं दिखाई देते होंगे. पिछले चार दशक में सरकार ने जंगल के अंदर से सभी मनुष्यों को बाहर निकाल दिया है."

भीखुभाई के मुताबिक़ सौराष्ट्र के लोग शेर को अपने परिवार का सदस्य मानते हैं.

मंगाभाई धापा पीपावा बंदरगाह से सटे गांव में रहते हैं और मानते हैं कि उनके क्षेत्र में रहने वाले शेर उनके बेटे-बेटियों जैसे ही हैं.

पिछले दिनों उनके गांव में ट्रेन से कटकर दो शेरनियों की मौत हुई तो मंगाभाई सहित इलाक़े के कई लोगों ने मातम मनाया. मंगाभाई बताते हैं, "शेर सुबह और शाम के वक़्त ही रेलवे ट्रैक पार करते हैं. उस दिन के बाद से हम लोग नियमित तौर पर निगरानी करते हैं कि कोई शेर ट्रेन की चपेट में नहीं आए. हम लोग शेर से डरते हैं और ख़ुद को बचाने का कोई प्रशिक्षण भी हमारे पास नहीं है. लेकिन हम अपनी जान से ज़्यादा शेर की जान की चिंता कर रहे हैं."

शेरनी की याद में मंदिर

बरारी और विक्टर गांव के मंगाभाई और जेठवा जैसे लोगों ने शेरनियों की याद में छोटा सा मंदिर भी बनवाया है.

सासन-गीर क्षेत्र में शेर के साथ लंबे समय से रहने वाले लोगों में शामिल हैं हुसैनभाई. हुसैनभाई अपनी जिप्सी में पर्यटकों को गीर की सैर भी कराते हैं.

वे कहते हैं, "हमारा अस्तित्व इसलिए है क्योंकि यहां शेर रहते हैं. हम उनकी जान बचाने के लिए अपनी जान दे सकते हैं. अगर सरकार यहां से अपने सारे कर्मचारी हटा भी लें तो भी हम गीर के शेरों की रक्षा कर लेंगे. हम शिकारियों को इस इलाक़े में आने नहीं देते. शेरों का शिकार तभी होता है जब वे काफ़ी दूर चले जाते हैं."

बीते साल, पर्यटकों की भारी मौजूदगी वाले समय में एक ट्रक के नीचे आकर एक शेर की मौत हो गई थी. तब पूरा सासन एक दिन के लिए बंद हो गया था. पिछले ही साल अप्रैल में जब सुप्रीम कोर्ट ने गीर के कुछ शेरों को मध्य प्रदेश के कूनोपालपुर अभयारण्य में भेजने का निर्देश दिया तो भी गीर के कई गांवों में जैसे जीवन ठहर गया था.

शाकाहार का जादू

गीर (पूर्व) के उप वन्य संरक्षक अंशुमन शर्मा ने बताया, "सौराष्ट्र के जंगल दूसरे हिस्सों की तरह घने नहीं हैं. लेकिन यहां शेर और मनुष्य जिस तरह से रहते हैं, उसकी दूसरी मिसाल नहीं है. यहां की ज़्यादातर प्रजाति शाकाहारी है. शेर को मांसाहार के लिए मनुष्यों से होड़ नहीं लेनी होती."

पिछले दो साल में शेरों ने 125 लोगों पर हमला किया है. जिनमें 14 लोगों की मौत हुई है. शेरों ने इस दौरान हज़ार मवेशियों को मार डाला.

इस क्षेत्र में शेर हर साल हज़ार मवेशियों का शिकार करते हैं. सासन-गीर क्षेत्र के उप वन्य संरक्षक संदीप कुमार ने बताया, "गांव वाले अपने मवेशियों को सुरक्षित रखने का तरीक़ा निकाल लेते हैं. मवेशियों के नुक़सान पर सरकार लोगों को मुआवज़ा भी देती है. मवेशियों के गंवाने का आम लोगों को बहुत ज़्यादा दुख नहीं होता. पिछले कुछ सालों में शेर के प्रति आम लोगों का प्रेम और लगाव बढ़ा ही है."

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